Tuesday, May 12, 2009

कोरियाई कवि कू सेंग की कविताओं का सिलसिला / नौवीं किस्त



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मैं


मैं एक नहीं दो हूँ भीतर से
या शायद तीन

एक मैं जिसे लोग बाहर देखते हैं
और एक मैं जो छुपा रहता है भीतर
और तीसरा जो अवचेतन में हैं
जो अपने आप नहीं जा सकता अध्यात्म की ओर
हर मैं एक दूसरे से दूर खड़ा रहता है

आज फिर
नाई की दुकान में दाढ़ी और बाल बनवाने के बाद
जैसे ही एक लड़की ने मुझे एक संदेश लिखा कागज़ का एक टुकडा दिया
ग़लती से उसके हाथ
मेरे अंतरंग अंगों को छू गए
और मेरे भीतर एक बहस छिड़ गयी -
एक मैं था जो उसे चेताना चाहता था
और दूसरा उम्मीद कर रहा था
उसके हाथों के दोबारा फिसलने की
आप कह सकते हैं
कि मुझसे मेरी ही यह लड़ाई
स्थायी है
और निरंतर भी

लेकिन
अभी थोड़ा पहले ही
एक रात सपने में मैं एक ऐसी औरत के साथ था
जिससे मैं कभी नहीं मिला
और ऐसा होना बहुत वीभत्स है
पर मैं स्खलित हो गया
यह कौन सा मैं था जिसने इसे अंजाम दिया?
इन तीनों में से कौन-सा
सही या गलत है ?
कौन-सा अच्छा है, कौन बुरा ?
और इनमें से कौन है जो वास्तव में
मैं हूँ ?

मैं जितना हैरान होता जाता हूँ
उतना ही कम समझ पाता हूँ अपने अखीर और
इस गड़बड़ को

और अपनी इन अलग-अलग
प्रतिक्रियाओं के चलते और भी बेचैन होता जाता हूँ
यह जानने के लिए
कि वह कौन-सा मैं होगा
जो मरेगा एक दिन
और ले जाया जाएगा
फैसले के लिए!


बाहर आओ साँप !

मैं महान कलाकार पंग-गॉग के अतीत से संबधित
चित्रों की एक चित्र में गया
होआम गैलरी के दोनों तलों पर शीर्षक
यह उनके सत्तर साल के कर्मशील जीवन का शुरू से अखीर तक का
पूरा काम था

उनके साथ गैलरी में टहलते हुए
चूँकि कुछ कहना ही था
सो मैंने कहा - " क्या यह सब चित्र आपने अपनी प्रेरणा से बनाए हैं ? "और उन्हें इसके लिए बधाई दी

" कभी-कभार मैंने दूसरे लोगों के काम की नकल भी की! "- उन्होंने स्वीकार किया

हम कुछ आगे बढ़े
और उस चित्र के आगे ठिठक गए जिसका शीर्षक था
"बाहर आओ साँप "
उसमें - "किसी बड़ी तश्तरी जैसे चाँद के नीचे
एक बड़ी चट्टान जैसा मेंढक बैठा हुआ है
उसके पिछले पाँव फैले हुए हैं
और थुलथुला पेट नास्मन पर्वत जितना बड़ा
उसने अपने बायें पंजे की हथेली में एक गिलास थामा हुआ है- किसी तरल से भरा
आँखें उसकी बड़ी-बड़ी कटोरी जैसी
मुँह भरा हुआ ऐसे मानो कुछ उगलने को तैयार
एक अजीब और छू लेने वाली निगाह
सब कुछ शराब में बहा हुआ "

आहा - मैं बोल पड़ा - "यह तो तुम्हारा आत्मचित्र है मेरे दोस्त! "

हाँ उसने कहा - " तुम शायद इस प्रशंसनीय स्थिति को जानते हो?
नैतिकता या पवित्रता की राह पर मैं इतना अच्छा नहीं की हूँ
लेकिन यह पीने-पिलाने के बीच आ जाता है तो................. "

हमने एक दूसरे को देखा ग़ौर से और ठठा कर हँसने लगे

"क्या तुम अब भी पीते हो मेरे बूढ़े दोस्त?"

"नहीं, मैं तो इस सबको अलविदा कह चुका हूं!
और तुम? "

"मैं भी !
डॉक्टर का आदेश जो है! "

और इस थोड़ी-सी बातचीत के बाद
हम दोनों ही
डूब गए
एक अवसाद भरी ख़ामोशी में !


1 comment:

  1. एक बार फिर से कू सेंग की कवितायेँ देने के लिए आभार.इनकी कवितायेँ कुछ अच्छी कविताओं की तरह बार बार कई बार पढ़ी जा सकती है. दूसरी कविता सन्दर्भ और प्रतीकों में कुछ अलग लगी.

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