Saturday, January 16, 2010

चट्टान जो हथौड़े से चूर कर दी गई



1

डेनिस ब्रुटुस के बारे में अमेरिकी खेल पत्रकार डेव ज़िरिन लिखते हैं- ही शेम्ड दि शेमलेस.

1964 में तोक्यो में हुए ओलम्पिक खेलों से दक्षिण अफ्रीका की सहभागिता पर लगा प्रतिबन्ध ब्रुटुस द्वारा चलाई गई अंतर्राष्ट्रीय मुहिम का ही नतीजा था. एक सीधा-सादा सवाल ब्रुटुस बार बार पूछते रहे कि अगर ओलम्पिक ब्रदरहुड और फेयर प्ले का प्रतीक हैं तो इस खेल उत्सव में रंगभेदी राष्ट्र कैसे शामिल हो सकते हैं? बेशर्म आखिर शर्मिंदा हुए और दक्षिण अफ्रीका को न केवल ओलम्पिक बल्कि लगभग हर अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजन से बदर कर दिया गया.

दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने ब्रुटुस के इस स्पोर्ट्स एक्टिविज़्म के कारण उन पर पाबंदियाँ लगा दीं; परिवारवालों के अलावा किसी से भी मिलने-जुलने पर रोक लग गई. कुछ समय बाद विदेशी पत्रकारों से मिलकर उन्होंने इस पाबंदी का उल्लंघन किया, तो डेढ़ साल क़ैद की सजा सुना दी गई. जमानत पर रिहा हुए तो भाग कर मोज़ाम्बिक चले गए, लेकिन वहां की पुलिस ने उन्हें पकड़कर फिर दक्षिण अफ्रीका वापिस भेज दिया.

इसके बाद भागने की एक और कोशिश में पुलिस की गोली खानी पड़ी; खून से लथपथ अवस्था में भी गोरों की एम्बुलंस ने उन्हें अस्पताल पहुँचाने से मना कर दिया. पर वाह री जिजीविषा जिसने अश्वेतों की एम्बुलंस के पहुँचने तक जान छोड़ने न दी. जख्म अभी ठीक से भरा भी न था कि उन्हें कुख्यात रॉबन द्वीप भेज दिया गया जहाँ उन्होंने सोलह महीनों की सज़ा काटी.

जेल में लिखी कविताओं का उनका पहला संकलन ' Sirens Knuckles Boots' उन दिनों नाइजीरिया में प्रकाशित हुआ. जेल की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर जिन आवाजों का खौफ़नाक साया होता है- चीखते साइरन, कड़कड़ाकर मुट्ठियों में बदल जाने वाले उँगलियों के जोड़ और धड़धड़ाते पुलिसिया जूते - संकलन का शीर्षक उन्हीं की ओर इशारा करता है. लेटर्स टू मार्था एंड अदर पोएम्स फ्रॉम अ साउथ अफ्रीकन प्रिज़न, अ सिंपल लस्ट, स्टबर्न होप और एयर्स एंड ट्रिब्युट्स उनके अन्य प्रकाशित संकलन हैं.

दक्षिण अफ्रीका छोड़ने पर उन्होंने कुछ साल ब्रिटेन में बिताये और अंततः अमेरिका में राजनीतिक शरण ली. 1981 में रीगन-राज शुरू होने पर सरकारी नीति बदली और ब्रुटुस को दक्षिण अफ्रीका वापिस भेजने के प्रयास हुए. इस बार ब्रुटुस ने लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की.

रंगभेद की समाप्ति के पश्चात वे दक्षिण अफ्रीका लौटे; अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की सरकार द्वारा अपनाई गई नव-उदारवादी नीतियों के वे मुखर विरोधी बने रहे.

रंगभेद की एक व्यवस्था से निकल कर हम वैश्विक रंगभेद में प्रवेश कर गए हैं. अब हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ संपत्ति बहुत थोड़े लोगों के हाथों में जमा है, बहुत सारी जनता अब भी गरीब है; ऐसा समाज जो अमीरों और बड़े निगमों को बचाने के लिए कृतसंकल्प है और वास्तव में गरीब पीसे जा रहे हैं, उन पर बोझ बढ़ रहा है, अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस की सरकार के राज में जिसकी उम्मीद की थी यह ठीक उसके उलट हो रहा है.

अपने रंगभेद-विरोधी कार्यों, विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं की नव-साम्राज्यवादी नीतियों के विरोध और वैश्विक न्याय के पक्ष में जनसांगठनिक कामों के लिए वे दुनिया भर के एक्टिविस्टों के प्रेरणा स्त्रोत बने रहे. प्रोस्टेट कैंसर से लम्बी लड़ाई लड़कर 26 दिसम्बर 2009 को केप टाउन में अपनी अंतिम सांस लेने से कुछ ही दिन पहले वे कोपेनहेगन सम्मलेन में विरोध प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन कर रहे थे.

