Tuesday, July 14, 2009

जहां की ३२% आबादी आदिवासी है...........

११-१२ जुलाई को नई दिल्ली मे सम्पन्न हुई जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जनांदोलनों और मानवाधिकारों पर क्रूर दमन ढानेवाली छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा १० व ११ जुलाई को प्रायोजित 'प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान" कार्यक्रम में बहुतेरे वाम, प्रगतिशील और जनवादी लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की शिरकत को शर्मनाक बताते हुए खेद व्यक्त किया गया। स्व. प्रमोद वर्मा की स्मृति को जीवित रखने के लिए किए जाने वाले किसी भी आयोजन या पुरस्कार से शायद ही किसी कि ऎतराज़ हो, लेकिन जिस तरह छ्त्तीसगढ के पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में इस कार्यक्रम को प्रायोजित किया गया, जिस तरह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इसला उदघाटन किया, शिक्षा और संस्कृतिमंत्री बृजमॊहन अग्रवाल भी अतिथि रहे और राज्यपाल के हाथों पुरस्कार बंटवाया गया, वह साफ़ बतलाता है कि यह कार्यक्रम एक साज़िशाना तरीके से एक खास समय में वाम, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक संस्कृतिकर्मियों के अपने पक्ष में इस्तेमाल के लिए आयोजित था। यह संभव है कि इस कार्यक्रम में शरीक कई लोग ऎसे भी हों जिन्हें इस कार्यक्रम के स्वरूप के बारे में ठीक जानकारी न रही हो। लेकिन जिस राज्य में तमाम लोकतांत्रिक आंदोलन, मानवाधिकार संगठन, बिनायक सेन जैसे मानवाधिकारवादी चिकित्सक, अजय टी.जी. जैसे फ़िल्मकार, हिमांशु जैसे गांधीवादी को माओवादी बताकर राज्य दमन का शिकार बनाया जाता हो, जहां 'सलवा जुडुम' जैसी सरकार प्रायोजित हथियारबंद सेनाएं आदिवासियों की हत्या, लूट, बलात्कार के लिए कुख्यात हों और ३ लाख से ज़्यादा आदिवासियों को उनके घर-गांव से खदेड़ चुकी हों, जहां 'छ्त्तीसगढ़ पब्लिक सिक्योरिट ऎक्ट' जैसे काले कानून मीडिया से लेकर तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोंटने के काम आते हों, वहां के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन (जिनके नेतृत्व में यह दमन अभियान चल रहा हो), के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के स्वरूप की कल्पना मुश्किल नहीं थी। वहां जाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख से विचारधारा से मुक्त रहने का उपदेश और लोकतंत्र की व्याख्या सुनने की ज़िल्लत बर्दाश्त करने से बचा जा सकता था। बहरहाल, यह घटना वामपंथी, प्रगतिशील, जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए चिंताजनक और शर्मसार होने वाली घटना ज़रूर है। हम यह उम्मीद ज़रूर करते हैं कि जो साथी वहां नाजानकारी या नादानी में शरीक हुए, वे सत्ता द्वारा धोखे से अपना उपयोग किए जाने की सार्वजनिक निंदा करेंगे और जो जानबूझकर शरीक हुए थे, वे आत्मालोचन कर खुद को पतित होने से भविष्य में बचाने की कोशिश करेंगे और किसी भी जनविरोधी, फ़ासिस्ट सत्ता को वैधता प्रदान करने का औजार नहीं बनेंगे।

हम सब जानते हैं कि भारत की ८०% खनिज संपदा और ७०% जंगल आदिवासी इलाकों में हैं। छत्तीसगढ एक ऎसा राज्य है जहां की ३२% आबादी आदिवासी है। लोहा, स्टील,अल्युमिनियम और अन्य धातुऒं, कोयला, हीरा और दूसरे खनिजों के अंधाधुंध दोहन के लिए; टेक्नालाजी पार्क, बड़ी बड़ी सम्पन्न टाउनशिप और गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिए तमाम देशी विदेशी कारपोरेट घरानों ने छ्त्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों पर जैसे हमला ही बोल दिया है। उनकी ज़मीनों और जंगलों की कारपोरेट लूट और पर्यावरण के विनाश पर आधारित इस तथाकथित विकास का फ़ायदा सम्पन्न तबकों को है जबकि उजाड़े जाते आदिवासी और गरीब इस विकास की कीमत अदा कर रहे हैं। वर्ष २००० में स्थापित छ्त्तीसगढ राज्य की सरकारों ने इस प्रदेश के संसाधनों के दोहन के लिए देशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ पचासों समझौतों पर दस्तखत किए हैं। १०००० हेक्टेयर से भी ज़्यादा ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में है। आदिवासी अपनी ज़मीन, आजीविका और जंगल बचाने का संघर्ष चलाते रहे हैं। लेकिन वर्षों से उनके तमाम लोकतांत्रिक आंदोलनों का गला घोटा जाता रहा है। कारपोरेट घरानों के मुनाफ़े की हिफ़ाज़त में केंद्र की राजग और संप्रग सरकारों ने, छ्त्तीसगढ़ में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर सलवा जुडुम का फ़ासिस्ट प्रयोग चला रखा है। आज देशभर में हर व्यवस्था विरोधी आंदोलन या उस पर असुविधाजनक सवाल उठाने वाले व्यक्तियों को माओवादी करार देकर दमन करना सत्ताधारियों का शगल बन चुका है। दमनकारी कानूनों और देश भर के अधिकाधिक इलाकों को सुरक्षाबलों और अत्याधुनिक हथियारों के बल पर शासित रखने की बढ़ती प्रवृत्ति से माओवादियों पर कितना असर पड़ता है, कहना मुश्किल है, लेकिन इस बहाने तमाम मेहनतकश तबकों, अकलियतों, किसानों, आदिवासियों, मज़दूरॊं और संस्कृतिकर्मियों के आंदोलनों को कुचलने में सत्ता को सहूलियत ज़रूर हो जाती है।

