Sunday, June 21, 2009

कविता का प्रथम श्रोता - ज्ञानेंद्रपति

कविता का प्रथम श्रोता - ज्ञानेंद्रपति



कविता का पहला श्रोता किंवा पाठक ! कवि के लिए गुरू-स्थानीय - मेरी तरह के निगुरा कवि के लिए भी। कोई कविता पूरी होते ही - अर्थात उसका पहला मुकम्मल-सा प्रारूप बनते ही उसे ` उपयुक्त प्रथम श्रोता´ को सुनाने की ज़रूरत तड़प की तरह महसूस होती है। `उपयुक्त प्रथम श्रोता´ के यहां से उत्तीर्ण होने पर ही वह कविता मुकम्मल होती है। कविता की पूर्णता में इस प्रथम श्रोता का ज़रूरी योगदान होता है। उदाहरण के लिए `संझा-झंझा´ शीर्षक मेरी कविता को देखा जा सकता है जो तब विजयमोहन सिंह के सम्पादन में निकलने वाली `इंद्रप्रस्थ भारती´ में प्रकाशित हुई। कविता के उस रूप को `गंगातट´ में संकलित विकसित रूप से मिलाकर देखने पर दिखेगा, कितनी कमियां हैं `इं.प्र´ वाले प्राथमिक रूप में। क्योंकि तब तक मैं उस कविता को शिवनाथ बाबा को नहीं सुना सका था - शिवनाथ मांझी जो नब्बे पार के सम्भवत: सर्वाधिक बुज़ुर्ग व्यक्ति हैं बनारस के मल्लाहों के कुनबे में, जल से भरी सांवले मेघ की तरह धीरे धीरे चलते हुए गंगा के किनारे सुबह-शाम दिख जाने वाले। मल्लाहों की जीवनचर्या से जुड़ी उस कविता के `उपयुक्त प्रथम श्रोता´ शिवनाथ मांझी ही हो सकते थे। उनकी अनुभव-सम्पदा का सारांश ही - जितना मैं ग्रहण कर पाया - उस कविता को वह प्रस्फुटित रूप दे सका जो `गंगातट´ वाले रूप में दिखता है। गोया, कविता की अन्तर्वस्तु ही `उपयुक्त प्रथम श्रोता´ को संकेतित करती है, उसको सम्बोधित होती है, उसकी प्रतिक्रियाओं को जज़्ब करती है, समुन्नत होती है। जितना बड़ा आपका परिचय क्षेत्र होगा, उतनी ही बड़ी संख्या में गुरू-स्थानीय प्रथम श्रोता आपको सुलभ होंगे। मुझे लगता है, किसी युग-नियंत्रक आलोचक को अपना स्थायी गुरू नियुक्त करने से कविता संवरने वाली नहीं।
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पुस्तक का नाम - पढ़ते -गढ़ते, अभिधा प्रकाशन, रामदयालु नगर, मुजफ्फरपुर, बिहार- ८४२ ००२
मूल्य - ७५ रूपए
प्रथम संस्करण - २००५
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(मेरी बात - आज मैंने ज्ञानेंद्रपति का लिखा एक गद्यखंड यहां लगाया है। पिछले कुछ बरस से मुझे यह सवाल लगातार तंग करता है कि हम कवियों का लक्ष्य किन पाठकों के ह्रदय तक पहुंचना है। मेरे हिसाब से हिंदी में पाठक दो तरह के हैं - पहले, जो स्वयं कवि या रचनाकार भी हैं और दूसरे, जो केवल पाठक हैं - उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं, और वही मेरे लिए मेरे पाठक हैं! अग्रज और साथी कवियों को अनदेखा करने की गुस्ताख़ी मैं कतई नहीं कर रहा। ज्ञानेंद्रपति ने ख़ुद को `निगुरा´ कहा है! मैं भी `निगुरा´ ही हूं पर एक पूरी परम्परा का हाथ मेरी पीठ पर है, जिसे मेरी कविताओं में लक्षित किया जा सकता है। मैं उस परम्परा के साथ कितना न्याय कर पाया हूं या कर पा रहा हूं, यह तो सुदूर भविष्य में आंकने की बात होगी और मैं भूल नहीं रहा हूं कि तब भी इतिहास का कूड़ादान खुला होगा! परम्परा का बोध ही मुझे दरअसल पाठकों के बोध तक ले जाता है। हिंदी पट्टी ऐसे पाठकों से भरी पड़ी है और मेरे लिए रांची, मुंगेर, पटना, बोकारो, रायपुर, बांदा, भोपाल, गुना, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, गोपेश्वर, बादशाहीथौल टिहरी, देहरादून, बलिया, आदि अनेक जगहों से आते पत्र और फोन काल्स उन धुकधुकियों के गवाह हैं, जो प्रतिक्रियास्वरूप मेरे ह्रदय को ध्वनि और गति देती हैं......अंत में इतना और कि मेरे पहले पाठक नैनीताल के निकट स्थित ब्रिटिशकालीन क़स्बे रामनगर में रहने वाले रम´दा यानी रमेश पांडे हैं, जो अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। पिछले कई सालों से उनकी हरी झंडी के बाद ही मेरी कविताएं छपने जाती हैं और साथ ही यह भी बताना मौजूं होगा कि उनके पास मज़बूत और टिकाऊ कपड़े की बनी एक लाल झंडी भी है.......)

गिरिराज किराडू की प्रतिक्रिया

ऐसा तो नहीं कि कवितायेँ लाल, झंडी हरीकवितायेँ हरी, झंडी लाल? :) (शायद) नेरुदा ने कहा था हमारे पास कुछ पाठक तो हैं, 'जनता' नहीं। अब उस 'कुछ' का अर्थ 'कितना' रहा गया है यह उदास और मारक गिनती कोई नहीं करना चाहता।इस पर कवियों की खुली पंचायत होनी चाहिए कि जितना कभी नहीं थी उतनी जनोन्मुखी हो कर भी (कम से कम अधिसंख्य कविता का आत्म-बिम्ब तो यही है) हिंदी कविता क्यों 'कंडीशंड' पाठकों तक सीमित हो गयी है - कभी कभी यह भी लगता है हम कवियों से बहुत अधिक उम्मीद करते हैं, अगर यह दूसरी तरह का और जैसी कवियों की दुनिया में आम सहमति जान पड़ती है 'सबसे भयानक'। 'कठिन', 'मुश्किल.' क्रूर', बाजारू' आदि समय है तो हम कवियों से वही प्रत्याशायें क्यों कर रहे हैं जो किसी कम 'भयानक' कम 'कठिन', कम 'मुश्किल', कम 'क्रूर', कम 'बाजारू' समय के लिए जायज़ थीं? इस समय में कविता की ठीक वही भूमिका नहीं हो सकती यह बिलकुल मुमकिन है. यूं 'बड़े' कवि बनने, बनाये जाने, कहने, कहलाये जाने का उद्यम सदाबहार है चलता रहेगा. 'बड़े' कवि, 'महत्त्वपूर्ण' कवि, 'विशिष्ट' कवि, 'अपना मुहावरा', 'विशिष्ट निजी स्वर' जैसे प्रिय पदों का कोई प्राथमिक मनोवैज्ञानिक पठन भी बहुत दिलचस्प रहेगा - करके देखिये. हर २ महीने में अपना 'निजी विशिष्ट स्वर' रखने वाले एक नौजवान की आमद और हर पांच साल में एक अनुभवी कवि के 'बड़े' कवि में पदोन्न्नत होते रहने के बावजूद हम लोग यह मातम कर रहे हैं तो बेवकूफ कौन?

June 22, 2009 10:57 AM

12 comments:

  1. आपको पिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

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    चाँद, बादल और शाम | गुलाबी कोंपलें

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  2. ऐसा तो नहीं कि कवितायेँ लाल, झंडी हरी
    कवितायेँ हरी, झंडी लाल? :)

    (शायद) नेरुदा ने कहा था हमारे पास कुछ पाठक तो हैं, 'जनता' नहीं. अब उस 'कुछ' का अर्थ 'कितना' रहा गया है यह उदास और मारक गिनती कोई नहीं करना चाहता.इस पर कवियों की खुली पंचायत होनी चाहिए कि जितना कभी नहीं थी उतनी जनोन्मुखी हो कर भी (कम से कम अधिसंख्य कविता का आत्म-बिम्ब तो यही है) हिंदी कविता क्यों 'कंडीशंड' पाठकों तक सीमित हो गयी है - कभी कभी यह भी लगता है हम कवियों से बहुत अधिक उम्मीद करते हैं, अगर यह दूसरी तरह का और जैसी कवियों की दुनिया में आम सहमति जान पड़ती है 'सबसे भयानक'. 'कठिन', 'मुश्किल.' क्रूर', बाजारू' आदि समय है तो हम कवियों से वही प्रत्याशायें क्यों कर रहे हैं जो किसी कम 'भयानक' कम 'कठिन', कम 'मुश्किल', कम 'क्रूर', कम 'बाजारू' समय के लिए जायज़ थीं? इस समय में कविता की ठीक वही भूमिका नहीं हो सकती यह बिलकुल मुमकिन है.

    यूं 'बड़े' कवि बनने, बनाये जाने, कहने, कहलाये जाने का उद्यम सदाबहार है चलता रहेगा. 'बड़े' कवि, 'महत्त्वपूर्ण' कवि, 'विशिष्ट' कवि, 'अपना मुहावरा', 'विशिष्ट निजी स्वर' जैसे प्रिय पदों का कोई प्राथमिक मनोवैज्ञानिक पठन भी बहुत दिलचस्प रहेगा - करके देखिये. हर २ महीने में अपना 'निजी विशिष्ट स्वर' रखने वाले एक नौजवान की आमद और हर पांच साल में एक अनुभवी कवि के 'बड़े' कवि में पदोन्न्नत होते रहने के बावजूद हम लोग यह मातम कर रहे हैं तो बेवकूफ कौन?

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  3. कवी और पाठक का रिश्ता कवक और शैवाल सा होता है एक को मजबूती का आधार चाहिए तो दूसरे को जीवन रस! बनता है लाइकेन !( कविता ?) आपने ब्लॉग पर बहुत से और बहुतों के लाइकेन दिए हैं धन्यवाद और बधाई!

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  4. अनुपम विवेकJune 22, 2009 at 7:45 PM

    अच्छी बहस चलाए हैं आप. लेखकगण पाठकों से ज़्यादा आलोचकों पर भरोसा करते हैं. यह भरोसा अक्सर धोका दे देता है. कुछ साल में ही पता नहीं चलता की कवि जी कहाँ से आए थे कहाँ गये !
    अनुपम विवेक -ग़ाज़ियाबाद

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  5. चलो भाई शिरीष तुम्हें हम जैसे पाठकों की चिंता तो है! ज्ञानेंद्रपति जी ने बढ़िया बात कही है, उसे तुमने परफ़ेक्ट टच दिया ! गिरिराज जी ने लाल-हरी वाली बात भी ठीक कही है - बताओ क्या मामला है?

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  6. भास्करJune 22, 2009 at 10:35 PM

    किसी युग-नियंत्रक आलोचक को अपना स्थाई गुरु नियुक्त करने से कविता नहीं सँवरने वाली - सुन रहे हैं नये नये कविगण !

