Sunday, September 6, 2009

नन्हीं रूथ - येहूदा आमीखाई की कविता

तस्वीर यहाँ से साभार

कभी-कभी मैं तुम्हें याद करता हूं
नन्हीं रूथ
हम अलग हो गए थे अपने सुदूर बचपन में कहीं
और उन्होंने तुम्हें शिविरों में जला दिया

यदि तुम ज़िन्दा होतीं
तो एक औरत होतीं पैंसठ साल की खड़ी बुढ़ापे की कगार पर
लेकिन बीस साल की उम्र में ही उन्होंने तुम्हें जला दिया
और मैं नहीं जानता कि और क्या क्या हुआ तुम्हारे साथ
तुम्हारे उस छोटे-से जीवन में
जब से हम अलग हुए - तुमने क्या क्या पाया
कौन कौन-से अधिकार चिह्म उन्होंने लगाए
तुम्हारे कंधों पर
तुम्हारी आस्तीनों पर
तुम्हारी बहादुर आत्मा पर
कौन कौन-सी सजावटें साहस के लिए
कौन कौन-से तमग़े प्रेम के लिए लटकाए गए तुम्हारे गले में
कैसी और कौन-सी शांति वे तुम तक लाए
और क्या तुम्हारे जीवन के अप्रयुक्त सालों का
क्या अब भी वे बंधे हैं सुंदर पुलिंदों में
क्या उन्हें जोड़ दिया गया मेरे जीवन में
क्या तुम मुझे लौटा ले गईं
स्विट्ज़रलैंड के बैंकों जैसे सुरक्षित अपने उस प्रेम-कोष में
जहां संभाली जाती है संपत्तियां उनके मालिकों की मौत के बाद भी
क्या यह सब मैं छोड़ जाऊंगा अपने बच्चों के लिए
- जिन्हें तुमने कभी नहीं देखा
तुमने तो दे दिया अपना जीवन मुझे
उस संयमी शराबविक्रेता की तरह जो शराब सिर्फ़ औरों को दे देता है
ख़ुद रहता है निर्विकार और निर्लिप्त हमेशा
तुम भी निर्लिप्त हो अपनी मृत्यु में
और मेरे लिए पीना इस जीवन को जैसे लोटते रहना
अपनी ही स्मृतियों के कीचड़ में
अब और तब
मैं तुम्हें याद करता हूं अविश्वसनीय समयों में
और ऐसी जगहों में जो याद रखने के लिए नहीं,
बस कुछ पल के लिए बनी हैं
बस गुज़र भर जाने के लिए
एक हवाई अड्डे की तरह जहां आने वाले यात्री थके और निढाल
खड़े रहते हैं कन्वेयर बेल्ट के पास
जो लाती है उनके सूटकेस और दूसरा सामान
और वे पहचान जाते हैं उन्हें चीखते हुए-से ख़ुशी से
मानो फिर से जी उठने और चल देने वापस अपने जीवन में
और वहां.... वहां एक सूटकेस है
जो लौटता है और फिर ओझल हो जाता है
और फिर से लौटता है
हमेशा बहुत धीमे खाली हो चुकी उस जगह में
यह फिर-फिर आता है - जाता है
ऐसे ही... तुम्हारी ख़ामोश आकृति गुज़रती है मेरे आगे से
ऐसे मैं तुम्हें याद करता हूं
कन्वेयर बेल्ट के थमकर शांत खड़े हो जाने तक

और वहाँ वे खड़े थे स्थिर शांत
आमीन....
****
अनुवाद : शिरीष कुमार मौर्य ("धरती जानती है" संवाद प्रकाशन से)
****

3 comments:

  1. बहुत सुंदर . मन को छूने वाली कविता .

    ReplyDelete
  2. ''क्या तुम मुझे लौटा ले गई
    स्विट्जरलैंड के बैंकों जैसे सुरक्षित अपने उस प्रेम- कोष में .......''
    अद्भुत अभिव्यक्ति .........हार्दिक बधाई .

    ReplyDelete
  3. कल पुस्तक मेला में एक स्टाल पर आपकी पुस्तक 'पृथ्वी पर एक जगह' देखी... मैं खरीद तो नहीं पाया क्यों की मेरे सारे पैसे ख़तम हो चुके थे... बहरहाल प्रस्तुत कविता शानदार है... नन्ही रुथ कितना भावुक शब्द है... अपने आप में बहुत कुछ कहता हुआ...

    ReplyDelete

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