Tuesday, July 21, 2009

बाबा नागार्जुन की कविता .....


युवा आलोचक प्रियम अंकित अनुनाद के सहलेखक हैं पर इंटरनेट की कुछ बुनियादी परेशानियों के कारण अपनी पहली पोस्ट नहीं लगा पा रहे थे - अपना संकोच तोड़ कर अब उन्होंने अपनी यह पोस्ट मेल से भेजी है जिसे मैं ज़्यादा कुछ न कहते हुए नीचे चस्पां कर रहा हूँ...........अनुनाद पर बतौर ब्लोगर आपका स्वागत है प्रियम जी।


साथियों , अनुनाद पर आपसे मुखातिब होना सुखद है। बतौर पहली पोस्ट बाबा नागार्जुन की कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ । यह कविता बंजरपन की सामाजिकता के विरुद्ध प्रेम के निजी संवेगों की उर्वरता को उदघाटित करती
- प्रियम अंकित


कर गयी चाक
तिमिर का सीना
जोत की फाँक
यह तुम थीं

सिकुड़ गयी रग-रग
झुलस गया अंग-अंग
बनाकर ठूंठ छोड़ गया पतझार
उलंग इसगुन-सा खड़ा रहा कचनार
अचानक उमगी गालों की सन्धि में
छरहरी टहनी
पोर-पोर में गसे थे टूसे
यह तुम थीं

झुका रहा डाल फैलाकर
कगार पर खड़ा कोढ़ी गूलर
ऊपर उठ आयी भादों की तलइया
जुड़ा गया बोने की छाल का रेशा-रेशा
यह तुम थीं !
****

2 comments:

  1. प्रियम जी , नागार्जुन की इस अप्रतिम प्रेम-कविता की मार्फ़त आप 'अनुनाद ' के रंगमंच पर आये -----आपका हार्दिक स्वागत !
    ------पंकज चतुर्वेदी
    कानपुर

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