Friday, November 20, 2009

आज बाज़ार में पा-ब-जोलाँ चलो


गुज़री सदी में उर्दू शाइरी का नाज़ो-अंदाज़ बदलने वालों में फैज़ का नाम प्रमुख है. उनकी शाइरी 'घटाटोप बेअंत रातों' में सुबह के तारे को ताकती तो है ही, 'कू-ए-यार' से 'सू-ए-दार' भी निकल पड़ती है. आज उन्हें इस दुनिया से रुखसत हुए पच्चीस बरस हो गए पर उनके कलाम की शगुफ्तगी वैसी की वैसी है. महबूब शायर और उसके कमाल-ए-सुखन को सलाम!




आज बाज़ार में पा-ब-जोलाँ चलो

चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं
आज बाज़ार में पा-ब-जोलाँ चलो

दस्त-अफ़्शां चलो, मस्त-ओ-रक़्सां चलो
ख़ाक-बर-सर चलो, खूँ-ब-दामाँ चलो
राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो

हाकिम-ए-शहर भी, मजमा-ए-आम भी
सुबह-ए-नाशाद भी, रोज़-ए-नाकाम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी, संग-ए-दुश्नाम भी

इनका दमसाज़ अपने सिवा कौन है
शहर-ए-जानाँ मे अब बा-सिफा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायां रहा कौन है

रख्त-ए-दिल बाँध लो दिलफिगारों चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों चलो

आज बाज़ार में पा-ब-जोलाँ चलो

******

(पा-ब-जोलाँ : ज़ंजीरों में बंधे पाँव, जान-ए-शोरीदा: व्यथित मन, दस्त-अफ़्शां: हाथ फैलाये हुए, मस्त-ओ-रक़्सां: नृत्य में मग्न, ख़ाक-बर-सर: सर पर धूल लिए, खूँ-ब-दामाँ: दामन पर खून लिए, दमसाज़: मित्र, शायां -योग्य/काबिल , बा-सिफा - निष्कपट,संग-ए-दुश्नाम: धिक्कार में फेंके जाने वाले पत्थर)

6 comments:

  1. यह जरुरी था... उनको पढ़े बहुत दिन हो गया था ... शायद तीन साल... साउथ कैम्पस से ही उनका कायल हूँ... कृपया, उनकी "हम देखेंगे" भी पोस्ट करें..

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  2. बहुत उम्दा ....बहुत अच्छी सोच ...कई बार पढने के बाद ......

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  3. और भी दुख है जमाने में मोहब्बत के सिवा... ये तो हमने फैज से ही सीखा था। हमारी और न जाने कितनी और पीढ़ियों को फैज ने सामाजिक चेतना से लैस किया। इस महबूब शायर को प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार।

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  4. mohabbat aur inqlab ko ek jagh se dekh sakne kee kuvvat wale is kavi ko salam.

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  5. कठिन भाषा है, निराला की शक्ति पूजा पढ्ते हुए यही अहसास हुआ था.टीचर ने कहा था "ओज पूर्ण"! बप्पा.... यह ओज नही चाहिए. जो समझ ही न आती हो. फुट नोट दिया करें भाई! अब इस उमर में मेहनत नही होती .

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  6. सॉरी भाई, दिख गया. अब पुनर्पाठ करता हूँ

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