Wednesday, July 22, 2009

पारदर्शी दिन बदल रहे हैं शाम में - जार्ज हेइम

अनुनाद पर मेरी पहली पोस्ट के रूप में प्रस्तुत है जर्मन अभिव्यंजनावादी कवि जार्ज हेइम (३० अक्तूबर १८८७ - १६ जनवरी १९१२) की एक कविता........अनुवाद मेरा किया हुआ है और अब इस पर आप सबकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है।



"पारदर्शी दिन बदल रहे हैं शाम में"

पारदर्शी दिन बदल रहे हैं शाम में
सूर्यास्त अब मृदुल और सुकुमार लगता है
वह चारदीवारी दिखनी कम होती जा रही है
जिसके पीछे रेल-पेल है
गोल मीनारों के बीच झाँकती रंग-बिरंगी छतों की

चमकदार बादल के पीछे

वह गोल सफ़ेद सिरवाला
चांद सो गया है आकाश में
और घरों-पार्कों के बीच से गुज़रती

धुंधली पड़ती जा रही हैं गलियाँ

सिर्फ़ फाँसी के फंदे झूल रहे हैं ख़ुशी से
वहाँ ऊँचाई पर टिकटी की नाच रहे हैं
और उनकी काली आवाज़ के नीचे
लेटे हुए जल्लाद सो रहे हैं
ताज़ा रक्त चिपका हुआ है फरसे पर

****

- अनुवाद : अनिल जनविजय
http://www.kavitakosh.org/
www.gadyakosh.org

4 comments:

  1. अनुनाद पर स्वागत है भाई साहब. आपकी पहली पोस्ट शानदार है और विश्वास जगाती है कि हमारे साथ आपका सफ़र हमें समृद्ध करेगा.

    ReplyDelete
  2. no comments!

    देखो दोस्तो,
    ऐसी होती है वो कविताएं जिन्हें टिप्पणी की ज़रूरत नहीं होती.

    ReplyDelete
  3. मृदुल और सुकुमार सूर्यास्त और आसमान में सोये हुए गोल और सफ़ेद सिर वाले
    चन्द्रमा के बरअक्स ख़ुशी से झूलते हुए फांसी के फंदे और उनकी काली आवाज़
    के नीचे फरसों पर चिपके हुए ताज़ा रक्त के निशान------क्या दारुण ' कंट्रास्ट ' है .
    कविता इसी का नाम है . इससे रूबरू कराने के लिये अनिल जनविजय जी का बहुत-
    बहुत शुक्रिया !
    ------------पंकज चतुर्वेदी
    कानपुर

    ReplyDelete
  4. अनिलजी, इस कविता को आपने मूल जर्मन से अनूदित किया है या रूसी अनुवाद से?

    ReplyDelete

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