प्रणय कृष्ण

5 comments:

  1. प्रिय पंकज और प्रिय प्रणय,
    यह बहुत जरूरी विमर्श, आग्रह और प्रतिरोध आपने किया है। इससे मुझे भरोसा मिला है। मैं इसका स्‍वागत करता हूं। और सभी का ध्‍यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहता हूं कि अनेक छोटी-छोटी घटनाएं, समझौते और आकर्षण भरे प्रस्‍तावों की स्‍वीक़तियां प्रचलन में आ चुकी हैं। जिन्‍हें उपेक्षणीय मान लिया जाता है, जिन्‍हें लेकर कोई सवाल नहीं उठाए जाते और फिर इस तरह के कार्यक्रमों में भागीदारी के साहस और तर्क बनते चले जाते हैं।

    हिन्‍दी अकादमी, साहित्‍य अकादमी, भारत भवन, हिन्‍दी संस्‍थान जैसी अनेक संस्‍थाओं के आयोजनों में, जिनके आयोजक दक्षिणपंथी होते हैं, जो कभी-कभार या सीमित संख्‍या में प्रमुख प्रगतिशील-जनवादी लेखकों को बुलाकर अपने आयोजनों को एक साहित्यिक वैधता और गरिमा देना चाहते हैं, उनमें हमारे वरिष्‍ठ और युवा साथी भागीदारी करते हैं, यह विस्‍मय है, अवसरवादिता है और स्‍खलनों की संभव श्रंखला की सूचना है।

    जरूरी नहीं कि कोई संगठन इनके खिलाफ प्रस्‍ताव पारित करे तभी हम इन आयोजनों में जाना बंद करें, बल्कि एक लेखक का विवेक जाग्रत रहना ही चाहिए। यह एक न्‍यूनतम अपेक्षा है। यह हो सकता है कि भूल-चूक हो तो उसे स्‍वीकार किया जाए और आगे सावधान रहा जाए।

    इसी तरह के आचरण पुरस्‍कार या सम्‍मान ग्रहण करने में अकसर देखे जाते हैं जहां या तो संस्‍था ही दक्षिणपंथी होती है अथवा पुरस्‍कार प्रदान करनेवाले लोग जाहिर तौर पर संदिग्‍ध, अपराधी या फासिस्‍ट होते हैं।
    इन स्थितियों से मुझे बहुत निराशा और दुख होता रहा है।
    बहरहाल, आगे प्रतिबद्ध आचारण के लिए आशान्वित हूं।

    ReplyDelete
  2. आंकडों व सूचनाओं के लिये शुक्रिया प्रणय जी . पर आदिवासियों के मुद्दे पर् कौन टिप्पणी करेगा?
    हमारे कुछ भाई गफलत और बे खयाली मे बदनाम हो गये(जिन्हें अब प्रायश्चित कर्ना पडेगा) , कुछ ने जागरूकता का परिचय दिया और "पब्लिक एजेंडा " पढ्ने के कारण बकौल अ-आ जी बाल- बाल बच गये.हम तो किसी न किसी तरह् बचते हई रहेंगे. आदिवासियों को कौन बचायेगा?

    ReplyDelete
  3. http://jayprakashmanas.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html

    ReplyDelete
  4. आदिवासियों को जो भी बचायेगा आपके और हमारे जैसा बुद्धि विलास करने वाले नहीं बचा पायेंगे । इतना तो तय ही है ।

    ReplyDelete
  5. काफी चीजों का देर से पता चला. पंकज चतुर्वेदी का स्टैंड साहसिक है. प्रणय कृष्ण (जसम) भी सही वक्त पर बोले हैं.

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails