Wednesday, June 17, 2009

ईरानी कवि माजिद नफ़ीसी की कविताओं का सिलसिला/ तीसरी और समापन किस्त





ख़ाली टोकरियां

भोर होते होते
दिखाई पड़ती हैं कई ख़ाली टोकरियां
रसोई में जिन्हें छोड़ आयी थीं तुम...

एक में सहेज देता हूं मैं चीड़ के कोन
सुदूर घाटियों से चुन चुन कर जिन्हें ले आयी थीं तुम..

और दूसरे में काले रंग वाली ढेरों सीपियां
आती है जिनसे गहरे सागरों की गूंज...

फिर भी बची रह जाती है एक अदद टोकरी
टकटकी लगाकर बार बार देखती हुई मुझे
छुपे हुए हैं उसमें जाने कौन कौन से
अजाने भेद...



धुलाई

वाशिंग मशीन की ध्वनि ठहरी रहती है सिर्फ़ जहां की तहां
और हमारे कपड़ों से फिसलती जाती हैं रात की सुगंध भरी स्मृतियां एक एक करके...

जलती लकड़ी और हरी दूब की गंध
तुम्हारी अंगियां पर ठिठक गए शराब के दाग़
और मेरी कालर पर बैठ गए पके फलों के धब्बे...
तुम्हारे कंधों पर भोर की ओस के छींटे
और मेरी पीठ पर चिपके हुए धूसर मिट्टी के दाग़

डूबते सितारों के बीच हमारा ढुलमुल ढुलमुल लुढ़कते जाना
और लाल गोले-सा सूरज का सहसा उछलकर प्रकट हो जाना...

गोल गोल घूमने दो इस चक्के को
और उलट पलट करने दो कपड़े...

प्रेम तो होता है बिल्कुल बेदाग़ झक्क्क सफ़ेद
और इसकी साफ़ सुथरी कमीज़
चमकती हुई दिखाई देती है
दूर दूर से भी हमेशा...




प्रेम मिलना नहीं आसान

मुझे चाहिए तुम्हारी अनिमेष टकटकी
आंखें नहीं चाहिए तुम्हारी....

मुझे चाहिए तुम्हारा चुंबन
होंट नहीं चाहिए तुम्हारे ...

मुझे चाहिए तुम्हारा आलिंगन
बाहें नहीं चाहिए तुम्हारी...

मेरी लालसा है प्रेम की
क्योंकि
प्रेम मिलना नहीं आसान...

मुझे चाहिए तुम्हारा मधु
छत्ता नहीं चाहिए तुम्हारा...



घोंघे के लिए

ओ पिद्दी से
पूरा घरबार अपनी पीठ पर ही लाद कर चलने वाले...
क्या डर नहीं लगता तुम्हें कि मेरा भारी भरकम पांव
कहीं मिटा ही न डाले तुम्हारी हैसियत?

कल रात बारिश में
तुम घुस आए मेरे जूतों के अंदर हिफ़ाजत से
बचाने खुद को...

आज
जब लौट रहे हो तुम अपने हरे भरे आशियाने में वापिस
सिर उठाने लगी है मुझमें भी लालसा
घरवापसी की...


ऐडी* का सूना कोना

आज पोंछ रही है सड़क से
बारिश तुम्हारा लहू
अब बचेगी यहां सिर्फ़ तुम्हारी आलोकित मुस्कान...

तुम्हारा लम्बा बेसबाल बैट दीवार से टिककर खड़ा है
और किताबों से भरा बैग
कर रहा है प्रतीक्षा तुम्हारे कंधों की

धिक्कार है उन हाथों को जिन्होंने बनाई बंदूक
धिक्कार है उन हाथों को जिन्होंने लाकर रखा उन्हें दुकान में
धिक्कार है उन हाथों को जिन ने दबाया इसका घोड़ा

मैं पड़ता जा रहा हूं बर्फ़ जैसा ठंडा
और बुलेट के खोल जैसा खोखला

क्योंकि जानता हूं तुम्हारी मां अब कभी लांघ नहीं पाएगी
देहरी किसी स्कूल की
और न क़दम बढ़ा पाएगी बेसबाल के मैदान की ओर
न ही वो दुखियारी
गरम कर पाएगी अपनी भट्टी
पकाने को कभी तुम्हारी पसंद का कोई पकवान...



(28 फरवरी 2006 को शहर के एक स्कूल में अंधाधुंध गोलियां चलाकर कुछ निर्दोष बच्चों को मार डाला गया...अमरीकी समाज में ऐसी घटनाएं आम हैं। कवि ने ऐसी एक बच्ची ऐडी लोपेज़ को श्रदाजंलि देते हुए ये कविता लिखी।)



पुल पर

मैं काठ के इस पुल पर लेटा हुआ हूं
माथे के नीचे हाथ को तकिया बनाए
और फिसल रही हैं तुम्हारी उंगलियां
मेरे चेहरे पर...

तुम्हारी लुभवनी बतकही से भरकर बहने लगता है मेरे कान का प्याला
पानी प्रवेश कर जाता है मेरी शिराओं के अंदर
और मैं बहने लगता हूं अनियंत्रित
इस रहस्यमय नदी में
उतराती हुई किसी आकुल नौका की मानिन्द
सघन वन के अंदर से
जहां चहचहाते हुए परिंदे हैं
और है विकलता भी
दूब की चीन्ही हुई गंध के साथ साथ...

जाने हम लगेंगे जाकर किस ठौर?
तेज बहाव वाले पानी के बीच
मेरे पास तो नहीं है कोई कम्पास
तुम्हारी फिसलती उंगलियों के सिवा?


2 comments:

  1. Zinda kavitaayen...shireesh bhai, is kavi ko aur bhi padhna chahta hoon.

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  2. आम तौर पर आदमी दंभ के कद पर सवार होकर महान और भव्य की खोज में रहता है, और नजदीक की मामूली चीज़ों के अस्तित्व से भी अनजान रहता है जैसे रद्दी की टोकरी और जूते में आराम फरमाता घोंघा.नफीसी ऐसी ही चीज़ों को देख पाने वाले बड़े कवि लगे जो इन्हें अहसास रहने तक भी महसूस कर पाते हैं.

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