Friday, January 29, 2010

ख़ुद को परिभाषित करती स्त्री : कुछ बिम्ब / ईरानी कविता


ईरान की आधुनिक कविता
ख़ुद को परिभाषित करती स्त्री : कुछ बिम्ब
ईरान की युवा कवियत्रियों को मैं यहाँ पहले भी प्रस्तुत कर चुका हूँ.इस बार इनकी कुछ छोटी कवितायेँ पढवाने की मंशा है जिसमे अपने देश में व्याप्त धार्मिक,सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबंधात्मक माहौल के बने रहते उन्होंने एक आधुनिक ईरानी स्त्री को परिभाषित करने की कोशिश की है...पर क्या ये परिभाषाएं ईरान की भौगोलिक सीमा में ही बाँधी जा सकती हैं?इन कविताओं को पढ़ कर इस प्रश्न का उत्तर आप खोजने को मजबूर हो जायेंगे,मुझे पूरा भरोसा है...(यादवेन्द्र)
जलेह इस्फ़हानी

मैं कैसे रहूँ चुप???

पर मैं हूँ कौन सी बला ?
क्या महज एक बंदी
ज़मीन में गडी ज़ंजीरों से जकड़ी हुई...
इसी चुप्पी में डूबती जा रही है मेरी उमर
इसी चुप्पी में होती जा रही हूँ मैं शेष
और सरकती जा रही हूँ मौत के क़रीब
और क़रीब देखते देखते
वह समय अब दूर नहीं
जब कुछ भी शेष नहीं बचेगा मेरा
सिवा मुट्ठी भर राख के....
***
शोलेह वोल्पे
अंततः ये पुरुषों की दुनिया है

सीधी सीधी बात है
कि मैं एक स्त्री हूँ...
मेरी ओर ताकना गुनाह है
मुझे तो बुर्के में ढंका लिपटा होना चाहिए
सर से पैर तक
मेरी आवाज सुन कर
डोल बहक सकता है किसी का भी मन
और इस पर तानाशाही अंकुश रखना होगा...
मेरे लिए तो
किसी तरह का सोच विचार वर्जित है
इसी लिए स्कूलों से रखो मुझे मीलों दूर..
यह सब बर्दाश्त करना होगा मुझे
और मरना भी होगा गुमसुम
बगैर मुह खोले
बगैर किसी उलाहने और शिकवे के
तभी मुझे मिल पायेगी जन्नत में प्रवेश की इजाजत...
वहां मुझे संगमरमरी बादलों के दालान के बीचों बीच
करनी होगी नुमाइश संभाल कर रखे हुए अपने नंगे बदन की
खुशनसीब बन्दों को खिलाने होंगे रसीले अंगूर
पेश करनी होगी उन्हें सुनहरे प्यालों से शराब
और गुनगुनाने होंगे उनके लिए
प्रेम पगे नशीले गीत...
***
फरीदेह हसनज़देह मोस्ताफावी
मेरी ख्वाहिश

काश मैं सर्दियों में जम जाती
जैसे जम जाता है पानी धरती पर बने छोटे बड़े गड्ढों में
कि चलते चलते लोग बाग़ ठिठक कर देखते नीचे...
कैसी उभर आई हैं मेरी रूह में झुर्रियां
और टूटे हुए दिल में दरारें.....

काश मैं कभी कभार
दहल जाती धरती जैसे लेती है अंगडाई
और मुझे संभाले हुए तमाम खम्भे
धराशायी हो जाते पलक झपकते..
तब लोगों को यकीन आता
मेरे दिल के तहखाने में कैसे कलपता है दुःख...

काश मैं उग पाती
हर सुबह सूरज की मानिंद
और आलोकित कर देती
बर्फ से ढंके पर्वत और धरती...
ताकि लोग कभी न सोच पायें
कि रहा जा सकता है दुनिया में
प्यार की उफनती ललक के बगैर भी...
***
मीना असदी
स्वप्नों की अँगड़ाईयां

यदि वे जिन्दा बचे होते
तो उनमे अब चटक रहे होते फूल
मैं बादाम के उन दरख्तों की बात कर रही हूँ
जो बच गए थे कुल्हाड़ियों की मार से....

यदि वे आज होते
तो बच्चों के मुह लबालब भरे होते
पके बादाम के तरल अमृतमय रस से ..
और इनमे होता स्वाद
कडवे बादाम का भी शामिल...

यदि वे आज होते.......
***

मेरे लिए तो अंगूठी भी है एक बंधन

मुझे इबादत करते वक्त बैठने वाले आसनों का ख्याल नहीं आता
पर सैकड़ों रास्तों के बारे में जरुर सोचती हूँ
जो हो कर गुजरते हैं चिकने सुन्दर दरख्तों वाले
सैकड़ों बागों के अन्दर से...

मुझे मालूम है क़िबला* की बाबत
कि इसका अस्तित्व वहीँ है जहाँ हैं खुशियाँ...
और मैं हर रोज करती हूँ इबादत
इन्ही मखमली रास्तों पर
गौरैयों के संगीत की संगत में..