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  7. hamare samay ke jaruri kavi gyanendra pati ke madhyam se apne behad prasangik sawal uthaya hai mitr...is bhayanak samay me jab tamam logo se ki gayi ummeedon ka matam mana rahe hote hain ek bechare se nirupay kavi se parivartankari muhim ki ummeed lagaye rehe hain....aur shikhar par baithe koi namvar master ki tarah no dene ko tatpar...
    ek majedar vakya bataun...9/11ke bad jab kaiyon aur kalakaron ne janta ko ashvasth kaarne ke liye jagah jagah pradarshan kiye to ek bade kavi pulitzer puraskar prapt STEPHEN DUNN ne un jamavdon me rajnaitik nahi baar baar prem kavitayen sunayi...so prem bhi ek rajniti hai bhai aur jhande wande ki bat karnewale sathi is bat par gaur farmayen..
    koi tajjub nahi ki loktantra ki ladai lad rahi iran ki yuva janta jab bhi azadi ki bat karti hai to forough farrokhzad ki kavitayen gungunati hai jisne dashakon pahle(1935-1967)behad imandar prem kavitayen likhi
    is bahas ko chhedne ke liye shukriya
    yadvendra

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  8. मुझे नहीं लगता कि लाल झंडी की बात इतनी नागवार गुजरनी चाहिए जितनी कि गुजरती दिखाई दे रही है. रोना पहले भी था, इधर ज्यादा बढ़ गया है कि कविता को विचारधारा बल्कि विचार से मुक्त होना चाहिए. कई बार लगता ही कि क्या कविता को विचारहीन हो जाना चाहिए? एक महोदय भगवा झंडी से जो इन दिनों साहित्यकारों पर काफी हावी हो रही है, से कभी नहीं बिदकते par लाल झंडी ka जिक्र उन्हें एकदम परेशां कर देता hai.

    -प्रेम कविता जनवादी कविता नहीं होती, ऐसा to किसी ne नहिऊ kaha. बल्कि जनवादी कवियों ne hee achchee aur सच्ची prem कवितायेँ likhee hain. laal jhandee se bidakne wale ek `बड़े`अश्लील कवितायेँ प्रेम के naam par likh chuke hain, sab jaante hain.

    - asal men sachhee kavita lal jhandee se nahi jeevan se nikaltee hai. kya kiya jaye ki zindagi ke raag laal jhandee walon ne hi zyada gaye hain.

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  9. किशोर झाJune 23, 2009 at 9:59 PM

    जित देखो तित लाल वाले माहौल में आँखें खोली हैं हमने! वो तो सी पी एम ने ऐसी तैसी करा दी पिछ्ले कुछ दिनों में. वैसे सी पी एम का मतलब ही लाल नहीं.

    हमारा लहू लाल!
    अधूरे सपनों से हमारी आँखें लाल!
    हमारे जीने का अंदाज़ लाल.

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  10. प्रीतिJune 23, 2009 at 10:06 PM

    आपने सबके लिए टिप्पणी का बॉक्स खोल कर अच्छा किया. अब सबके पास गूगल आई डी तो होती नहीं !
    ज्ञानेंद्रपति हमारे प्रिय कवि हैं. और हमारे शहर बनारस में रहते हैं ! जिन पाठकों के बारे में आप लोगों की चिंता है- हम वही पाठक हैं.

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  11. नरेन्द्र जैन ने अर्नेस्तो कार्देनाल की एक कविता का अनुवाद किया था बहुत पहले !पेशे नजर -
    "मेरे प्यार तुमने खबरों में यह सूना की शान्ति के प्रहरी अपने काम में विलक्षण प्रतिभा वाले प्रजातंत्र के वीर योद्धा चर्च के रक्षक जनमानस के रखवाले हमारे संरक्षक ..अर्नेस्तो ..!वे जनभाषा को हथिया रहे हैं (बिलकुल जैसा की पैसे के साथ वे कर रहे हैं )इसीलिये हम कवी एक कविता पर इतना काम करते हैं और इसीलिये मेरे प्यार -कविताएँ बहुत जरूरी हैं !!"

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  12. कविता को विचारधारा बल्कि विचार से मुक्त होना चाहिए. कई बार लगता ही कि क्या कविता को विचारहीन हो जाना चाहिए?


    vicharheen kavita ho hi nahi sakti....manushya ki koi bhi kriti vichaarheen kaise ho sakti hai?
    ye zaroor hai ki vichar aur vichar dhara ke bojh se Kavita ka bhari nuksaan hua hai. is liye mukti ka prashn Vaajib hai.

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