Friday, January 29, 2010

ख़ुद को परिभाषित करती स्त्री : कुछ बिम्ब / ईरानी कविता


ईरान की आधुनिक कविता
ख़ुद को परिभाषित करती स्त्री : कुछ बिम्ब
ईरान की युवा कवियत्रियों को मैं यहाँ पहले भी प्रस्तुत कर चुका हूँ.इस बार इनकी कुछ छोटी कवितायेँ पढवाने की मंशा है जिसमे अपने देश में व्याप्त धार्मिक,सामाजिक और राजनीतिक प्रतिबंधात्मक माहौल के बने रहते उन्होंने एक आधुनिक ईरानी स्त्री को परिभाषित करने की कोशिश की है...पर क्या ये परिभाषाएं ईरान की भौगोलिक सीमा में ही बाँधी जा सकती हैं?इन कविताओं को पढ़ कर इस प्रश्न का उत्तर आप खोजने को मजबूर हो जायेंगे,मुझे पूरा भरोसा है...(यादवेन्द्र)
जलेह इस्फ़हानी

मैं कैसे रहूँ चुप???

पर मैं हूँ कौन सी बला ?
क्या महज एक बंदी
ज़मीन में गडी ज़ंजीरों से जकड़ी हुई...
इसी चुप्पी में डूबती जा रही है मेरी उमर
इसी चुप्पी में होती जा रही हूँ मैं शेष
और सरकती जा रही हूँ मौत के क़रीब
और क़रीब देखते देखते
वह समय अब दूर नहीं
जब कुछ भी शेष नहीं बचेगा मेरा
सिवा मुट्ठी भर राख के....
***
शोलेह वोल्पे
अंततः ये पुरुषों की दुनिया है

सीधी सीधी बात है
कि मैं एक स्त्री हूँ...
मेरी ओर ताकना गुनाह है
मुझे तो बुर्के में ढंका लिपटा होना चाहिए
सर से पैर तक
मेरी आवाज सुन कर
डोल बहक सकता है किसी का भी मन
और इस पर तानाशाही अंकुश रखना होगा...
मेरे लिए तो
किसी तरह का सोच विचार वर्जित है
इसी लिए स्कूलों से रखो मुझे मीलों दूर..
यह सब बर्दाश्त करना होगा मुझे
और मरना भी होगा गुमसुम
बगैर मुह खोले
बगैर किसी उलाहने और शिकवे के
तभी मुझे मिल पायेगी जन्नत में प्रवेश की इजाजत...
वहां मुझे संगमरमरी बादलों के दालान के बीचों बीच
करनी होगी नुमाइश संभाल कर रखे हुए अपने नंगे बदन की
खुशनसीब बन्दों को खिलाने होंगे रसीले अंगूर
पेश करनी होगी उन्हें सुनहरे प्यालों से शराब
और गुनगुनाने होंगे उनके लिए
प्रेम पगे नशीले गीत...
***
फरीदेह हसनज़देह मोस्ताफावी
मेरी ख्वाहिश

काश मैं सर्दियों में जम जाती
जैसे जम जाता है पानी धरती पर बने छोटे बड़े गड्ढों में
कि चलते चलते लोग बाग़ ठिठक कर देखते नीचे...
कैसी उभर आई हैं मेरी रूह में झुर्रियां
और टूटे हुए दिल में दरारें.....

काश मैं कभी कभार
दहल जाती धरती जैसे लेती है अंगडाई
और मुझे संभाले हुए तमाम खम्भे
धराशायी हो जाते पलक झपकते..
तब लोगों को यकीन आता
मेरे दिल के तहखाने में कैसे कलपता है दुःख...

काश मैं उग पाती
हर सुबह सूरज की मानिंद
और आलोकित कर देती
बर्फ से ढंके पर्वत और धरती...
ताकि लोग कभी न सोच पायें
कि रहा जा सकता है दुनिया में
प्यार की उफनती ललक के बगैर भी...
***
मीना असदी
स्वप्नों की अँगड़ाईयां

यदि वे जिन्दा बचे होते
तो उनमे अब चटक रहे होते फूल
मैं बादाम के उन दरख्तों की बात कर रही हूँ
जो बच गए थे कुल्हाड़ियों की मार से....

यदि वे आज होते
तो बच्चों के मुह लबालब भरे होते
पके बादाम के तरल अमृतमय रस से ..
और इनमे होता स्वाद
कडवे बादाम का भी शामिल...

यदि वे आज होते.......
***

मेरे लिए तो अंगूठी भी है एक बंधन

मुझे इबादत करते वक्त बैठने वाले आसनों का ख्याल नहीं आता
पर सैकड़ों रास्तों के बारे में जरुर सोचती हूँ
जो हो कर गुजरते हैं चिकने सुन्दर दरख्तों वाले
सैकड़ों बागों के अन्दर से...

मुझे मालूम है क़िबला* की बाबत
कि इसका अस्तित्व वहीँ है जहाँ हैं खुशियाँ...
और मैं हर रोज करती हूँ इबादत
इन्ही मखमली रास्तों पर
गौरैयों के संगीत की संगत में..

मुझे नहीं मालूम क्या होता है स्नेह
या एक और दूसरे मुल्क के बीच
क्या क्या होता है अंतर...
अकेलेपन को मैं कहती हूँ ख़ुशी
और रेगिस्तान को अपना घर
और प्यार नाम देती हूँ उस सब को
जो मुझे कर देता है उदास और रुंआसा...

मेरे लिए पांच पौंड का नोट दौलत है
और जो कोई दिखाई दे फूल तोड़ता हुआ
मैं उसको अंधा कह कर पुकारती हूँ...
मेरी निगाह में मछली को पानी से
जुदा कर देने वाला जाल
क़ातिल है...निरा क़ातिल...

मैं समुद्र को ईर्ष्यालु होकर देखती हूँ
और कहती हूँ..तुम कितने छोटे हो मेरे प्यारे...
शायद समुद्र को भी
लगता होगा मैं सच बोल रही हूँ
जब वो मिलने जाता होगा
महासागर से...

मुझे नहीं मालूम क्या होती है रात
पर दिन की बाबत मुझे बखूबी पता है
मेरे लिए जंगली फूलों की झाड़ी
एक सजा संवरा सा गाँव है
और स्मृतियों के बाग़ की सैर
आज़ादी हैं...आज़ादी....
और अनसोची कोई सी भी मुस्कान
ख़ुशी है बे-शुमार...
मेरे लिए तो कोई भी शख्स
जो ले कर चलता है पिंजरा अपने साथ
जेलर से कम कुछ भी नहीं...

मुझे लगता है कि कोई भी विचार
जो बे मतलब ठहर गया हो मन में बस यूँ ही
भारी- भरकम - सी एक दीवार है ...
***
*क़िबला- क़ाबा की दिशा

Tuesday, January 26, 2010

व्योमेश शुक्ल की एक कविता

राजदूत

थकी हुई और चुप उपेक्षा के बरामदे में वह खड़ी है
अपने रोज़ मद्धिम होते कालेपन में
जैसे कहती हुई बहुत साथ दिया तुम्हारा अब बस
मुझे यहीं खड़े-खड़े पुर्जा-पुर्जा होने दो
तुम्हारे बच्चों के बच्चे खेलें मुझसे
किसी कल्पलोक में चले जाएं मुझ पर बैठ
अपने मुंह से एक विव्हल सच्ची ध्वनि निकालें
जो संसार को मेरी इंजन आवाज़ लगे
एक स्वाभिमानी गड़गड़ाहट
जिसका अतिनिश्चित आवर्तन
डगडगडगडगडगडगडगडग

यदि कोई एक्सीलेटर पर हाथ न लगाए तो मेरी
विश्वसनीय लयकारी कभी बेताल नहीं होती
तुम्हारे बड़े बच्चे ने इसी पर साधा अपना तबला
मेरे अविराम लहरे पर हुलसकर बजाता वह अपने मन में
तीनताल एकताल झपताल धमार कहरवा दादरा
इनके टुकड़े तिहाइयां चक्करदार परनें
और ख़ुद ग़लती न करे तो हर बार सम आता
मैं झूम-झूम जाती
तुम थरथरा जाते होगे उन क्षणों में कि अरे
यह इसे क्या हो गया
उससे छोटी सन्तान तुम्हारी बेटी को मैं जन्म के पहले से जानती हूँ
मां उसकी तुम्हारी पत्नी
गर्भ में ले उसे जब-जब तुम्हारे साथ मुझ पर बैठती
मैं सांय-सांय में गड़गड़ाना चाहती
कि बच्चे की पहली से भी पहली नींद न टूट जाए कहीं
मेरे दुनियावी शोर से
इस तरह वह सोती ही रहती
हालांकि सुनती भी रहती मुझे
उसने तो इस क़दर सुना है मुझको
कि अब भी सोचती है कि मेरी आवाज़ का लगातार ही
समय बीतना है
याद करो सत्तर के दशक के अन्त और शुरू अस्सी में
मैं ही फैशन थी
चिकनी काली कुछ-कुछ ग्राम्य काया के साथ कूद पड़ी
तब मैं
तुम्हारे देश की ध्वस्त सड़कों पर
उन्हें मैंने अपना माना वे मुझे अन्तरंग तक बुलाती रहीं
एस्कार्ट्स कंपनी की तब मैं चरम उपलब्धि हिन्दी मेरा नाम
`राजदूत´
तभी किंचित ठिगना भी मेरा एक संस्करण आया
लेकिन ख़ुद मुझे नापसन्द था वह
दया मांगता हुआ अपनी कातर पटपटाहट में
अपने रूप गुण से मैंने ही पराजित कर डाला उसे