मुझे नहीं मालूम क्या होता है स्नेह
या एक और दूसरे मुल्क के बीच
क्या क्या होता है अंतर...
अकेलेपन को मैं कहती हूँ ख़ुशी
और रेगिस्तान को अपना घर
और प्यार नाम देती हूँ उस सब को
जो मुझे कर देता है उदास और रुंआसा...

मेरे लिए पांच पौंड का नोट दौलत है
और जो कोई दिखाई दे फूल तोड़ता हुआ
मैं उसको अंधा कह कर पुकारती हूँ...
मेरी निगाह में मछली को पानी से
जुदा कर देने वाला जाल
क़ातिल है...निरा क़ातिल...

मैं समुद्र को ईर्ष्यालु होकर देखती हूँ
और कहती हूँ..तुम कितने छोटे हो मेरे प्यारे...
शायद समुद्र को भी
लगता होगा मैं सच बोल रही हूँ
जब वो मिलने जाता होगा
महासागर से...

मुझे नहीं मालूम क्या होती है रात
पर दिन की बाबत मुझे बखूबी पता है
मेरे लिए जंगली फूलों की झाड़ी
एक सजा संवरा सा गाँव है
और स्मृतियों के बाग़ की सैर
आज़ादी हैं...आज़ादी....
और अनसोची कोई सी भी मुस्कान
ख़ुशी है बे-शुमार...
मेरे लिए तो कोई भी शख्स
जो ले कर चलता है पिंजरा अपने साथ
जेलर से कम कुछ भी नहीं...

मुझे लगता है कि कोई भी विचार
जो बे मतलब ठहर गया हो मन में बस यूँ ही
भारी- भरकम - सी एक दीवार है ...
***
*क़िबला- क़ाबा की दिशा

10 comments:

  1. सारी कवितायें मिलकर एक थियोक्रेटिक समाज में स्त्री का आदमकद खाका खींचती हैं।

    हाम इस बार ख़ासतौर पर दूसरी कविता का अनुवाद उतना सहज नहीं लगा।

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  2. saari kavitaen achchi hain...khaskar doosri.shukriya.

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  3. बहुत सुंदर कविताएं. न जाने कहां-कहां से गुजर गईं. बार-बार पढऩे के लिए सहेज रही हूं इन्हें. शुक्रिया इन्हें पढ़वाने का.

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  4. अनुनाद पर ये क्या तैयार हो रहा है ? एक साथ इतनी सारे बिम्ब... मुझे तो दूसरी कविता बेहद अच्छी लगी...

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  5. ईरानी कविताओं की इतनी सुन्दर प्रस्तुति !!!!!!! हार्दिक आभार , ये कविताएँ ईरान की भौगोलिक सीमा को लांघकर विश्व पटल पर अपनी मजबूत जगह बना रही हैं ,
    वैसे भी सृजन की कोई सीमा नही होती .

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  6. कविताओं का तो क्या मालूम, अनुवाद बेहतरीन हैं. ये अनुवाद नहीं मुझे अपनी हिंदी की कवितायें ही मालूम देतीं हैं. फारस का कुछ ऐसा है की हमारा उन से रिश्ता भी मनुष्यता के इतिहास की जड़ों तक जाता है. . तब ये कवितायें कैसी हैं? अछ्छी या बुरी , मैं नहीं जानता. पर इतना जरूर है की ये निहायत सच्ची कवितायें हैं. और आज हमें अछ्छी कविताओं की उतनी जरूरत नहीं, जितनी सच्ची कविताओं की.

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  7. कुछ झिझकते आया था पढ़ने। प्रायः कोशिश करता हूँ कि अनुवादित रचनाओं से दूर रहूँ...

    किंतु यदि इन कविताओं को इस घोषणा के साथ न लगाया जाता कि ये अनुवादित हैं किसी दूसरी भाषा से, तो मैं तो इसे ओरिजिनल हिंदी कविता ही मान बैठता...

    सर्दियों में जम जाने वाली ख्वाहिश...उफ़्फ़!

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  8. कविताएं प्रभावशाली हैं। अपने कवित्व से ज्यादा कथ्य की वजह से। आशुतोष कुमार ने बहुत वजन वाली बात कही है। आज हमे अच्छी से ज्यादा जरूरत सच्ची कविताओं की है।

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  9. इरानी स्त्रियों के दर्द कितने एहसासों की तस्वीरे बना रहें हैं स्त्री के मन की सच्ची तस्वीरें हैं ये! बहुत सुंदर कविताएं.

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  10. "antatah ye purusho ki duniya hai"vastav mai dharm ke thekedaro ke muh pah khich kar mara gaya juta hai.unse koi nahi puchata ki ki jab yehi kam aurato ko jannat nasib hone par karake masti lutani hai to is duniya mai ye bandishe kyo?agar khuda ne aurato aur mardo mai itana fark bana rakha hai to use insafpasand aur sabaka rakhawala kah kar ham ishwar ko kahi gali to nahi de rahe hai.
    Vahi " mere liye to anguthi bhi ek bandhan hai" bahut hi achchi kavita hai.
    achchi rachnao ke chayan aur saral anuvad ke liye yadavendra ji
    ko dhanyayad.
    alok nath tripathi

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