Monday, May 4, 2009

एक दिन मैं मारा जाऊंगा



एक दिन मैं मारा जाऊंगा

मरना नहीं चाहूंगा पर कोई चाकू घुस जाएगा
चुपचाप
मेरी टूटी और कमज़ोर बांयीं पसली के भीतर उसी प्यारभरे दिल को खोजता
जो हज़ार जुल्मों के बाद भी धड़कता है

कोई गोली तलाश लेगी मेरी कनपटी का रास्ता
मेरे दिमाग़ में
अचानक रुक जाएगा विचारों का आना
कल्पना का गढ़ना
स्मृतियों का रोना और सपनों का होना
सबकुछ अचानक रुक जाएगा
एक धमाके की आवाज़ के साथ

शायद कोई दोस्त ही मार देगा मुझे जैसे ही बात करके पीठ मोड़ूंगा मैं उससे

शायद प्रेम मार देगा मुझे
शायद मेरा अटूट विश्वास मार देगा मुझे

मुझे मार देगा शायद मेरा शामिल रहना

शायद कविता लिखना मार देगा मुझे एक दिन
लेकिन सिर्फ़ कविता लिखना नहीं,
बल्कि शामिल रह कर कविता लिखना मारेगा मुझे

एक दिन मैं मारा जाऊंगा
ऐसी ही
कुछ अनर्गल बातें सोचता हुआ

क्योंकि
आज के समय में सोचना भर काफी है
किसी को भी मार देने के लिए !

पर इतना याद रखा जाए ज़रूर
कि मरूंगा नहीं मैं
मुझे कोई मार देगा

मुझे
मृत्यु दिखाई नहीं देगी
सुनाई भी नहीं देगी
मुझे तो दिखाई देगा जीवन लहलहाता हुआ
मुझे सुनाई देगी एक आवाज़ ढाढ़स बंधाती हुई

जीवन और ढाढ़स के बीच ही कहीं
मारा जाऊंगा मैं

किसी अलग जगह पर नहीं
जहां मारे जाते हैं मनुष्य सभी एक-एक कर
मैं भी मारा जाऊंगा वहीं !

तुम बस याद करना मुझे कभी पर याद करने से पहले अभी रुकना
पहले रुक जाएं मेरी सांसे
थम जाए खून
मर जाऊं ठीक तरह से तब याद करना तुम मुझे

स्मृतियां ही व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती हैं
इसलिए
स्मृतियों के किसी द्वीप पर तुम याद करना मुझे !

16 comments:

  1. शिरीष यह कविता दूसरी अन्य कविताओं के साथ ही, जिसमें एक समान्य आदमी के इस निर्मम समय में मार दिये जाने के कारण मौजूद हों, किसी तार्किक परिणति तक पहुंच सकती है। वरना स्वतंत्र रूप में यह किसी के भी य़ूं निर्मम तरह से मारे दिये जाने की वजहों को पूरी तरह से नहीं रख पा रही है। हां जो पाठक पहले से कवि शिरीष को जान और पढ रहा है, उसके लिए इसे समझना मुश्किल नहीं। क्या ही अच्छा होता कि दो एक कविताएं इसी मूढ की और भी साथ में होती।

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  2. शिषिर जी लाजवाब अभिव्यक्ति .....!!
    कमाल कि रचना.....!!
    आपने लाक लगा रखा है वर्ना पसंदीदा पंक्तियाँ यहाँ लगती......!!

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  3. ऐसी कविता कोई चाहे तो भी कैसे कहेगा की अच्छी कविता. मैं कहूँगी दहला देने वाली कविता. सच्ची कविता.

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  4. मार दिए जाने के ख़तरे के बावजूद सोचने पर मजबूर करती कविता जो दिल से लिखी गयी. बधाई शिरीष जी.

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  5. इस कविता की प्रशंसा में कुछ कहने की बजाय एक अनुरोध करूंगा. तो गुजारिश है कि अनुनाद पर अगला प्रकाशन व्योमेश की कविता 'द्वीप पर सैलानी' का हो.

