Sunday, May 10, 2009

हमारा लोकतंत्र और बाबा का न्यारा मारक मन्त्र

यह पोस्ट हमारे आदरणीय मित्र पद्मश्री प्रो० शेखर पाठक के सौजन्य से
उनके प्रति अनेक बार आभार के साथ

(बाबा की तस्वीर अभय भाई के ब्लॉग निर्मल-आनंद से )
यह बाबा नागार्जुन की कविता की ताकत है कि उसे इस तरह पॉप संगीत में भी गाया जा सकता है। मेरे लिए ये समय ९० से लेकर ९४ तक उन गर्मियों में लौटने का भी है, जब बाबा काशीपुरवासी श्री वाचस्पति जी के घर से कुछ दिनों के लिए रामनगर हमारे घर आया करते थे। सोचता हूँ अपनी कविता के साथ उन्हें यह प्रयोग कैसा लगता - शायद वे बिल्कुल ऐसी हँसी हँसते, जैसी बगल की तस्वीर में हंस रहे हैं........

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सूचना : महत्वपूर्ण युवा कवि - आलोचक पंकज चतुर्वेदी तथा अमरीकावासी ब्लोगर साथी भारतभूषण तिवारी भी अब अनुनाद की टीम में शामिल हैं। हमारा आमंत्रण स्वीकार करने के लिए धन्यवाद ! इन दोनों का अनुनाद में बहुत बहुत स्वागत है!
सिद्धेश्वर सिंह की प्रतिक्रिया
* आज 'अनुनाद' पर बाबा नागार्जुन की 'मंत्र कविता' को सुनना सुखद लग रहा है. मेरे हिसाब से यह कविता के सांगीतिक रूपान्तरण का मसला नहीं अपितु एक विधा का दूसरी विधा में पुनर्सृजन का मामला है. मैं इसे मात्र बाबा की ही रचना नहीं मानता , यह गायक - संगीतकार जुबीन गर्ग और अंगराग महंत तथा सौरेन रायचौधुरी के साथ ही फ़िल्म 'स्ट्रिंग्स : बाउन्ड बाइ फ़ेथ' के निर्देशक संजय झा की रचना भी है. मेरा मानना है कि जब किसी व्यक्ति के मनोजगत से कागज या अन्य किसी भी माध्यम पर / से कोई कृति समुदाय तक पहुँचती है तो उसे देखने - परखने - अनुभूत करने की प्रक्रिया में वही / वैसी ही नहीं रह जाती जो कि 'मूल रचनाकार' की प्रस्तुति के रूप में होती प्रकट हुई होती है. जब मैं आठवीं -नौवीं का विद्यार्थी था तब बिहार से पढने आये / आने वाले अपने सहपाठियॊं से किसी 'नागा बाबा' का जिक्र सुना करता था जो लोगों को कवितायें सुनाकर जागरुक करने के काम में लगे हुए बताये जाते थे , उनकी कुछ कविताओं के टुकड़े भी वे लोग उद्धृत करते थे जो हमारी बाल मंडली के लिए कौतुक बनते थे और हम लोग अपने हिसाब से उनकी धुन / धुनें बनाकर गाने की कोशिश कतते थे ।एक तरह से तब वह हमारी मंडली की रचना भी थी। यह तो बहुत बाद में पता चला कि यह तो वही कवि नागार्जुन हैं जिन्हे बाबा कहा जाता है और जिनकी कविता 'बादल को घिरते देखा है' हमारे कोर्स में थी.

** पुनर्सृजन एक ऐसी परंपरा है जो रचना को बहुत आगे ले तक जाती है. इस 'मंत्र कविता' को मैंने नैनीताल में रहते हुए पोस्टर पर भी देखा है आपके मित्र और मेरे गुरु प्रो.शेखर पाठक तथा कलमघिसाई की कसरत की शुरुआती कुंजी थमाने वाले राजीव लोचन दद्दा के पास शायद मौजूद हों. आपकी इस पोस्ट से मई कई -कई जगहों की यात्रा कर आया हूँ - अपने स्कूली दिनों की, अपने शहरे -तमन्ना नैनीताल की , असम- अरुणाचल की और उस दौर की भी जिसकी (अपनी एक कविता की पंक्ति में कहूँ तो॥) 'स्मृति में ही बची है अरुणाभा की आंच'. प्यारे मित्र ! मैं इस वक्त आधी रात के एकांत में आपकी उम्दा और यादगार पोस्ट पढ़कर जो भी प्रलाप / एकालाप जैसा कुछ कर रहा हूँ , यह भी एक तरह का पुनर्सृजन ही है शायद ?

*** 'मंत्र कविता' का टेक्स्ट भी यहाँ दिखना चाहिये था, लिंक्स भी. खैर॥

**** 'अनुनाद' से और मित्र जु्ड़ रहे हैं यह देख अच्छा लगा. पंकज चतुर्वेदी के आने से तो मन खिला है.

5 comments:

  1. सुनील नंदनMay 10, 2009 at 4:25 PM

    एक कविता हमेशा कितने रूपों में जीवित रहती है, आपकी यह पोस्ट इसका ज्वलंत उदाहरण है. आपके ब्लॉग को पहले भी विज़िट करता था पर टिप्पणी नहीं लगा पाता था. सबका रास्ता खोलने का शुक्रिया. बढ़िया ब्लॉग. बढ़िया काम. मेरी बधाई
    -------------------------
    सुनील नंदन

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  2. बाबा की अद्भुत कविता को अत्‍यद्भुत अंदाज में सुनाने के लिए धन्‍यवाद.

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  3. * आज 'अनुनाद' पर बाबा नागार्जुन की 'मंत्र कविता' को सुनना सुखद लग रहा है. मेरे हिसाब से यह कविता के सांगीतिक रूपान्तरण का मसला नहीं अपितु एक विधा का दूसरी विधा में पुनर्सृजन का मामला है. मैं इसे मात्र बाबा की ही रचना नहीं मानता , यह गायक - संगीतकार जुबीन गर्ग और अंगराग महंत तथा सौरेन रायचौधुरी के साथ ही फ़िल्म 'स्ट्रिंग्स : बाउन्ड बाइ फ़ेथ' के निर्देशक संजय झा की रचना भी है. मेरा मानना है कि जब किसी व्यक्ति के मनोजगत से कागज या अन्य किसी भी माध्यम पर / से कोई कृति समुदाय तक पहुँचती है तो उसे देखने - परखने - अनुभूत करने की प्रक्रिया में वही / वैसी ही नहीं रह जाती जो कि 'मूल रचनाकार' की प्रस्तुति के रूप में होती प्रकट हुई होती है. जब मैं आठवीं -नईं का विद्यार्ही था तब बिहार से पडः़अने आये / आने वाले अपने सहपाठियॊं से किसी 'नागा बाबा' का जिक्र सुना करता था जो लोगों को कवितायें सुनाकर जागरुक करने के काम में लगे हुए बतये जाथे थे , उनकी कुछ कविताओं के टुकड़े भी वे लोग उधृत करते थे जो हमारी बाल मंडली के लिए कौतुक बनते थे और हम लोग अपने हिसाब से उनकी धुन / धुनें बनाकर गाने की कोशिश कतते थे .एक तरह से तब वह हमारी मंडली की रचना भी थी. यह तो बहुत बाद में पता चला कि यह तो वही कवि नागार्जुन हैं जिन्हे बाबा कहा जाता है और जिनकी कविता 'बादल को घिरते देखा है' हमारे कोर्स में थी.

    ** पुनर्सृजन एक ऐसी परंपरा है जो रचना को बहुत आगे ले तक जाती है. इस 'मंत्र कविता' को मैंने नैनीताल में रहते हुए पोस्टर पर भी देखा है आपके मित्र और मेरे गुरु प्रो.शेखर पाठक तथा कलमघिसाई की कसरत की शुरुआती कुंजी थमाने वाले राजीव लोचन दद्दा के पास शायद मौजूद हों. आपकी इस पोस्ट से मई कई -कई जगहों की यात्रा कर आया हूँ - अपने स्कूली दिनों की, अपने शहरे -तमन्ना नैनीताल की , असम- अरुणाचल की और उस दौर की भी जिसकी (अपनी एक कविता की पंक्ति में कहूँ तो..) 'स्मृति में ही बची है अरुणाभा की आंच'. प्यारे मित्र ! मैं इस वक्त आधी रात के एकांत में आपकी उम्दा और यादगार पोस्ट पढ़कर जो भी प्रलाप / एकालाप जैसा कुछ कर रहा हूँ , यह भी एक तरह का पुनर्सृजन ही है शायद ?

    *** 'मंत्र कविता' का टेक्स्ट भी यहाँ दिखना चाहिये था, लिंक्स भी. खैर..

    **** 'अनुनाद' से और मित्र जु्ड़ रहे हैं यह देख अच्छा लगा. पंकज चतुर्वेदी के आने से तो मन खिला है.

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  4. बहुत सुंदर शिरीष भाई...सुखद आश्चर्य ....
    एक विचार जो कहीं न कहीं कार्यान्वित होता ही है...इसे इसी अंदाज़ में गाने के बारे में बरसों पहले अपने साथियों से चर्चा करता रहा हूं:)
    उत्तम...मज़ा आ गया...

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  5. यहाँ ये कविता है औरयहाँ भी ये गाना है। पहले वाले कड़ी पर अगर कविता सही टाइप की गई है, (अगर सही छपी गई थी), तो गाने के कुछेक शब्दों के उच्चारण ग़लत या अलग हैं।

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