Monday, May 25, 2009

ट्राम में एक याद - ज्ञानेंद्रपति

यह विख्यात कविता ज्ञानेंद्रपति की शुरूआती कविताओं में है और पहली बार 1981 में छपे उनके संकलन "शब्द लिखने के लिए ही कागज़ बना है" में संकलित हुई, जो अब अप्राप्य है। यहाँ इसे "कवि ने कहा" नामक प्रतिनिधि संकलन से लिया जा रहा है। कवि ने अनुनाद को उनकी कविताएँ लगाने की स्नेहिल अनुमति दी है, इसके लिए अनुनाद के सभी सहलेखकों के साथ मैं उनका आभारी हूँ। इस कविता के बाद हम लगातार कवि की कविताएँ अनुनाद पर देते रहेंगे, जिनमें कई समयावधियों का प्रतिनिधित्व होगा। यहां प्रस्तुत कविता अपनी निरन्तर रागात्मकता और विकलता की वजह से मुझे बहुत प्रिय है, इसलिए अग्रज ज्ञानेंद्रपति के अनुनाद पर स्वागत के रूप में पहली कविता यही..... जो आप सबको भी निश्चित ही बहुत पसन्द आयेगी.....सोचिए अब तो ट्राम भी एक याद है !


ट्राम में एक याद

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
कुछ-कुछ खुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?
अब भी कविता लिखती हो?

तुम्हें मेरी याद न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आंखों के आगे झूली हो
तुम्हारी क़द-काठी की एक
नन्हीं-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
आंखों में उतरती है किताब की आग?
नाटक में अब भी लेती हो भाग?
छूटे नहीं है लाइब्रेरी के चक्कर?
मुझ-से घुमन्तू कवि से होती है कभी टक्कर?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत बहुत मित्र?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?
अब भी जिससे करती हो प्रेम, उसे दाढ़ी रखाती हो?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं गेंद-सी उल्लास से भरी हो?
उतनी ही हरी हो?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हंसी कम कम है
विराट धक्-धक् में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ाली है
वहां उगी है घास वहां चुई है ओस वहां किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

फिर आया हूं इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ देखता हूं
आदमियों को किताबों को निरखता लेखता हूं
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग-बिरंगे लोग
रोग-शोक हंसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूं अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूं तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है

चेतना पारीक, कहां हो कैसी हो?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो !
****
----------------------------------------------
कवि ने कहा
किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज
नई दिल्ली- 02
मूल्य - 70/-
****

6 comments:

  1. .......arsa pahle ye kavita gyanendra ji se suni thi....yahi allahabad me.....un dino "prem" ki satrangi bhumikao me ye jitni sukhad thi.....aaj uski (prem) darun (?) nispattiyo me bhi utni hi rochak hai.......

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  2. ज्ञानेन्द्रपति जी की कविता यहाँ देखना बहुत अच्छा लगा.अच्छा काम कर रहे हो भाई शिरीष.बधाई.

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  3. अविस्मरणीय कविता ऐसी ही होती है. इसे आज फिर पढ़ा और वैसा ही अहसास हुआ जो बरसो पहले हुआ था, जब मेरे पास थोडी निश्छलता बची थी.

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  4. priy shirish ji,
    jnaanendrapati ji ki yah kavita hindi ki mahaan & avismarneeya kavitaaon mein-se hai. yahaan ise prastut karne ke liye aapka bahut-bahut shukriya !
    aapne comment bhi bahut achchha & bhaavbheena likha hai. sirf ek truti hai--wah bhi takneeki--ki 'yah kavita ab apraapya hai'. aasanna ateet mein 'kitaabghar' prakaashan se chhapee kavi ke donon hi sanchayanon, 'bhinsaar' & 'kavi ne kaha' mein yah kavita aasaani se praapya hai; fir aap ise 'apraapya' kyon bataa rahe hain ?
    -----pankaj chaturvedi
    kanpur

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  5. बहुत अच्छा लगा।
    मैं हूँ केरल राज्य से
    http://hindisopan.blogspot.com

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  6. It is so beautiful. Does anyone know if chetna parik is a real person? If so what relationship does she have with the poet?

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