Tuesday, September 22, 2009

न हो संगीत सन्नाटा तो टूटे


बहुत कम ऐसा हुआ है कि अनुनाद पर दस दिनों तक कोई पोस्ट नहीं आई. तो इस सन्नाटे को तोड़ते हुए पेश है यह ग़ज़ल जो बरसों पहले कहीं पढ़ी थी. मैं एकाध शे' भूल रहा हूँ शायद. शायर का नाम भी मुझे याद नहीं; याद दिलाएं तो इनायत होगी.


हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
उधेड़ा रात भर दिन भर बुना
है


तुम्हारे साथ गुज़रा एक लम्हा
बकाया उम्र से लाखों गुना है


न हो संगीत सन्नाटा तो टूटे
हमारे हाथ में एक झुनझुना
है

जहाँ पर झील में धोया था चेहरा
वहाँ पानी अभी तक गुनगुना है

*******

(पॉल क्ली की पेंटिंग 'दि एंड ऑफ़ दि लास्ट एक्ट ऑफ़ अ ड्रामा' म्यूज़ियम ऑफ़ माडर्न आर्ट्स, न्यू यॉर्क की वेबसाइट से साभार)

6 comments:

  1. संगीत ही है भाई!
    शाय्र्र चाहे जो भी हो.

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  2. hami ne kam kuch aisa chuna hai ,
    udheda raat bhar din bha buna hai.

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  3. दस दिनों तक पोस्ट नही आई ..सब खैरियत तो है ? चलिये यह गज़ल ही सही ।

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  4. /पिछले २ अक्टूबर २००८ की शाम
    गांधीजी के तीन बंदर राज घाट पे आए.
    और एक-एक कर गांधी जी से बुदबुदाए,
    पहले बंदर ने कहा-
    ''बापू अब तुम्हारे सत्य और अंहिंसा के हथियार,
    किसी काम नही आ रहे हैं ।
    इसलिए आज-कल हम भी एके४७ ले कर चल रहे हैं। ''

    दूसरे बंदर ने कहा-
    ''बापू शान्ति के नाम ,
    आज कल जो कबूतर छोडे जा रहे हैं,
    शाम को वही कबूतर,नेता जी की प्लेट मे नजर आ रहे हैं । ''

    तीसरे बंदर ने कहा-
    ''बापू यह सब देख कर भी,
    हम कुछ कर नही पा रहे हैं ।
    आख़िर पानी मे रह कर ,
    मगरमच्छ से बैर थोड़े ही कर सकते हैं ? ''

    तीनो ने फ़िर एक साथ कहा --
    ''अतः बापू अब हमे माफ़ कर दीजिये,
    और सत्य और अंहिंसा की जगह ,कोई दूसरा संदेश दीजिये। ''

    इस पर बापू क्रोध मे बोले-
    '' अपना काम जारी रखो,
    यह समय बदल जाएगा ।
    अमन का प्रभात जल्द आयेगा । ''

    गाँधी जी की बात मान,
    वे बंदर अपना काम करते रहे।
    सत्य और अंहिंसा का प्रचार करते रहे ।
    लेकिन एक साल के भीतर ही ,
    एक भयानक घटना घटी ।
    इस २ अक्टूबर २००९ को ,
    राजघाट पे उन्ही तीन बंदरो की,
    सर कटी लाश मिली ।
    Posted by DR.MANISH KUMAR MISHRA at 08:03 0 comments
    Labels: hindi kavita. hasya vyang poet, गाँधी जी के तीन बंदर
    Reactions:

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  5. शायर हैं वीरेन्द्र जैन...एक और शेर है इस ग़ज़ल का:-

    समझते खूब हो नजरों की भाषा
    मेरा प्रस्ताव फिर क्यों अनसुना है

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