Saturday, May 30, 2009

मारिओ बेनेदेती की कविताएं - दूसरी तथा समापन किस्त

पिछली पोस्ट से जारी...
कुछ और हाइकू

1.
मैं चाहता हूं
कि हर साल शुरू हो
तो शुरू हो शनिवार से

2.
ऐसा कोई आह्लाद नहीं
जो ज़्यादा आह्लादकारी को
आह्लाद के पूर्वाभास से

3.
कोई नहीं ऐसा जो चुहलबाज़ी करे
सत्य से
जो ऐसा करते हैं, झूट से ही करते हैं

4.
बंदी स्वप्न में देखता हूं
हरदम ऐसी चीज़
जो देखने में हो हू-ब-हू चाबी जैसी
***

भौंचक और क्रुद्ध *

हम हैं यहां
भौंचक्के
और क्रुद्ध
हालांकि ये मौत
एक ऐसी विडम्बना है
जिसका बना हुआ था बरसों से पूर्वाभास

तुम हमारी क्लेशपूर्ण अशांत चेतना हो
वे कहते हैं कि तुम्हें अग्नि के सुपुर्द कर दिया गया
बिलकुल उसी तरह जैसे किया करते हैं
भद्रजनों के साथ

अच्छी लगी ये ख़बर .....

एक प्रचंड कोमलता थी जो
जो कूट कूट कर भरी हुई थी
तुम्हारे अंदर

वे कहते हैं उन्होंने जलाकर भस्म कर दीं
तुम्हारी योग्यताएं
सिवा एक अदद अंगुली के

इतना ही पर्याप्त है हमें दिखाने को राह
ताकि हम कर सकें भर्त्सना
दुष्टात्मा की और उसके वीभत्स कलंकों की

और रख सकें
रख सकें एक बार अंगुली
बंदूक के घोड़े पर
फिर से...
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* ये कविता बेनेदेती ने 1967 में चे ग्वेवारा की हत्या किये जाने की ख़बर सुनकर लिखी थी...बेनेदेती का लैटिन अमरीका में सक्रिय अनेक सशस्त्र संगठनों से निकट का सम्बन्ध रहा और उन्होंने इस पर कभी पर्दा भी नहीं डाला !
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2 comments:

  1. मारिओ बेनेदेती को भी एड्वार्ड सईद की तरह विस्थापन की पीडा से गुजरना पडा लेकिन यह पीडा अपने किसी भी रूप मे उन पर हावी नही हो पाई इसिलिये तो वे लिख सके..कुछ भी हो/मौत इस बात का सबूत है/कि था यहाँ भी जीवन.

    अच्छे अनुवाद के लिये बधाई.

    ReplyDelete
  2. बहुत दिनों बाद ब्लॉग देखने का मौका मिला. दोनों ही किश्तें शानदार.इस कवि को सलाम.

    ReplyDelete

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