Friday, July 24, 2009

बाली (इन्डोनेशिया) की कविता ........ सोक सवित्री

सोकार्दा इस्त्री सावित्री, जिन्हें आमतौर पर सोक सावित्री के नाम से जाना जाता है, 1968 में मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया के हिन्दू बहुल बाली प्रांत में जन्मी सोक ने "बाली पोस्ट" में पत्रकार के तौर पर अपने लेखकीय जीवन का श्रीगणेश किया। बाद में उपन्यास और कविताएँ भी लिखीं पर उनका मन सबसे ज्यादा थियेटर में रमता है। उनका अपना थियेटर ग्रुप भी है जो पारम्परिक लोक जीवन से उठाए गए स्त्री पात्रों की वर्तमान राजनैतिक सामाजिक शक्ति संदर्भों में पुनर्व्याख्या करता है। लम्बे समय तक सत्ता में रहे राष्ट्रपति सुहार्तो के आखिरी दिनों में वे स्त्रीवादी विमर्श की मुखर प्रवक्ता के तौर पर उभरीं और कई बार तो ऐसा लगने लगा कि अपने विचारों के कारण उन्हें अपनी सरकारी नौकरी गँवानी पड़ सकती है। हाल के वर्षों में प्रस्तावित पोर्नोग्राफी कानून के कड़े प्रावधानों का विरोध करने के कारण वे विवादों में रहीं - बाली की सांस्कृतिक उन्मुक्तता (जैसे वहाँ की स्त्रियों के ब्रा न पहनने की परिपाटी) पर कट्टरवादी इस्लामी शिंकजा कसने का उन्होंने जोर शोर से विरोध किया। बाली द्वीप की लुप्तप्राय भाषाओँ को बचाने के लिए भी वे प्रयासरत हैं। यहाँ प्रस्तुत कविता आस्ट्रेलिया से प्रकाशित "साल्ट मैगजीन" से उद्धृत है - अंग्रेजी अनुवाद हैरी एवेलिंग ने किया है।

तुम्हारे साथ प्यार की बातें

जब तुम मुझसे करोगे
प्यार की बातें
चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
मैं थोड़ा अचकचाकर
ठहाके लगाकर हँसूँगी ही
और हो जाऊँगी खुद से बेखबर बावली सी ......

चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
प्यार उमड़ घुमड़कर इस तरह घेर लेगा मुझे
कि आधी रात जाग पडूँगी मैं हड़बड़ाकर
जैसे एकाकी छूट जाऊँ मैं भरी भीड़ में
मेरे अंदर जुनून में हहराने लगेंगे
तुम्हारी स्मृतियों के ज्वार..........

तुम्हें खूब मालूम है..... हतप्रभ हो जाऊंगी मैं
दुनिया के दागे बस मामूली से ही किसी सवाल पर
फिर प्यार इस तरह ले लेगा आगोश में अपनी
कि दुनिया को रख लूँगी मैं जूते की नोंक पर
बस एक बार करो तो
मुझसे तुम प्यार की बातें...........

चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा
मैं दुत्कार दूँगी दुनिया को
तुम्हारे सामने ही
अब रात में भी कहाँ मुँदेंगी मेरी आँखें
और भला कैसे हो पायेगा दिन में भी मुझसे कोई काम
मेरा मन हुआ करेगा एकदम व्यस्त
खींचने में रंग बिरंगे चित्र मनोभावों के
आँखें होने लगेंगी भारी
रोशनी से महरूम
ये दुनिया लगने लगेगी मुझे
जैसे हो ही न कहीं कुछ.....
मैं प्यार की वेदी पर
चढ़ा दूँगी ये दुनिया
जब तुम मुझसे करोगे प्यार की बातें

चाहे कितनी भी अनगढ़ हो तुम्हारी भाषा ....

देखो तो, मैं वो अब रही ही कहाँ
थी जो थेाड़ी देर पहले तक...........
****
यादवेन्द्र
ए-24, शाति नगर,
रूड़की
फोन न. 9411100294

7 comments:

  1. यार भाई ग़ज़ब की कविता है।
    एक सांस मे पढा ले जाने वाली कविता…

    और अनुवाद ऐसा कि लगा ही नहीं किसी और भाषा का लिखा पढ रहा हूं।
    बधाई

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  2. अद्भुत !!!!!!! 'प्रणय एक काम है पूरा '-आलोक धन्वा .

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  3. अनुनाद कविता के लिए सुंदरतम माध्यम बन चुका है। जो किसी भी कारणवश कविता के संसार को खंघाल नहीं पाते उनके लिए अनुनाद पढ़ना सभी कमियों को पूरा कर देता है।
    मैं स्वीकार करता हूँ कि अनुनाद पर मैंने कई कवियों का प्रथम परिचय प्राप्त किया।

    आप सभी को ढेरों साधुवाद।

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  4. thanks is "prem" ke liye.
    subah subah is sachche prem ke liye.

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  5. लाजवाब सुन्दर अभिव्यक्ति

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