जीजा जी की मौत के दुख में यह सोचना
कि चलना छोड़ दूं
विश्वासघात होता तब तुम्हारे परिवार के साथ
इसलिए समझते हुए कि मुझ पर जिम्मेदारियों का अब और बोझ है
मैं और निष्ठां और वेग से चली
जैसे रुलाई रोकने का यही एकमात्र तरीका हो
मुझे तुमने “मशान अस्पताल थाने कचहरी सिनेमाहॉल
जन्मदिन पहाड़ और झरने और कर्फ्यू में खड़ा किया
मैं खड़ी रही हिली नहीं
किसी निर्बल उठाइगिरे के खिलाफ़ अपने वज़न से लगातार चुनौती बनी हुई
कुछ यूँ मैंने तुमने मिलकर एक समय रचा जो अब कमज़ोर हुआ जाता है
नए समय की महासड़क के सामने
मेरा और तुम्हारा समय एक पगडण्डी
जिस पर अब भी मैं ही चल सकती हूँ
लेकिन महासड़क पर मैं छूट-छूट जाती हूँ
यहां महानायक चलते हैं महावाहनों पर
एक लीटर में अस्सी किलोमीटर की बचत और
इच्छाओं के वेग से
महाबलशाली वाहन उनके महासमर्थ चालक
महाविज्ञापनों के ज़रिये होता महाप्रचार
मेरा तो दम फूल जाता है
जल्दी-जल्दी प्यास लगती है
और वह दिन तो मैं कभी नहीं भूलूंगी
जब तुम्हारा एक शुभेच्छु तुमसे बोला था कि
`यार इसे बेचकर और कुछ पैसे मिलाकर, एक साइकिल ख़्ारीद लो´
वह पत्नीपीड़क घूसखोर क्या समझेगा मेरी अहमियत को तुम सोचे होगे
लेकिन मैं जड़ हो गई
और चकराते हुए तुम्हारे पैरों के बीच से ज़मीन पर गिरने लगी थी
भला हो तुम्हारी जांघों का मेरी पुरानी सहेलियां
बचा लिया हमेशा की तरह उन्होंने मुझे
लेकिन तय किया तभी मैंने अब सफ़र थामना होगा
जो समाज लंबी वफ़ा के बदले आपको चुटकुला बना दे
उम्र पर हंसे अपनी आत्महीनता में उसका तिरस्कार होना चाहिए
तो यही तय किया है
अब `नहीं´ बनकर खड़े हो जाना है बरामदे में इस तरह
जैसे तुम्हारी याद में !

***

Friday, January 22, 2010

कुमार अनुपम की दो कविताएँ

7 मई, 1979 को (बलरामपुर, उ.प्र.) में। शिक्षा : बी.एस.सी., एम.ए.(हिन्दी), डी.एम.एल.टी. प्रशिक्षण।
युवा कवि, चित्रकार, कला समीक्षक; लोक विधाओं में विशेष रुचि। तद्भव, नया ज्ञानोदय, हंस, कथादेश, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कथन, प्रगतिशील वसुधा, साक्षात्कार, कथाक्रम, समकालीन भारतीय साहित्य, सम्बोधन, आशय, कथ्यरूप, लमही, विपाशा, पर्वतराग, वितान, शुआ-ए-उम्मीद, अरुणाभा, कलावसुधा, कलादीर्घा, उत्तर प्रदेश, दै.हिन्दुस्तान, पाटल और पलाश, विश्व पत्रकार सदन, शिवम आदि देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, आवरण चित्र, लेख, रेखांकन, पुस्तक समीक्षाएँ प्रकाशित।
प्रदर्शकारी कलाओं की त्रैमासिक पत्रिका कलावसुधा का कला सम्पादन; साहित्य, राजनीति एवं कला की वैचारिक पत्रिका शब्द सत्ता का सह सम्पादन। अवधी ग्रन्थावली के एक खंड का जगदीश पीयूष के साथ सम्पादन सहयोग। साथ ही सर्व शिक्षा अभियान, यूनीसेफ, यू.एन.डी.पी.(विकलांग बच्चों के सहायतार्थ कार्यक्रम), आपदा प्रबन्धन कार्यक्रम, सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग (लखनऊ) के कार्यक्रमों में लोक विधा विशेषज्ञ एवं विजुलाइजर के रूप में सहभागिता। दूरदर्शन लखनऊ के साहित्यिक कार्यक्रम 'सरस्वती' का कई वर्षों तक संयोजन और संचालन। कुछ वृत्तचित्रों का लेखन।

सम्प्रति : एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान से सम्बद्ध।

(कुमार अनुपम अनुनाद पर पहली बार छप रहें हैं, एक समानधर्मा युवा का मैं यहाँ स्वागत करता हूँ।)

तीस की उम्र में जीवन-प्रसंग

मेरे बाल गिर रहे हैं और ख़्वाहिशें भी
फिर भी कार के साँवले शीशों में देख
उन्हें सँवार ही लेता हूँ
आँखों तले उम्र और समय का झुटपुटा घिर आया है
लेकिन सफ़र का भरोसा
क़ायम है मेरे क़दमों और दृष्टि पर अभी
दूर से परख लेता हूँ ख़ूबसूरती
और कृतज्ञता से ज़रा-सा कलेजा
अर्पित कर देता हूँ गुपचुप
नैवेद्य की तरह उनके अतिकरीब
नींदें कम होने लगी हैं रातों के बनिस्बत
किन्तु आफ़िस जाने की कोशिशें सुबह
अकसर सफल हो ही जाती हैं
कोयल अब भी कहीं पुकारती है ...कुक्कू... तो
घरेलू नाम ...गुल्लू... के भ्रम से चौंक चौंक जाता हूँ बारम्बार
प्रथम प्रेम और बाँसुरी न साध पाने की एक हूक-सी
उठती है अब भी
जबकि जीवन की मारामारी के बावजूद
सरगम भर गुंजाइश तो बनायी ही जा सकती थी ख़ैर
धूप-पगी खानीबबूल का स्वाद मेरी जिह्वा पर
है सुरक्षित
और सड़क पर पड़े ब्लेड और केले-छिलके को
हटाने की तत्परता भी
किन्तु खटती हुई माँ है, बहन है सयानी, भाई छोटे और बेरोज़गार
सद्य:प्रसवा बीवी है और कठिन वक्तों के घर-संसार
की जल्दबाज उम्मीदें वैसे मोहलत तो कम देती हैं
ऐसी विसंगत ख़ुराफातों की जिन्हें करता हूँ अनिवार्यत:
हालाँकि आत्मीय दुखों और सुखों में से
कुछ में ही शरीक होने का विकल्प
बमुश्किल चुनना पड़ता है मन मार घर से रहकर इत्ती दूर
छटपटाता हूँ
अब भी कविता लिखने से पूर्व और बाद में भी
कई जानलेवा खूबसूरतियाँ एक साथ मुझे पसन्द करती हैं
मेरी होशियारी और पापों के बावजूद
अभी मर तो नहीं सकता सम्पूर्ण।
***

विरुद्धों के सामंजस्य का पराभौतिक अन्तिम दस्तावेज

पुरखों की स्मृतियों और आस और अस्थियों
पर थमी थी घर की ईंट ईंट
ऊहापोह और अतृप्ति का कुटुम्ब
वहीं चढ़ाता था अपनी तृष्णा पर सान
एक कबीर अपनी धमनियों से बुनने की
मशक्कत में एक चादर निर्गुन पुकार में
बदल जाता था बारम्बार
कि सपनों की निहंगम देह के बरक्स
छोटा पड़ जाता था हरबार आकार
कि अपनी बरौनियों से भी घायल होती है आँख
बावजूद इसके, जो था, एक घर था :
विरुद्धों के सामंजस्य का पराभौतिक अन्तिम दस्तावेज़
बीसवीं सदी के बिचले वर्षों में
स्मृतियाँ और स्वप्न जहाँ दिख रहे हैं
सहमत सगोतिया पात्र
अलबम की तस्वीर है अब मात्र
फासलों को पाटने की
वैश्विक कारसेवा में बौखलाया था
जब सारा जहान
दिखा, तभी पहली पहली दफा अतिस्पष्ट
देखकर भी जिसे
किया जाता रहा था अदेखा
शिष्टता के पश्चात्ताप का छछन्द
और दीवारों और स्मृतियों से
एक एक कर उधड़ते गये
बूढ़ी त्वचा के पैबन्द
गुमराह आँधियों के जोर से फटते गये आत्मा के घाव
और
इक्कीसवीं सदी का अवतार हुआ
मध्यवर्गीय इतिहास के तथाकथित अन्त के उपरान्त
कुछ तालियाँ बजीं कुछ ठहाके गूंजे नेपथ्य से
कुछ जश्न हुए सात समुन्दर पार
एक वैश्विक गुंडे ने डकार खारिज की
राहत की सुरक्षित साँस ली
अनावश्यक और बेवजह
घटित हुआ
प्रतीक्षित शक
कि घटना कोई
घटती नहीं अचानक
किश्तों में भरी जाती है हींग आत्मघाती
सूखती है धीरे धीरे भीतर की नमी
मन्द पड़ता है कोशिकाओं का व्यवहार
धराशाई होता है तब एक चीड़ का छतनार
धीरे धीरे धीरे लुप्त होती है एक संस्कृति
एक प्रजाति
षड्यन्त्र के गर्भ में बिला जाती है
'ख़ैर !' को जुमले की तरह प्रयोग करने से बचता है एक कवि
अपनी चहारदीवारी में लौटने से पहले
कि कुटुम्ब की अवधारणा ही अपदस्थ
जब घर की नयी संकल्पना से
ऐसे में गल्प से अधिक नहीं रह जाता
यह यथार्थ।
***
वर्तमान सम्पर्क : सी-सेकंड टाइप-173, लोदी कॉलोनी, नयी दिल्ली - 3 स्थायी सम्पर्क : शान्तिकुंज, निकट कटार सिंह स्कूल, मो. - पूरबटोला, शहर व ज़िला - बलरामपुर, उ.प्र. - 271201 मोबाइल नं. : 09873372181

Wednesday, January 20, 2010

सुषमा नैथानी की कविताएँ

आत्मपरिचय


पता नहीं ये परिचय भी कितना परिचय है, पर कम से कम इसकी तथ्यपरक शिनाख्त हो सकती है।

मूलत: उत्तराखंड से. स्नातक (B. Sc.) तक की शिक्षा उत्तराखंड के करीब दर्ज़न भर कस्बो और शहरों में. M. Sc. बायोटेक्नोलोजी, PhD. बाटनी. १९९० में उत्तराखंड से विस्थापन, फिर लम्बी यायावरी के बाद देश निकाला, एक तरह से स्थायी रूप से विस्थापित. करीब एक दशक तक कोर्नेल युनिवर्सीटी में जीवन बीता, और २००८ से ओरेगन स्टेट युनिवर्सीटी में रीसर्च और अध्यापन में संलग्न. इसके अलावा दो प्यारे बच्चों की माँ हूँ, जो मुझे रोज़ कुछ-कुछ अंग्रेजी सिखाते है, लैब से और कंप्यूटर से खींचकर ताज़ी हवा में लाते रहते है. कविता लिखना, खुद से बात करने का एक तरीका है. अपनी माईक्रोस्कोपिक रीसर्च की दुनिया के बाहर झांकने की एक खिड़की भी है. और वास्तविकता के साथ मनमाफिक तरीके से सपनो के घालमेल करने की स्वतंत्रता भी.
ब्लॉग: स्वप्नदर्शी


जीवन

जीवन के वैविध्य के चित्र उकेरना
कुछ इस तरह है, जैसे एक अनाड़ी, दर्जी
आड़ी, तिरछी, बेहिसाब लम्बी और बौनी परछाईयों के माप से, सिलता रहे कपड़े
या फ़िर एक अकेला चरवाहा किसी पहाड़ की मूंठ से
अपनी ही प्रतिध्वनी की गूंज मे बुनता रहे भ्रम
और नकारता रहे जीवन का इकहरापन,

जीवन का इकहरापन किसी सुनसान,निर्जन पहाडी घाटी की तरह
पैर पसारे हुए है, ठीक राजधानी के कोलहल मे कहीं भी,
जगमगाती माल में, बेहिसाब भीडभाड़ से अटी सड़को पर
घर-परिवार के सलौने चमकते संसार में भी
और यहाँ तक कि लगातार बुदबुदाते, भन्नाते काल सेंटर्स में भी
जहाँ रात मे भी कायम रहता है पूरी दूनिया से संवाद
खरीदने-बेचने का, उधार और भुगतान का
और बंद खिडकियों और अंधेरे कौनो के बीच
खड़-खड़ करती मशीनों और आदमियों के बीच भी

जीवन की इकहरी इबारते इसी तरह से फ़ैली है
गाँव घर के गलियारों से लेकर शिक्षा संस्थानों मे, बाजारों मे
जहां दो भाषाओं मे संवाद होता है
एक भाषा जो निहायत व्यापार की भाषा है
और दूसरी नितांत लाचारी की
कहने और सुनने वाले अपनी अपनी कलाकारी से
उसे कभी संगीत में, कभी साहित्य में,
कभी संस्कृति में, और अक्सर देश की प्रगति की
उभरती हुयी तस्वीर में बदल देते है।
***

किताब और जीवन: पामुक को पढ़ते हुए

खोली थी एक किताब, किताब ने खोली एक समूची दुनिया,
एक अनजाना भूगोल, चिंदी-चिंदी इतिहास, बोली, भाषा,
समय और काल की अनंत क्षितिज पर रंग और रोशनी का रिश्ता.
कभी धीमे, कभी बदहवास, कभी अचेत,
मन की नदी में उफनते रहे भीतर ही भीतर
कुछ अंजाने, अचीन्हे भाव, नदी के तट पर उठती, गिरती रही
बदलते मौसम की सर्द हवाएं।
बहुत गहरे उतर गयी एक स्त्री की जिंजिविशा
अंधेरी गुफाओं में रोशनी की तरह
भविष्य को भनक लगने से पहले
वों बुनती रही भविष्य
स्वाभिमान के साथ दो बच्चों की मां है स्त्री
बेटी,पत्नी, मां और प्रेमिका बनकर भी ख़त्म नहीं होती स्त्री
बचाए रखती है, जगह अपने भीतर अपने लिए...

कुछ जगमग हो उठते हैं हाशिये के बिम्ब
शिनाख्त करते हुए कई संभावनाओं की
रिश्ते नहीं दिखते पीतल से ठोस और ठन्डे
न ही सफ़ेद और स्याह अक्स की शक्ल में
बिखरे हुए उजास के सतरंगी आकाश में
किताब कितना कुछ कहती है
और जीवन फिर भी पढता है इकहरे ककहरे
सहमता है फिर-फिर चिर-परिचित खांचों में
बार-बार छोड़ता नहीं अटपटे समीकरणों का मोह
सवाल हल करने का एक शर्तिया बेढब तरीका
किताब की रूपरेखा होती है सोची समझी,
कई हाथों में पगी, एक सुलझी गुत्थी
जीवन को ये सब सहूलियत कहाँ
यह्ना तो अचानक से डूबना है, और डूबते हुए तैरना हैं
***

स्मृति के छल

अशंकित है बड़े, बूढ़े और समझदार
हमेशा की तरह आनेवाले समय को लेकर,
ढूंढते है सुकून बहुत पीछे छूटी दुनिया में
जो अब कंही नहीं है, धुंधली पड़ गयी है स्मृति भी,
छांटकर, पोंछकर सजा ली है मन ने स्मृति की दुनिया,
कारीगरी से बचा लिया है सिर्फ अल्हड़ बरसों का रोमान,
और मिटा दिए कई कई बेतरबीब निशान
जीवन की लम्बी सुरंग के अँधेरे के,
लोप गयी है स्मृति काटती कचोटती बैचेनियों की
खो गया है सन्दर्भ, घुल मिल गए हैं सुख और दुःख
इस तरह कि स्मृति भी नींद में देखे सपने जैसी है
सपने में है सांत्वना,

स्मृति भी अगर न होती इतनी छलना,
एक सफल फैशन डिजानर,
ज़रुरत, समय, और उम्र के साथ,
नित्य भाव, भेष बदलती मॉडल
तो कौन इसे सीने से लगाए घूमता?
क्यूँ ढूंढता ढांढस अतीत में,
पकड़ता बार-बार उसका पल्ला,
वर्तमान और भविष्य की यात्रा के बीच.
***
दोस्तियाँ

कितनी अजीब बात है कि सोचे समझे जीवन में,
बिन मौसम बरसात से टपक जाते है दोस्त
और समझ चली जाती है पानी भरने,
कोई पूछता है किस तरह की दोस्ती?
कैसे दोस्त? कब मिले?
और फिर बताया भी नहीं जा सकता कि कैसे बिन बताए,
ऐसे अचानक आगए ये सारे जीवन के भीतर
रात को एक लडकी मिल गयी थी पीसीओं की लाइन पर,
कोई मिली थी अचानक से हॉस्टल की मेस में, कोई बस में,
किसी ने ऐसे ही घनी, गिरती बर्फ में कार में लिफ्ट दे दी थी
दो लड़कियों के साथ बिताये थे दो साल हॉस्टल के एक कमरे में,
कुछ के साथ बैठा जाता था एक हरे रंग की झील के नौक पर उगी चट्टान पर

ऐसे ही राह चलते, पोस्टर चिपकाते,
पर्चे बांटते कुछ लड़कों से हो गयी थी बातचीत,
दो लड़के घर से बना लंच लाते थे,
और हॉस्टल के टिफीन से बदलने पर मुहँ नहीं बनाते थे
कुछ लड़कों के साथ उलटे पुलट तरह खेले गए क्रिकेट के मायने से
अलग कुछ देर ही सही दरक जाती थी दीवारे
एक लड़के ने जान पर खेलकर सीखायी थी बाईक, बेहद तंग गलियों में,
और कोई कई सालों लेकर आता रहा जेब में तुड़ी-मुडी कविताएं
फैलता रहा कुछ उजाला, बनती रही दोस्तियाँ
टूटते रहे बहन और प्रेमिका के विद्रूप खांचे
आधी दुनिया का अतिक्रमण कर कुछ हद तक सांस लेते रहे पूरी दुनिया में,
और बिना सोची समझी दोस्तियों ने ही मुमकिन बनाया इसे
***
प्रेम के बिम्ब और निषिद्ध स्त्रियाँ

हेलोवीन की रात चुड़ैल बनकर घूमना चाहती हूँ
और कुछ देर विलुप्त होना चाहती हूँ, अन्धकार की दूनिया में
बतियाना चाहती हूँ निषिद्ध स्त्रियों से, चखना चाहती हूँ वों अभिमंत्रित जल
स्त्री के आदिम निषिद्ध, गुप्त ज्ञान का भागी होना चाहती हूँ
सेलम की चुड़ैलों मे से एक चुड़ैल मैं भी होना चाहती हूँ।

मेरे दोस्त तुम पूछते हो कि कोई कहे कि तुमसे प्यार करता हूँ
तो क्या तराजू लेकर खड़ी हो जाओगी?
अरे नही तुम ऐसा नही करोगी!
प्यार की उदात्त भावना का सम्मान करोगी,
प्यार की उड़ान में सितारों में विचरने लगोगी,
तुम भली लड़की, राधारानी विहाग गाओगी,

नहीं दोस्त, राधारानी का हज़ारों सालों पुराना मर्सिया नहीं
मुझे तो अक्सर लुभाती है, दूनिया भर की निषिद्ध स्त्रियाँ,
चुडैलें, डायन, जादूगरनियां, इतिहास की धुरी घुमाने वाली मंथरा दासी
खुबसूरत काया से परे, ये औरते गढ़ती है औरत होने के दूसरे बिम्ब,
घर-परिवार की चौखट के बाहर है इनकी दख़ल का घेरा
वेश-भूषा के परे है इनका आतंक, बहुत गहरे मानस की तहों में
लालायित हूँ उसी निषिद्ध ज्ञान के लिए, जिससे रोशनी डरती है,
शायद वहीँ से निकलेंगे, औरत की अस्मिता के कुछ नए बिम्ब
औरत के वज़ूद को रौंदती रोशनी की दूनिया,
शताब्दियों से जलाती रही है चुड़ैलों की बस्तिया
स्त्री को खारिज़ कर रचती रही है नायिका भेद के पाखण्ड
फ़िर भी चुड़ैलें अँधेरे के आगोश में बदलती रही हाथ से हाथ
बचाती रही अपनी दुनिया को देखने की दृष्टि

मैं बिल्कुल साफ़ साफ़ शिनाख्त करना चाहती हूँ
कई चीजों की, बिल्कुल स्थूल रूप मे
ताकि सूक्ष्म विवेचना उनके तत्व को हर न ले
प्रेम की उदात्त भावना भी उनमे से एक है।
मैं वाकई जानना चाहती हूँ इसका मतलब
उस पढी-लिखी इंजीनियर स्त्री के लिए
जो तीन दिन तक मरा बच्चा कोख मे लेकर
अस्पताल जाने का साहस नही जुटा पाती
और झुक-झुक कर पैर छूती है पचासेक लोगो के

मैं उस स्त्री के ह्रदय से भी जानना चाहती हूँ प्रेम का मतलब,
जो हकबक है प्रेमी के पिता द्वारा इस्तेमाल किए गए
वेश्यावाचक संबोधनों से
एक रेड हेड (लाल बालों वाली आयरिश स्त्री) से
कि कैसे लगता है जब एअरपोर्ट पर प्रेम मे पगी
प्रेमी को छोड़ने जाती है, और प्रेमी का दोस्त बताता है
कि प्रेमी हिन्दुस्तान या फ़िर किसी भी दूसरे देश
जा रहा है शादी रचाने, और कैसे आधी रात तक पब मे बैठे
वों एक गंवार जाहिल के साथ चली जाती है अपनी रात कोयला करने

उस स्त्री से भी जानना चाहती हूँ,
जो प्रेम-विवाह के छ: महीने के अन्तराल मे
पति की गृहस्थी जमाने का सपने लिए
सात समंदर पार जाती है
और पति की गर्भवती प्रेमिका के साथ
एक महीने दो कमरे मे बसर करती है

और भी बहुत सारे बिम्ब है प्रेम के जिनको
मैं बहुत ठीक-ठीक समझ लेना चाहती हूँ।
और इससे पहले की प्रेम मे पगूं
सितारों की दूनिया मे अपना चाँद खोजूं
मैं वाकई तराजू लेकर खड़ी रहूंगी
कि प्यार का वज़न मुझसे संभलता है कि नही ?
***
ये कविताएँ सुषमा जी ने मेरे आग्रह पर अनुनाद के लिए अत्यंत संकोच के साथ उपलब्ध करायीं। मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ। कायदे से इन्हें एक एक कर लगाया जाना था, पर मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। इन कविताओं को यहाँ छाप कर मुझे एहसास हो रहा है कि अनुनाद के जिस स्वरुप की कल्पना मैंने की थी उसे अपने लिए धीरे धीरे अब साकार कर पा रहा हूँ।

Saturday, January 16, 2010

चट्टान जो हथौड़े से चूर कर दी गई



1

डेनिस ब्रुटुस के बारे में अमेरिकी खेल पत्रकार डेव ज़िरिन लिखते हैं- ही शेम्ड दि शेमलेस.

1964 में तोक्यो में हुए ओलम्पिक खेलों से दक्षिण अफ्रीका की सहभागिता पर लगा प्रतिबन्ध ब्रुटुस द्वारा चलाई गई अंतर्राष्ट्रीय मुहिम का ही नतीजा था. एक सीधा-सादा सवाल ब्रुटुस बार बार पूछते रहे कि अगर ओलम्पिक ब्रदरहुड और फेयर प्ले का प्रतीक हैं तो इस खेल उत्सव में रंगभेदी राष्ट्र कैसे शामिल हो सकते हैं? बेशर्म आखिर शर्मिंदा हुए और दक्षिण अफ्रीका को न केवल ओलम्पिक बल्कि लगभग हर अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजन से बदर कर दिया गया.

दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने ब्रुटुस के इस स्पोर्ट्स एक्टिविज़्म के कारण उन पर पाबंदियाँ लगा दीं; परिवारवालों के अलावा किसी से भी मिलने-जुलने पर रोक लग गई. कुछ समय बाद विदेशी पत्रकारों से मिलकर उन्होंने इस पाबंदी का उल्लंघन किया, तो डेढ़ साल क़ैद की सजा सुना दी गई. जमानत पर रिहा हुए तो भाग कर मोज़ाम्बिक चले गए, लेकिन वहां की पुलिस ने उन्हें पकड़कर फिर दक्षिण अफ्रीका वापिस भेज दिया.

इसके बाद भागने की एक और कोशिश में पुलिस की गोली खानी पड़ी; खून से लथपथ अवस्था में भी गोरों की एम्बुलंस ने उन्हें अस्पताल पहुँचाने से मना कर दिया. पर वाह री जिजीविषा जिसने अश्वेतों की एम्बुलंस के पहुँचने तक जान छोड़ने न दी. जख्म अभी ठीक से भरा भी न था कि उन्हें कुख्यात रॉबन द्वीप भेज दिया गया जहाँ उन्होंने सोलह महीनों की सज़ा काटी.

जेल में लिखी कविताओं का उनका पहला संकलन ' Sirens Knuckles Boots' उन दिनों नाइजीरिया में प्रकाशित हुआ. जेल की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर जिन आवाजों का खौफ़नाक साया होता है- चीखते साइरन, कड़कड़ाकर मुट्ठियों में बदल जाने वाले उँगलियों के जोड़ और धड़धड़ाते पुलिसिया जूते - संकलन का शीर्षक उन्हीं की ओर इशारा करता है. लेटर्स टू मार्था एंड अदर पोएम्स फ्रॉम अ साउथ अफ्रीकन प्रिज़न, अ सिंपल लस्ट, स्टबर्न होप और एयर्स एंड ट्रिब्युट्स उनके अन्य प्रकाशित संकलन हैं.

दक्षिण अफ्रीका छोड़ने पर उन्होंने कुछ साल ब्रिटेन में बिताये और अंततः अमेरिका में राजनीतिक शरण ली. 1981 में रीगन-राज शुरू होने पर सरकारी नीति बदली और ब्रुटुस को दक्षिण अफ्रीका वापिस भेजने के प्रयास हुए. इस बार ब्रुटुस ने लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की.

रंगभेद की समाप्ति के पश्चात वे दक्षिण अफ्रीका लौटे; अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की सरकार द्वारा अपनाई गई नव-उदारवादी नीतियों के वे मुखर विरोधी बने रहे.

रंगभेद की एक व्यवस्था से निकल कर हम वैश्विक रंगभेद में प्रवेश कर गए हैं. अब हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ संपत्ति बहुत थोड़े लोगों के हाथों में जमा है, बहुत सारी जनता अब भी गरीब है; ऐसा समाज जो अमीरों और बड़े निगमों को बचाने के लिए कृतसंकल्प है और वास्तव में गरीब पीसे जा रहे हैं, उन पर बोझ बढ़ रहा है, अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस की सरकार के राज में जिसकी उम्मीद की थी यह ठीक उसके उलट हो रहा है.

अपने रंगभेद-विरोधी कार्यों, विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं की नव-साम्राज्यवादी नीतियों के विरोध और वैश्विक न्याय के पक्ष में जनसांगठनिक कामों के लिए वे दुनिया भर के एक्टिविस्टों के प्रेरणा स्त्रोत बने रहे. प्रोस्टेट कैंसर से लम्बी लड़ाई लड़कर 26 दिसम्बर 2009 को केप टाउन में अपनी अंतिम सांस लेने से कुछ ही दिन पहले वे कोपेनहेगन सम्मलेन में विरोध प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन कर रहे थे.

ब्लू कॉलर रिव्यू के शरद ऋतु अंक के अंतिम पृष्ठ पर ब्रुटुस की ये पंक्तियाँ छपी हैं.

एक वक़्त आएगा
एक वक़्त आएगा हमें भरोसा है
जब इस ग्रह का आकार
और ज़मीन के बंटवारे
कम महत्त्वपूर्ण माने जायेंगे
दोस्ती के उजाले में हम खुद को दमकता पायेंगे
एक लाल सितारा-ए-उम्मीद
हमारी ज़िन्दगियों को रोशन करेगा
उम्मीद का तारा
ख़ुशी का तारा
एक सितारा-ए-आज़ादी


2


चट्टान जो हथौड़े से चूर कर दी गई

डेनिस ब्रुटुस के लिए, उनके अस्सीवें जन्मदिन पर


1963 और मार्शल स्क्वेअर स्टेशन से होकर
थके-थके कदमों से चलते कर्मचारियों को नहीं पता था कि
तुम उस रस्ते पर उन सभी के बीच घुस पड़ोगे
यह सोचकर कि पुलिस भीड़ पर गोली नहीं चलाएगी
जब सार्जंट क्लेंगेल्ड के काँपते हाथों और पुट्ठों पर लगी पिस्तौल से
तुम छूटकर भागे
तो उसे नहीं पता था कि
तुम्हारी ज़िन्दगी की किताब में वह बन जायेगा एक फुटनोट

जिसने तुम्हारी पीठ पर गोली मारी
मोड़ पर खड़े सादे भेस वाले उस पुलिसिये को नहीं पता था कि
वह कारतूस रंगभेद के संग्रहालय में एक कांच के मर्तबान में जगह पाएगी
खून से लथपथ ज़मीन पर कसमसाते पड़े एक अश्वेत आदमी को देखते
तमाशाइयों को नहीं पता था कि
उनके जूते खून में बरसों तक फिसलते रहेंगे

स्ट्रेचर समेट कर तुम्हें गोरों के अस्पताल ले जाने से मना करते हुए
एम्बुलंस वालों को नहीं पता था कि
वे बैठे रहेंगे नरक के इमर्जन्सी रूम में अनंत काल तक
उस रोग से तड़पते हुए
जिसमें काली पड़ जाएगी उनकी त्वचा
और वे साबुन के लिए चिल्लाते रह जाएंगे

जब तुम मंडेला के साथ हथौड़े से पत्थर तोड़ रहे थे
तो रॉबन द्वीप के पहरेदारों को नहीं पता था कि
उनके बाप-दादाओं का दक्षिण अफ्रीका
उन कैदियों द्वारा हथौड़े से चूर-चूर कर दिया जाएगा
जो बैलट के गणतंत्र के दिवास्वप्न देखते
पर पहरेदार की इजाज़त के बिना पेशाब तक नहीं कर पाते

क्या तुम्हें पता था?
जब उस गोली ने तुम्हारे शरीर के ब्रम्हाण्ड के
तारों को भक से उड़ा दिया
क्या तुम जानते थे, तुम्हारे उजाले में दूसरे लोग पढेंगे घोषणापत्र ?
गोरी एम्बुलंस के चले जाने के बाद, और अश्वेत एम्बुलंस के आ पहुँचने से पहले
क्या तुम्हें पता था कि
तुम बच जाओगे आखिरकार
और मंडेला और हर जनाज़े में नाचते लाखों प्रदर्शनकारियों के साथ
एम्बुलंस के रंगभेद को देशनिकाला दे दोगे?
उस चट्टान के जड़ चेहरे पर हथौड़ा जड़ते हुए
क्या तुम्हें पता था कि पुलिस राज उस चट्टान से ज़्यादा कुछ नहीं
जो इंतज़ार कर रही है धूल की कीमियागिरी का?
क्या तुम्हें पता था कि चालीस सालों बाद
कॉलेज प्रेसिडेंट और अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर
तुम्हारे एहतराम में उठाएंगे अपने जाम
और ताज्जुब करेंगे कि
पीठ में गोली लिए वे कैसी कविता रच पाते?

जिन्हें हम पयम्बर मानते हैं, वे क्या जानते हैं?
क्या वे लगा सकते हैं कयास इस बात का
कि आज से चालीस बरस बाद दुनिया कैसी होगी?

दाढ़ी पयम्बरी का प्रतीक नहीं होती
वह तो होती है आदमी के चेहरे का इतिहास
तुम्हें किसी फ़रिश्ते ने भीड़ में नहीं धकेला था
तुम भागे थे क्योंकि तुम्हारे दिल की जानिब दौड़ते लहू ने
तुम्हें चेताया था कि जेल की कब्र तुम्हें निगल जायेगी
न तो स्वप्न में किसी आकाशवाणी ने अभय के दृश्य ही पसारे तुम्हारे आगे
अपनी प्रतिबंधित कविताएँ तुमने
चिट्ठियों के रूप में पठाईं अपनी भावज को
क्योंकि दुनिया की ख़ामोशी
एक तूफ़ान था तुम्हारे कानों में हहराता हुआ

दक्षिण अफ्रीका को पता है. कभी किसी कवि से न कहा जाए: मत बोलो यह बात

जब पहरेदार तुम्हें अपनी कोठरी में सर हिलाते देख रहे थे
जब तुम गोली के घाव के ताज़ा टांकों को सहला रहे थे
तब भी तुम्हारी खोपड़ी में ये शब्द धड़क रहे थे:
साइरंस नकल्स बूट्स. साइरंस नकल्स बूट्स.
साइरंस नकल्स बूट्स.


(मार्टिन एस्पादा के संकलन 'रिपब्लिक ऑफ़ पोएट्री' से)

*****

Wednesday, January 13, 2010

मेदी लोकितो

मेदी लोकितो १९६२ में जनमी इंडोनेशिया की आधुनिक काव्य धारा की चर्चित कवि हैं . दो बच्चों की माँ लोकितो चीनी मूल की इंडोनेशियाई कवि हैं.उनका कहना है कि साहित्य उनका लक्ष्य था नहीं पर एक बड़े और लोकप्रिय इंडोनेशियाई कवि और फिल्मकार की प्रेरणा से उनका आक्सिडेंट्ली साहित्य से जुडाव हो गया,और अब तो वे इंडोनेसिया की महत्वपूर्ण कवि मानी जाती हैं.उनके ३ संकलन तो प्रकाशित हैं ही साथ ही देश और विदेश की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में भी कवितायेँ छप चुकी हैं. नवोदित साहित्यकारों को बढ़ावा देने और उनको आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने की दिशा में भी उन्होंने विशेष काम किया है...खास तौर पर नेट के माध्यम से.साहित्य के अलावा वे देसी हस्तकला के उन्नयन के लिए भी काम करती हैं. यहाँ प्रस्तुत है उनकी कुछ बेहद छोटी रचनाएँ...

पिछवाड़ा

बरसात ने छू दिए
पत्तियों के नोंक
उग आये इन्द्रधनुष
मेरे पिछवाड़े में...
***
यात्रा
धरती पर नाव खेना
न लहरें..यहाँ तक कि अंधड़ भी नहीं
फिर भी चकनाचूर हो गयी नाव
धूल से.. पत्थरों से...
***

झील

नीली पहाड़ी झील में
ईश्वर की हथेलियाँ रोपती हैं सितारे
ये सितारे ही टिमटिमाने लगते हैं
चंचल मछलियों की आँखों में...
***

तुम और मैं

अब बुढापे तक पहुँच गया तो याद ही नहीं रहा
कि मेरे ह्रदय में तन कर खड़ा हुआ है
एक विशाल वृक्ष
जिसके रसीले फल तो मैंने तोड़े ही नहीं कभी...
***

प्रार्थना

मेरे ह्रदय में बसी पहाड़ियों के चारों ओर
लिपट गयी हैं कांटेदार लत्तरें और झाड़ियाँ
पर अब इनमे कोई कोंपल नहीं फूटती
बसंत में भी
छू लेने दो अपना पावन हाथ
मेरे प्रिय ईश्वर...
***

बसंत

मेरे बाग़ में बसंत ने दस्तक दी
तो तितलियों ने चक्कर काटने शुरू कर दिए
मेरी नन्ही बेटी के इर्द गिर्द
उसके बाल फूलों जैसे जो हैं...
***

प्रस्थान

मकड़ी के जाले ने
डोरे डाल लिए चमकदार सुबह के
ओस कणों पर
जब चाँद छोड़ कर चला गया
गीली दूब को...तनहा....
***

अनुवाद तथा प्रस्तुति - यादवेंद्र

***

Sunday, January 10, 2010

"गर्भपात" पर ग्वेंडोलिन ब्रुक्स और सीमा शफ़क की कविताएँ

अनुवाद और प्रस्तुति - यादवेन्द्र

साल के पहले दिन ग्वेंडोलिन ब्रुक्स की एक कविता लगायी थी ---उसी समय मैंने मित्रों से वायदा किया था की जल्दी ही उनकी और कवितायेँ पढने को लेकर आऊंगा . यहाँ मैं १९४५ में छपी ब्रुक्स की एक बेहद महत्वपूर्ण कविता लगा रहा हूँ जिसने शुरू से ही साहित्य और सामाजिक जगत में धूम मचा दी थी...अपने विषय --गर्भपात--के कारण.कई समीक्षक इसे अमेरिका में गर्भपात पर किसी बड़े कवि की लिखी हुई पहली कविता मानते हैं .इस कविता में जैसे तुम और मैं जैसे आपस में गड्ड मड्ड होते हैं उसको लेकर ब्रुक्स पर व्यक्तिगत आक्षेप भी लगाये गए...अपने साक्षात्कारों में ब्रुक्स ने इस बारे कभी कोई सफाई नहीं दी..बस ये कहा कि ये कविता मातृत्व के गुणों का संक्षिप्त आख्यान है...१९८० में ब्रुक्स को जब व्हाइट हाउस में अमेरिका के प्रतिष्ठित कवियों के साथ काव्य पथ के लिए आमंत्रित किया गया तो उन्होंने अपनी यही कविता पढ़ी...आज भी उनकी ये कविता सबसे ज्यादा संकलनों में मिलती है...मुझे सुखद आश्चर्य हुआ ब्रुक्स की इस कविता को कोई ३० साल बाद फिर से पढ़ते हुए...कई कई दिन मैंने इसको बार बार पढ़ा...मेरी एक मित्र कवि कथाकार हैं सीमा शफक...जिनकी कई कहानियां और कवितायेँ हंस,कथादेश,नया ज्ञानोदय,शेष,कथाक्रम,बया जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छाप चुकी हिं...उनका कथा संग्रह शिकस्त वाणी प्रकाशन ने छपा है..सीमा जी की एक कविता १९९५ में लिखी हुई (जब वे रुड़की में रहती थीं)बिलकुल इसी भाव बोध की है जो १९९५-९६ में कभी हंस में छपी भी है....ताज़्ज़ुब होता है कि १९४५ में ब्रुक्स की लिखी कविता को भारतीय सेंसिबिलिटी के साथ १९६३ में भारत में जनमी (बगैर ब्रुक्स को पढ़े हुए) एक कवियित्री खूब गहरी शिद्दत के साथ साझा करती है..सीमा जी अब जम्मू में रहती हैं (नेट पर उपलब्ध उनकी तस्वीर साथ में है) देश काल और जातीय सीमाओं का कब कोई सकारात्मक अतिक्रमण कर लेता है ,इसका आसानी से पाता ही नहीं चलता...यहाँ प्रस्तुत दोनों कविताओं को पढ़ के पाठक मानवीय भौगोलिक सीमाओं से परे चला जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है ...
-यादवेन्द्र

माँ
गर्भपात दर गर्भपात-तुम्हे कुछ भूलने नहीं देंगे...
तुम्हे खूब याद रहेंगे वो बच्चे जो आये तो थे तुम्हारे पास
पर रहे नहीं तुम्हारे साथ
नन्हे गीले पिलपिले लोथड़े थोड़े से बालों वाले
या कभी बगैर बालों के भी
वे गायक थे मजदूर थे
पर जिन्हें मौका ही नहीं मिल पाया
हवाओं को छूने का
तुम कभी मुंह नहीं फेर पाओगी उनसे
या पिटाई कर पाओगी प्यार से
या ज्यादा बकबक करने पर डांट कर शांत कर पाओगी
या मीठा कुछ खरीद पाओगी उनके वास्ते..
तुम कभी हटा नहीं पाओगी
मुंह से उनका चुस्सू अंगूठा
या भगा पाओगी उनके ऊपर सवार भूत प्रेत
तुम कभी विस्मृत नहीं कर पाओगी उन्हें
दे ही दोगी खाने को कुछ
जब पड़ जायेगी उनपर एक माँ की निगाह
दर असल जज्ब हो गए हैं वे
तुम्हारी मुलायम उसासों के अन्दर तक..
मुझे सुनाई देती हैं
हवाओं की सरसराहट में घुली मिली
मृत बच्चों की आहटें
और मैं अक्सर बुला कर लगा लेती हूँ
दीखते या न दीखते प्यारों को
अपने स्तन से जिसे पीना उन्हें कभी नसीब न हो पाया
मैं कह पड़ती हूँ...मेरे प्यारों..
यदि मैंने किया है गुनाह
या लील गयी हूँ तुम्हारे भाग्य
तुम्हारे जीवन के साथ साथ
बीच में ही खंडित कर दी है तुम्हारी अ-सीमित उड़ान
यदि मैंने वंचित कर दिए बलपूर्वक
तुम्हे तुम्हारे जन्मों से
और अलग अलग नामों से
छीन लिए तुम्हारे बालसुलभ आंसू
और तुम्हारी धमाचौकड़ी खेल कूद
तुम्हारे कल्पनापूर्ण और भोले भाले प्यार
तुम्हारे तुमुल कोलाहल
तुम्हारी रंग बिरंगी शादियाँ
शरीरी दुःखदर्द व्याधियां
और तुम्हारे मरण अवसान..
यदि मैंने तुम्हारी सांसों की शुरुआत में ही
घोल डाले विष विघ्न..
मेरा भरोसा करना प्यारों
कि मेरे सोचे समझे और नतीजे से सजग फैसले में भी
बिलकुल नहीं थी कोई सजग सोच समझ..
अब क्या हासिल क्यों मैं रोऊँ पीटूं
कसमें खाऊं कि गुनाह मेरा नहीं
बल्कि किसी और का था?
कुछ भी हो
तुम तो अब मौत के पाले में जा ही चुके हो
या यूँ कहते हैं..दूसरे शब्दों में कहूँ..
कि तुम तो कभी जन्मे ही नहीं थे--
पर मेरे मन में ये भी संशय है
कि ये बात भी सच नहीं पूरी पूरी
मुश्किल में हूँ..क्या कहूँ आखिर..
सच को ईमानदारी से कैसे बयान करूँ?
तुम जन्मे तो थे..तुम्हारी मुकम्मल देह भी थी..
पर पलक झपकते मर भी गए..
बस हुआ ये कि तुमने हां-हू कुछ भी नहीं की
न ही इनकी कोई कोशिश..
और रोये चिल्लाए भी तो नहीं..
मेरा भरोसा करो...मुझे तुम खूब दुलारे थे मेरे प्यारों
मेरा विश्वास करो...मैं तुम्हे चीन्हती पहचानती भी थी
...हांलाकि थोड़ा बहुत ही...ज्यादा नहीं
पर प्यार करती थी तुमसे...यक़ीनन
हां, मैं अब भी प्यार करती हूँ तुमसे
मेरे प्यारों....
***

बेटी जो जनमी नहीं - सीमा शफ़क
(इसी विषय पर एक और कविता)

तेरी वहशत ने रोपा था तुझे मेरी बेटी
ये अलग बात,फिर चाहत ने भी उठाया सर
अजब ख्वाहिश कि चाहता हूँ तू फिर से लौटे
कोई लौटा नहीं यूँ जानता हूँ मैं जा कर....

तू होती तो तेरी आँखें बड़ी बड़ी होतीं
रंग कुछ सांवला सा नक्श पर तीखे तीखे
दाँत ऊपर के दो निकले से कुछ अध निकले से
झिलमिलाते हुए जैसे कि धूप में शीशे...

तू होती तो मैं सुब्ह ओ शाम की मसरूफ़ियत से
चंद लम्हे किसी तरह निज़ात के पाता
और फिर तेरी प्राम में बिठा तुझको सड़क पे
गुनगुनाता कोई कविता मैं रोज ही घुमाता...

घुमाते घूमते इक दो तेरी नैपी बदल के
हम ढली शाम जब भी लौट के घर को आते
तू पीती दूध और मैं चाय साथ पिड्कियों के
जहाँ अब तक थे वहीँ रात को भी रह जाते...

तू होती तो मेरे बिस्तर में होती एक मसहरी
अपने पाँव से जिसे रोज़ तू हटा देती
उठाता गोद में तो मेरे धुले कुरते पर
निशान गीले गीले रोज़ तू बना देती....

फिर रात की ख़बरों के वक़्त मैं और तू
पसरे पसरे हुए बिस्तर पर ही खाना खाते
ठीक से खाओ मत गिराओ की हर एक हिदायत पे
कभी दही कभी सब्जी गिरा कर मुस्कुराते...

तू होती तो बहुत कुछ और भी होता ऐसा
बाद सोने के तेरे जो मैं तेरी माँ से कहता
सुकून का,वायदों चाहतों का,ख्वाहिशों का
एक दरिया तमाम रात रूम में बहता...

मगर कुछ भी तो नहीं पास सिवा ख़्वाबों के
वो ख़्वाब जो हक़ीक़तन कभी गुज़र न सके
तुझे खुद अपने हाथों से मिटा के सोचता हूँ
कोई एक ख़्वाब फिर देखूं कि जो बिखर न सके...

मगर जिस भुरभुरी मिटटी में तुझको रोपा था
वहां अब सख्त पत्थरों के सिवा कुछ भी नहीं
और तू जानती तो है तेरी माँ की आदत
यूँ ही नाराज़ है वो मैंने किया कुछ भी नहीं....
***

Friday, January 8, 2010

अशोक कुमार पांडे की कविताएँ

पिछले दो सालों में अशोक कुमार पांडे की कविता ने मुझे लगातार आकर्षित किया है। उनके पास मुझे ख़ास तरह की इच्छाशक्ति दिखाई दी है, जिसे मैं हर हाल में राजनीतिक कहना चाहूंगा। उस पर कोई आवरण नहीं चढ़ाया जा सकता है, वो अपने भीतर के तेज से चमकती है। उनकी कविता में पैठने के बाद उनसे कुछ अंतर्जालीय और दूरभाषिक परिचय भी इधर बीच हुआ है। उनके बारे में कुछ और लोगों से जानकर मैंने यही जाना है कि वे युवा कवियों में भी उस दुर्लभ प्रजाति के जीव हैं, जो जीवन और विचार के सघनतम संघर्षों के लिए आज भी सड़क पर उतरने में यक़ीन करती है। कविता के अलावा वे रंगमंच में भी सक्रिय हैं और विभिन्न जनान्दोलनों में भी। इस `अलावा´ में ही उनकी कविता की असल `संगत´ है। उनका पहला कविता संग्रह तुम्हारी दुनिया में इस तरह `शिल्पायन प्रकाशन´ से आना तय हुआ है, जिससे उम्मीद है कि वह युवा कविता के इधर अमूर्त्त होते जाते चेहरे के नैन-नक्श साफ़ करने में मददगार होगा। अधिक कुछ न कहते हुए मैं अशोक की दो कविताएं अनुनाद पर लगा रहा हूं - आगे भी आप उनकी कविताएं अनुनाद पर पढ़ेंगे।
एक सैनिक की मौत

तीन रंगो के
लगभग सम्मानित से कपड़े में लिपटा
लौट आया है मेरा दोस्त

अख़बारों के पन्नों
और दूरदर्शन के रूपहले पर्दों पर
भरपूर गौरवान्वित होने के बाद
उदास बैठै हैं पिता
थककर स्वरहीन हो गया है मां का रूदन
सूनी मांग और बच्चों की निरीह भूख के बीच
बार-बार फूट पड़ती है पत्नी

कभी-कभी
एक किस्से का अंत
कितनी अंतहीन कहानियों का आरंभ होता है

और किस्सा भी क्या ?
किसी बेनाम से शहर में बेरौनक सा बचपन
फिर सपनीली उम्र आते-आते
सिमट जाना सारे सपनो का
इर्द गिर्द एक अदद नौकरी के

अब इसे संयाग कहिये या दुर्योग
या फिर केवल योग
कि देशभक्ति नौकरी की मजबूरी थी
और नौकरी ज़िंदगी कि
इसीलिये
भरती की भगदड़ में दब जाना
महज हादसा है
और फंस जाना बारूदी सुरंगो में
शहादत!

बचपन में कुत्तों के डर से
रास्ते बदल देने वाला मेरा दोस्त
आठ को मार कर मरा था

बारह दुश्मनों के बीच फंसे आदमी के पास
बहादुरी के अलावा और चारा भी क्या है ?

वैसे कोई युद्ध नहीं था वहाँ
जहाँ शहीद हुआ था मेरा दोस्त
दरअसल उस दिन
अख़बारों के पहले पन्ने पर
दोनो राष्ट्राध्यक्षों का आलिंगनबद्ध चित्र था
और उसी दिन ठीक उसी वक्त
देश के सबसे तेज़ चैनल पर
चल रही थी
क्रिकेट के दोस्ताना संघर्षों पर चर्चा

एक दूसरे चैनल पर
दोनों देशों के मशहूर शायर
एक सी भाषा में कह रहे थे
लगभग एक सी ग़ज़लें

तीसरे पर छूट रहे थे
हंसी के बेतहाशा फव्वारे
सीमाओं को तोड़कर

और तीनों पर अनवरत प्रवाहित
सैकड़ों नियमित ख़बरों की भीड़ मे
दबी थीं
अलग-अलग वर्दियों में
एक ही कंपनी की गोलियों से बिंधी
नौ बेनाम लाशें

अजीब खेल है
कि वज़ीरों की दोस्ती
प्यादों की लाशों पर पनपती है
और
जंग तो जंग
शांति भी लहू पीती है!
***

अंतिम इच्छा

शब्दों के इस
सबसे विरोधाभासी युग्म के बारे में सोचते हुए
अक्सर याद आते हैं ग़ालिब

वैसे सोचने वाली बात यह है
कि अंतिम सांसो के ठीक पहले
जब पूछा जाता होगा यह अजीब सा सवाल
तो क्या सोचते होंगे वे लोग
कालकोठरी के भयावह एकांत में
जिनके गले पर कई बार कसी जा चुकी होती है
वह बेमुरौव्वत रस्सी

हो सकता है
एकाएक कौंध जाता हो
फ़ैसले के वक़्त फूट पड़ी पत्नी का चेहरा
या अंतिम मिलाई के समय बेटे की सहमी आंखे

बहुत मुमकिन है
किए-अनकिए अपराधों के चित्र
सिनेमा की रील की तरह
गुज़र जाते हों उस एक पल में

या फिर
बचपन की कोई सोंधी सी याद
किसी दोस्त के हांथों की ग़रमाहट
कोई एक पल
कि जिसमें जी ली गई हो ज़िंदगी

वैसे
अंधेरों से स्याह लबादों में
अनंत अबूझ पहेलियां रचते वक़ील
और दुनिया की सबसे गलीज़ भाषा बोलते
पुलिसवालों का चेहरा भी हो सकता है
ठीक उस पल की स्मृतियों में

कितने भूले-बिसरे स्वप्न
कितनी जानी अनजानी यादें
कितने सुने अनसुने गीत
एकदम से तैरने लगते होंगे आंखों में
जब बरसों बाद सुनता होगा वह
उम्मीद और ज़िंदगी से भरा यह शब्द - इच्छा

और फिर कैसे
न्यायधीश की क़लम की नोक सा
एकदम से टूट जाता होगा
इसके अंतिम होने के एहसास से

न्यायविदों
कुछ तो सोचा होता
यह क़ायदा बनाने से पहले!
***
संपर्क : 508, भावना रेसीडेंसी, सत्यदेवनगर, गांधी रोड, ग्वालियर, मध्य प्रदेश - 474002 मोबाइल : 09425787930, 09039693159

Monday, January 4, 2010

नए साल पर एक सरल और बेहद मासूम घरू कविता जैसा कुछ ...

अमित की इस कविता को मैंने तीन विशेषण समझ बूझ कर दिए. दरअसल मैं इस कविता पर एक लम्बी टिप्पणी भी देना चाहता था पर सफ़र में होने के कारण दे नहीं पाया, सोचा इन तीन शब्दों में थोड़ा कुछ समेट लूँगा. सरल होना न सिर्फ़ कविता बल्कि जीवन में भी अब एक बहुत मुश्किल चीज़ हो चुका है. ये कविता मुझे नए साल के कार्ड के रूप में मिली तो सबसे पहले मैं इसकी इसी सादगी और सरलता पर क़ुर्बान गया. फिर मैंने देखा इसमें एक और बड़ा जीवन मूल्य छुपा है जिसे हम मासूमियत कहते हैं. कितने मासूम दृश्य हैं ये जिन्हें हम जैसे कवि कविता की जटिलता के ताने बाने में संभव करने का प्रयास अब तक करते आये हैं ताकि आधुनिक अर्थों में अपना तथाकथित कवित्व बचा पाएं. तीसरा शब्द घरू है - आप एक बार पूरी कविता को गौर से देखिये- सारे दृश्य घरेलू हैं, जीवन के चिर प्रश्न और उनके संघर्ष भी घरेलू ही है जबकि उनकी अर्थच्छायायें नितांत वैश्विक और व्यापक. अमित ख़ुद भी अपनी इस कविता की तरह ही हैं. सरल सादे मासूम घरू लेकिन बेहद चिंतनशील और दुनिया की इस जटिलता में उतने ही समर्पित भी. वे हिंदी में भूमंडलीकरण की अवधारणा और समकालीन कविता पर उसके प्रभाव पर अपना महत्त्वपूर्ण शोध भी कर रहे हैं. हमारे साल की शुरूआत अगर इतनी सरल, मासूम और घरू होती है तो हम साल के बेहतर गुजरने की उम्मीद भी कर सकते हैं. इस कविता को अनुनाद पर इस तरह प्रस्तुत करने की यह एक इच्छा ही नहीं महत्वाकांक्षा भी है.


एक दिन यूं हीं, बाजार से उकता गए,
हम दादा पोते बाजार छोड़, म्यूजियम में आ गए
म्यूजियम पिछले दिनों की आखिरी निशानी था,
सिड के वेकअप से पहले सुनी
नानी की कहानी था
म्यूजियम गये दिनों के आस-पास था,
उसके कोने-कोने में बिखरा इतिहास था
पोते को मैंने कन्धों पर बिठाया,
और ऊंगलियों के इशारे से बताया

´´ वो जो सिमटा सिकुड़ा खड़ा है,
किनारे अंधेरे में लुढ़का पड़ा है
अरे वही, जिसके सर पर ताज है,
वो प्याज है!
इसे हम रोज खाते थे,
कभी छौंका तो कभी सलाद बनाते थे
मुस्कुराते थे आंसू बहाते थे
बेटा, वो प्याज है, इसे हम रोज खाते थे!

उसे देख जो दर्द से तड़फड़ाती है,
वो चिट्ठी है बेटा, अब नहीं आती है
इसमें पिता की बीमारी,
शादी की तैयारी,
खेती,झगड़ा,कपड़ा दाल
,घर का सब हाल चाल
दिल की जुबान से लिखा जाता था,
और डाकिए का आना,
बूढ़ों को भी दरवाजे तक खींच लाता था
अब एस,एम,एस ई-मेल और,
ट्वीट से लाज बचाती है,
बेटा, वो चिट्ठी है, अब नहीं आती है!

छतों पर जो बेलौस लिखी है
दर -दीवारों पर जो अपने आप दिखी है
बिना लाग लपेट के जो पेशे नजर है
वो सीधी सच्ची बिना मसाले की खबर है
न सनसनी, न सियासत, न ही पक्षधर है
बेटा, वो बिना मसाले की खबर है!´´

उधर अकेला कड़का ऐंठा
ऑख पर हाथ धरे
तराजू पर है बैठा
इसके जीवन का आखिरी अध्याय है
ये न्याय है!

उस परदे के भीतर देख, वो मृत्युशैय्या है
उस पर हया है
बाहर नहीं आती, इतनी अभिमानी है
हाथ में इसके,
बस चुल्लू भर पानी है!

यहॉ जो ये सब एक धागे में बंधे दिखते हैं
ये प्यार से जुड़े नाते-रिश्ते हैं
ये नफरत से कम,
तोल मोल में अधिक गए
खड़े-खड़े बाजार में
बेभाव के बिक गए!

इसी अजायबघर में
उधर, अंदर के कोठर में
पीठ पर घाव लिए
फिर भी सहयोगी भाव लिए

जो बिचारा है
वो भाई चारा है
पंजाब सिंध मराठा सबकी एका
मिटी मिठास, बंटवारे की खिच गई रेखा
राजनीति का मारा है
बेटा,वो भाई चारा है!

उधर कोने में जो भूखी प्यासी अधमरी सी है
पढ़े लिखे बेरोजगार सी,
भरे गोदाम में भुखमरी सी है
बे-आवाज जिसका मुंहु खुला सा है,
वो भाषा है
ये सरकारी राजनीति का शिकार हुई
हर तरह से समृद्ध होते हुए भी
रोजी-रोटी को बेकार हुई
अक्षर-अक्षर आखिरी दिन गिन गई।
जाने कब हमसे छिन गई!

वो जो दो बहनों सी अंधेरे कोने में दुबकी है
वही हमारी सभ्यता और संस्कृति है
पहले , हमें इन पर नाज था
हमारी पहचान का भी यही राज था
पर जैसे जैसे हम पश्चिमी छलावों से दो चार हुए
इनसे उदासीन, फिर शर्मसार हुए
अब पीछे के पिछलग्गू बन
लकीर पीट रहे हैं
और आधुनिकता की बाढ़ में
बिना लाईफगार्ड के,
तैरना सीख रहे हैं!

ऐसी कितनी ही चीजों से
हम दो-चार होते रहे
बृद्विजीवी थे इसलिए
हाथ पर हाथ धरे रोते रहे
कि पीछे से आवाज आई -
´´ मैं भी हूं
मैं गए दिनों का
आखिरी बचा खुचा आदमी हूँ
बड़ा अभागा हूँ
अपनी नस्ल की कब्र से
उठ भागा हूं
यहॉ दिखाने चीजें पुरानी
पोते को लाए आप, मेहरबानी
वर्ना भूले बिसरे भी फटक नहीं जाते
आपके पोते के दोस्त,
तो घूमने के लिए भी म्यूजियम नहीं आते´´
हमारी बात जारी रहती
अगर अलार्म की घंटी कानों में न पड़ती
ये क्या,मैं तो गहरी नींद में मगन था
जो बयां किया , वो एक अद्भुत सपन था
बताया आपको इसलिए, कि बाद में न पछताना पड़े
और इन मृतपाय चीजों के लिए
सच में म्यूजियम न बनाना पड़े
इसलिए नई सोच से, नए भाव से संकल्प नया लें
म्यूजियम नहीं इनके लिए बस दिल में जगह बना लें
नए वर्ष में करे कुछ ऐसा, नहीं किया जो अब तक
शुभ हो ,शुभ हो, शुभ हो,
नए साल की दस्तक!!

Saturday, January 2, 2010

सिनान अन्तून की एक कविता

एक प्रिज़्म, लड़ाइयों से तर

यह अध्याय है विध्वंस का
यह हमारा नखलिस्तान है
है एक कोण जहाँ लड़ाइयाँ आपस में मिलती हैं
ज़ालिम इकट्ठा होते हैं हमारी आँखों के इर्दगिर्द
ज़ंजीर के बरामदे में अभी
दाद देने की काफी गुंजाइश है
आइये दाद दें

शहर की मोमबत्तियों पर
फाँदती है एक और शाम
रात को रौंदते हैं मशीनी खुर
शॉर्ट वेव्ज के आर-पार क़त्ल किये जा रहे हैं लोग
पर रेडियो उगलता है अनपके बयान
और हमसे
तकाज़ा करता है दाद देने का

हम झेलते हैं बारिश
धधकते छाते का ढाँचा लिए
हमारे झण्डे पर एक देवता सोता है
पर उफ़क पर नहीं कोई पयम्बर
शायद पयम्बर आ जाएँ गर हम दाद दें
आइये दाद दें

हम धुएँ से करेंगे बप्तिस्मा अपने नवजातों का
जोत देंगे उनकी जीभें
धधकते युद्ध गीतों से
या संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों से
सिखायेंगे उन्हें नारों की चिल्लाहट
और एक आसन्न संकट में
छोड़ देंगे उन्हें जलते चूचुकों के किनारे
और दाद देंगे

जालिमों के लिए शरद का
एक और मौसम बुनने से पहले
हमें पार करनी होगी
कंटीले तारों की आकाशगंगा
और दुहराते रहना होगा
हैप्पी न्यू वॉर!

बग़दाद, मार्च 1991

****

बग़दाद में जन्मे सिनान अन्तून प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद से अमेरिका में रहते हैं. अन्तून का एक कविता संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित हैं. अन्तून ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अरबी साहित्य में पीएचडी की है; उन्होंने अरबी साहित्य का अंग्रेजी में विपुल अनुवाद किया है जिसमें महमूद दरवेश की कविता प्रमुख है. वे आज के इराक़ी जीवन पर केन्द्रित एक डॉक्युमेंटरी 'अबाउट बग़दाद' का सह निर्माण/निर्देशन भी कर चुके हैं.

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