Monday, November 9, 2009

धूमिल की याद - उनकी अन्तिम कविता



शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
***

8 comments:

  1. क्या ज़बरदस्त कविता है .. यथार्थ बस यथार्थ ! और उसमें भी कविता ... लोहे का स्वाद तो घोड़ा ही बताएगा .. तभी तो वे धूमिल हैं !!!

    ReplyDelete
  2. धूमिल हमेशा मुझे टुकडों-टुकडों में मिले... हमेशा... मैं जब भी उन्हें पाना चाहा मुकम्मल छिटक गए...

    ReplyDelete
  3. bahut achhi kavita padhwayi hai aapne

    lohe ka swaad ghode se poocho
    bahut khoob

    ReplyDelete
  4. यूं कहे उनकी कई कविता अपना अर्थ उम्र के हर मोड़ पे अलग अलग देती रही

    ReplyDelete
  5. धूमिल का यह शिल्प बार बार प्रहार करता है .. इस तरह की कोंचने वाली कविताओं की सख्त ज़रूरत है ।

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails