Thursday, July 23, 2009

दहलीज़ 2 : काव्य-कला - खोर्खे लुइस बोर्खेस / मूल स्पानी से अनुवाद : प्रभाती नौटियाल

हमारे सहलेखक पंकज चतुर्वेदी अनुनाद पर एक स्तम्भ शुरू कर रहे हैं। यह विशेष रूप से नए लेखकों के लिए है। इसके लिए रचनाओं के चयन लिए पंकज जी ने दो मानक बनाये हैं - पहला, विश्व कविता से १९२० के बाद की ही कवितायें ली जाएँगी और दूसरा, हिन्दी कविता १९४७ के बाद की ली जायेगी। तीसरा मानक मैं बना रहा हूँ और वो ये कि इस स्तम्भ की पूरी जिम्मेदारी पंकज चतुर्वेदी ही संभालेंगे। अनुनाद के मुझ समेत अन्य लेखक चाहें तो उन्हें अपनी पसंद मेल कर दें पर चयन उन्हीं का होगा। पाठक भी अपनी पसंद अनुनाद पर दिए मेरे मेल पर भेज सकते हैं, उनका सदैव स्वागत है।



मित्रो , ' अनुनाद ' पर हम यह एक नया स्तंभ शुरू कर रहे हैं -----"दहलीज़ ". इसमें सिर्फ़ वही रचनाएँ मुहैया की जायेंगी ; जो कविता लिखना प्रारंभ करनेवाले बिलकुल नये कवियों , कविता मात्र से प्यार करनेवाले पाठकों और कविता में ख़ास अभिरुचि रखनेवाले कवियों के लिए बेहद अहम होंगी . कॉलम का यह नाम मेरे विशेष अनुरोध पर मशहूर कवि श्री असद ज़ैदी ने रखा है . यों इस स्तंभ की शुरूआत दिनांक 6 जुलाई , 2009 की पोस्ट में मेरे द्वारा प्रस्तुत की गयी बेर्टोल्ट ब्रेख्त की कविता ' निर्णय के बारे में ' ( अनुवाद : नीलाभ अश्क ) से हो चुकी है . मगर इसका औपचारिक एलान अब मुमकिन हो पा रहा है , जब इसे कार्य-रूप देने का मन मैंने आखिरकार बना लिया है. इस विशेष सन्दर्भ में उपर्युक्त कॉलम के अंतर्गत कृपया इसे दूसरी पोस्ट मानते हुए पढ़िएगा !

काव्य-कला - खोर्खे लुइस बोर्खेस

समय और पानी से बनी नदी को निहारना
और याद करना कि समय ही दूसरी नदी है
यह जानना कि नदी की तरह हम खो जाते हैं
और कि चेहरे पानी की तरह गुज़र जाते हैं .

यह महसूस करना कि जगे रहना दूसरा सपना है
जो सपने न देखने का सपना है और कि मृत्यु
जिससे डरती है हमारी देह , है मृत्यु भी वही
हरेक रात की और नींद है कहलाती .

दिन या साल में एक प्रतीक देखना
आदमी के दिनों और सालों का ,
सालों के तिरस्कार को बदलना
एक संगीत , एक अफ़वाह , एक प्रतीक में .

मृत्यु में नदी को देखना , सूर्यास्त में
एक खिन्न सोना , ऐसी ही है कविता
जो अमर और ग़रीब है . कविता
ऐसे लौटती है जैसे भोर और सूर्यास्त .

कभी-कभी शाम को एक चेहरा
हमें निहारता है एक आईने की गहराई से ,
कला होनी चाहिए जैसा वह आईना
जो दिखाता है हमें हमारा ही चेहरा .

कहते हैं कि युलीसिस , चमत्कारों से अघाया ,
प्रेम के आँसू रोया था अपनी इथाका पहचानकर
हरी-भरी और साधारण . कला है वही इथाका
हरी-भरी चिरंतनता की , चमत्कारों की नहीं .

यह भी है अंतहीन नदी की तरह
जो बहती है और आईना है एक
उसी चंचल हेराक्लिटस का , जो बिलकुल वही है
और दूसरा है, अंतहीन नदी की तरह .
****

( ' लोर्का ', वर्ष 1, अंक 1 से साभार )

12 comments:

  1. बर्तोल ब्रेख्त की कविता पढकर यह खयाल मुझे आया था कि इसे श्रंखला के रूप मे प्रस्तुत किया जाना चाहिये ."दहलीज़" के रूप मे इसे साकार होते हुए देख प्रसन्नता हुई . शुभकामनायें.
    शरद कोकास दुर्ग

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  2. कई बार पढ गया यह कविता…

    कला होनी चाहिये वह आईना…
    अद्भुत पंक्ति है।

    अगली क़िस्त का इंतज़ार रहेगा

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  3. बहुत शानदार पोस्ट का आग़ाज किया है पंकज जी नें। एक महत्तर कार्य को पूरी ज़िम्मेदारी से पूरा करने का बीड़ा उठाया है आपने। इस जज़्बे को सलाम।
    प्रियम अंकित

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  4. Pankaj Chaturvedi ji ka yh stambh blog ki duniya men ek sarthak pahal ki tarh hai. jis maksad ke liye yh shuru kiya gaya hai, wo is wakt behad jaruri ho gaya hai. is tarh ki aur bhi jimmedariyon ki ummeed Pankaj Chaturvedi se ki hi jani chahiye. yh bhavukta ho sakti hai par mujhe aisa lagta hai ki apni lambi baudhik yatra hone ke bavjood pichle kuchh samy se Pankaj men sk bada sarthak parivartan aa raha hai. unhe careerism aur hindi patti ki commen sence ki nazar na lage.

    -mujhe stambh ka sheershak aur kavita dono bahut achhe lage

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  5. एक बहुत महत्वपूर्ण शुरुआत ..हम सभी के लिए जरूर अब 'दहलीजों के आगे नए दालान बनेंगे' ...

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  6. आपके यहाँ आकर सुकून मिला ....मन का पढ़ कर , शुभकामनायें .

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  7. सभी मित्रों का बहुत-बहुत आभार ! अब ज़िम्मेदारी का एहसास बहुत बढ़ गया है . पूरी कोशिश करूँगा कि आप सभी साथियों की उम्मीदों का मान रखूँ . अगर रेस्पोंस बहुत
    अच्छा रहा , तो "दहलीज़" को भविष्य में पुस्तकाकार भी प्रकाशित कराया जाएगा . सब -कुछ आप सब और कुछ-कुछ मेरे ऊपर भी निर्भर है . धीरेश जी की शुभकामनाओं और
    "admiration " के लिए ख़ास तौर पर कृतग्य हूँ . रही बात उनके अंदेशों की ; तो मैं उन्हें निजी तौर पर आश्वस्त करते हुए यह ज़ाहिर करना चाहता हूँ कि मैंने अपने वक़्त के
    मशहूर और अनिवार्य कवि श्री विष्णु खरे की इस काव्य-पंक्ति को अपनी ज़िन्दगी का आदर्श बना लिया है-------" मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से ! " बाक़ी फिर .
    --------पंकज चतुर्वेदी
    कानपुर

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  8. कुछ ज़्यादा ही भारी और ज़्यादा ही विदेशी हो गया पंकज जी.
    समझ नही पाया ठीक से. इसे सप्तह भर लगाए रखिए. अलग अलग मूड्स मे पढ़्ना चहता हूं.

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  9. nischit hi ek sadhi hui pukhta aawaz hogi dahliz. anshul tripathi

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  10. "मूल स्पानी से अनुवाद"—ये पद पढ़कर अच्छा लगा।

    "लोर्का" पत्रिका के बारे में बताएँ। क्या ये सार-संसार (http://saarsansaar.com) की तरह अनेक विदेशी भाषाओं को शामिल करती है, या गार्सिया लोर्का के नाम पर स्पानी साहित्य की पत्रिका है?

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  11. प्रभाती नौटियाल का परिचय तो यहाँ से मिल गया। उनका ई-मेल भी।

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