ब्लू कॉलर रिव्यू के शरद ऋतु अंक के अंतिम पृष्ठ पर ब्रुटुस की ये पंक्तियाँ छपी हैं.

एक वक़्त आएगा
एक वक़्त आएगा हमें भरोसा है
जब इस ग्रह का आकार
और ज़मीन के बंटवारे
कम महत्त्वपूर्ण माने जायेंगे
दोस्ती के उजाले में हम खुद को दमकता पायेंगे
एक लाल सितारा-ए-उम्मीद
हमारी ज़िन्दगियों को रोशन करेगा
उम्मीद का तारा
ख़ुशी का तारा
एक सितारा-ए-आज़ादी


2


चट्टान जो हथौड़े से चूर कर दी गई

डेनिस ब्रुटुस के लिए, उनके अस्सीवें जन्मदिन पर


1963 और मार्शल स्क्वेअर स्टेशन से होकर
थके-थके कदमों से चलते कर्मचारियों को नहीं पता था कि
तुम उस रस्ते पर उन सभी के बीच घुस पड़ोगे
यह सोचकर कि पुलिस भीड़ पर गोली नहीं चलाएगी
जब सार्जंट क्लेंगेल्ड के काँपते हाथों और पुट्ठों पर लगी पिस्तौल से
तुम छूटकर भागे
तो उसे नहीं पता था कि
तुम्हारी ज़िन्दगी की किताब में वह बन जायेगा एक फुटनोट

जिसने तुम्हारी पीठ पर गोली मारी
मोड़ पर खड़े सादे भेस वाले उस पुलिसिये को नहीं पता था कि
वह कारतूस रंगभेद के संग्रहालय में एक कांच के मर्तबान में जगह पाएगी
खून से लथपथ ज़मीन पर कसमसाते पड़े एक अश्वेत आदमी को देखते
तमाशाइयों को नहीं पता था कि
उनके जूते खून में बरसों तक फिसलते रहेंगे

स्ट्रेचर समेट कर तुम्हें गोरों के अस्पताल ले जाने से मना करते हुए
एम्बुलंस वालों को नहीं पता था कि
वे बैठे रहेंगे नरक के इमर्जन्सी रूम में अनंत काल तक
उस रोग से तड़पते हुए
जिसमें काली पड़ जाएगी उनकी त्वचा
और वे साबुन के लिए चिल्लाते रह जाएंगे

जब तुम मंडेला के साथ हथौड़े से पत्थर तोड़ रहे थे
तो रॉबन द्वीप के पहरेदारों को नहीं पता था कि
उनके बाप-दादाओं का दक्षिण अफ्रीका
उन कैदियों द्वारा हथौड़े से चूर-चूर कर दिया जाएगा
जो बैलट के गणतंत्र के दिवास्वप्न देखते
पर पहरेदार की इजाज़त के बिना पेशाब तक नहीं कर पाते

क्या तुम्हें पता था?
जब उस गोली ने तुम्हारे शरीर के ब्रम्हाण्ड के
तारों को भक से उड़ा दिया
क्या तुम जानते थे, तुम्हारे उजाले में दूसरे लोग पढेंगे घोषणापत्र ?
गोरी एम्बुलंस के चले जाने के बाद, और अश्वेत एम्बुलंस के आ पहुँचने से पहले
क्या तुम्हें पता था कि
तुम बच जाओगे आखिरकार
और मंडेला और हर जनाज़े में नाचते लाखों प्रदर्शनकारियों के साथ
एम्बुलंस के रंगभेद को देशनिकाला दे दोगे?
उस चट्टान के जड़ चेहरे पर हथौड़ा जड़ते हुए
क्या तुम्हें पता था कि पुलिस राज उस चट्टान से ज़्यादा कुछ नहीं
जो इंतज़ार कर रही है धूल की कीमियागिरी का?
क्या तुम्हें पता था कि चालीस सालों बाद
कॉलेज प्रेसिडेंट और अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर
तुम्हारे एहतराम में उठाएंगे अपने जाम
और ताज्जुब करेंगे कि
पीठ में गोली लिए वे कैसी कविता रच पाते?

जिन्हें हम पयम्बर मानते हैं, वे क्या जानते हैं?
क्या वे लगा सकते हैं कयास इस बात का
कि आज से चालीस बरस बाद दुनिया कैसी होगी?

दाढ़ी पयम्बरी का प्रतीक नहीं होती
वह तो होती है आदमी के चेहरे का इतिहास
तुम्हें किसी फ़रिश्ते ने भीड़ में नहीं धकेला था
तुम भागे थे क्योंकि तुम्हारे दिल की जानिब दौड़ते लहू ने
तुम्हें चेताया था कि जेल की कब्र तुम्हें निगल जायेगी
न तो स्वप्न में किसी आकाशवाणी ने अभय के दृश्य ही पसारे तुम्हारे आगे
अपनी प्रतिबंधित कविताएँ तुमने
चिट्ठियों के रूप में पठाईं अपनी भावज को
क्योंकि दुनिया की ख़ामोशी
एक तूफ़ान था तुम्हारे कानों में हहराता हुआ

दक्षिण अफ्रीका को पता है. कभी किसी कवि से न कहा जाए: मत बोलो यह बात

जब पहरेदार तुम्हें अपनी कोठरी में सर हिलाते देख रहे थे
जब तुम गोली के घाव के ताज़ा टांकों को सहला रहे थे
तब भी तुम्हारी खोपड़ी में ये शब्द धड़क रहे थे:
साइरंस नकल्स बूट्स. साइरंस नकल्स बूट्स.
साइरंस नकल्स बूट्स.


(मार्टिन एस्पादा के संकलन 'रिपब्लिक ऑफ़ पोएट्री' से)

*****

13 comments:

  1. 'एक वक़्त आएगा ..........'जरुर ऐसा वक़्त आएगा .

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  2. वह वक्त आएगा .......वह सुबह जरूर आयेगी .

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  3. हम सब उसी सुबह के इंतज़ार में और रात के ख़िलाफ़ संघर्ष में मुब्तिला हैं।

    इस बहादुर सिपाही को मेरा सलाम!

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  4. डेनिस ब्रुटुस के बारे में पढने के बाद एस्पादा के संकलन से ली गयी कविता पूरी तरह से खुलकर सामने आ गयी.वे जानते थे कि रंगभेद के खिलाफ उनकी लड़ाई अभी जारी है,दुनिया में अब वैश्विक रंगभेद है.

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  5. रंग भेद का अब का चेहरा ज़्यादा खतरनाक है. आसानी से पहचान में नहीं आने वाला. लड़ाई अब पहले से ज़्यादा जटिल है . लेकिन , वक़्त आएगा.

    कवि, सलाम तुम्हें!

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  6. ब्रुटुस के बारे मे और एस्पादा की झकझोरती कविता को यहाँ बाँटने के लिये आपका जितना भी शुक्रिया करें कम होगा..अन्याय के मुकाबिल संघर्ष करती ऐसी जिंदगियाँ ही अनगिनत पीड़ितों की आँखों मे उम्मीद बन कौंधती रहती हैं..
    ..रंगभेद के खिलाफ़ उम्मीद के इसी तारे के लिये अमेरिकन अश्वेत कवियत्री माया अन्जेलो की एक कविता जुबाँ देती है
    Your skin like dawn
    Mine like musk

    One paints the beginning
    of a certain end.

    The other, the end of a
    sure beginning.

    बस हकीकत इतनी है कि यहाँ रात के बाद कोई उजला दिन नही आता..रात ही दोबारा आ जाती है शक्लें बदल कर..

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  7. डेनिस ब्रुटुस ka sangharsh prerak hai...unki umeed hamsab ki hai...

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  8. एक बार फिर से एक प्रेरणादायक पोस्ट की प्रस्तुती के लिए भारत जी को आभार...

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  9. बहुत बढ़िया। मैं अस्सी के दशक में दो बार डेनिस ब्रुटस से मिला था। प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल सेंटर में कपड़े उतारकर उन्होंने अपना थ्रू ऐंड थ्रू घाव दिखाया था, जो राबिन आइलैंड में पीठ पीछे से उन पर चलाई गई गोली की वजह से हुआ था। बहुत प्यार से उन्होंने हमलोगों के साथ बातें की थीं, कविताएँ पढ़ी थीं। उन दिनों दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी अपार्थीड सरकार के दबाव में अमरीका उनके प्रवास को बढ़ाने की अनुमति देने से कतरा रहा था और हम सब लोग इस आंदोलन में शामिल थे कि उनको वहाँ रहने दिया जाए।

    उनकी एक कविता का अनुवाद मैंने चंडीगढ़ में हमकलम गुट की साइक्लोस्टाइल्ड पत्रिका के लिए किया था। ये सब बातें याद आ गईं।

    भारतभूषण ने बहुत अच्छा अनुवाद किया है। बधाई -
    लाल्टू

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  10. bahut hi acha anuwaad hai...ya pata nahi kavita hi bahut achi hain
    jo bhi ho wo bahut acha hai..
    "DOSTI K UJALE MAIN HUM KHUD KO DAMAKTA PAAYEGYE"

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  11. ३ दिनों से कोई नईै पोस्ट नहीं....क्यों भाई...शिरीष भाई..यदि ये धीमी गति ..पाठको की गुज़ारिश पर हुई है तो...........
    मैं इससे कृत्रिम मानता हूँ..........
    और शायद ये speed control या slow postings अनुनाद पर ,मेरी नज़र में , पहली कृत्रिम चीज़ है जो नज़र आई है....
    शिरीष भाई आप नैनीताल में कल किसी पेड़ को उसकी स्वाभाविक गति से थोडा कम गति से बढने के लिए कहना...ताकि बच्चे उसके जादा फल खा सके....

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  12. ok shireesh, do what he says.
    we'll manage by clicking older posts..... lest we lag behind for some sloth type poets....

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