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  6. हृदय को विचलित करते शब्‍द

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  7. यह कविता सीधे कनपटी से गुजरती है - पहले पाठ में पुरानी फिल्मों की तरह कुछ ऐसी छिप्रता से कि सिर्फ़ धाँय की आवाज़ आती है और सामने कोई ढेर हो जाता है - लेकिन दूसरे तीसरे पाठ में मैट्रिक्स जैसे स्लोमोशन में, वहम होता है हमारे पास भी वर्चुअल में हाइपर-चपल पराक्रमी हो गए उन पात्रों की तरह शायद बच सकने का कोई मौका है. पर कनपटी इस बुलेट से वैसे जुडी है जैसे अर्थ शब्द से. यह बुलेट कहीं और से नहीं कनपटी से ही गुजरेगी. शामिल रहने की वज़ह से या बम धमाकों में बिना किसी वज़ह से पर अब कोई गोली कोई बुलेट हरवक्त हवा में है. क्या ऐसा हो सकता था कि बहुत 'सुन्दर' (वो यहाँ भी संभव है) आखिरी पंक्तियों को तुम कहीं और के लिए बचा लेते और यह कविता कनपटी से गुजरने की बजाय उससे टकराकर फ्रीज़ हो जाती -

    मुझे सुनाई देगी एक आवाज़ ढाढ़स बंधाती हुई

    जीवन और ढाढ़स के बीच ही कहीं मारा जाऊंगा मैं

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  8. इस संशय, भय और अव्यस्था से भरे समय में सबसे निश्चित यही लगता है कि मृत्यु शर्तिया अपना रास्ता बना लेगी. कविता में एक मौर्बिड एहसास अन्तर्निहित सूत्र के रूप में विद्यमान रहता है. गिरिराज जी से सहमत हूँ कि इसके हर अगले पाठ में ऐसा लगता है कि आभासी दुनिया में स्लो मोशन में घटता ये सब बचने के अवसर देता है. पर अंततः कविता वूडू की एन्द्रजालिकता की तरह भय और अविश्वास के लोक में निरीहता की भावना को ही ज़्यादा सशक्त स्वर दे रही है, ऐसा मुझे लगा.

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  9. aaj jo mahol ho gaya hai...us mahol pe apne bahut sachhi kavita likhi hai...

    bahut sundar...

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  10. इतने लोगों की बातचीत के बाद यह कविता और खुली है। मेरी समझ में पहली बात साफ़ हो गई है कि कवि को मारे जाने की आशंका तो है, लेकिन संजय जी की बात से असहमत होते हुए कहूंगी कि वह निरीह कतई नहीं है। देखा जाना चाहिए कि वह किन वजहों से मारा जाएगा। प्रेम, दोस्ती और विश्वास भी उन वजहों में हैं और हमारी दिल्ली में ठीक इन्हीं वजहों से मारे जा रहे लोगों के उदाहरण हमारे सामने हैं। कवि ने एक बड़ा कारण कविता लिखने को भी बताया और ध्यान दीजिए कि सिर्फ कविता लिखने को नहीं `शामिल´ रहकर कविता लिखने को। मेरे लिए इसका अर्थ ये है कि कवि शोषित जनता और उसके अधिकारों के लिए खड़ा है और वो जहां खड़ा है वहां भी कई लोग मारे जा चुके हैं। वह जनता में, आम आदमी में शामिल है और आम आदमी का मार दिया जाना कोई बड़ी बात नहीं। मैं तो उतनी समझ नहीं रखती पर दूसरे साहित्यिक टिप्पणीकारों से अनुरोध है कि एक बार मेरी निगाह से इस कविता को देखकर कोई टिप्पणी कीजिए। आजकल चुनावी घोषणापत्रों का मौसम है और इस मौसम में एक आम आदमी का घोषणापत्र यह कविता हो सकती है।

    आदरसहित रागिनी

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  11. THIS POEM ECHOES FROM THE VERY INNERMOST FRAGMENT OF A POET'S SOUL.
    THE POET WHO KNOWS THE WORLD FULL WELL.
    WHERE A FRIEND CAN KILL ANOTHER FRIEND WHERE BETRAYAL RESIDES IN EVERY HEART!
    THE POET TALKS OF THE HEART BEING PIERCED BY A SHARP BUTCHERING KNIFE, THE HEART HE KNOWS THAT LOVES AND FOR LOVING WHICH SUFFERS MOST MISERABLY.
    POET ALSO TALKS OF A BULLET BATTERING THE BRAIN!!
    BRAIN WHERE THE POET'S IMAGINATION RESIDES!!

    HIS FEELING OF LOVE OR HIS TRUST IN SOMEONE MAY KILL HIM!!
    WHICH IS SAID MOST PRACTICALLY AS IT'S CONSIDERED UTTER FOOLERY TODAY TO TRUST SOMEONE!!

    POET ISN'T AFRAID OF DYING FOR HE KNOWS THAT TODAY A MERE PROCESS OF THINKING MAY KILL ONE!!

    POET SAYS VERY OPENLY THAT HE WOULD NOT DIE OF HIS OWN BUT WOULD BE KILLED IN THIS WORLD WHERE EVERY FAIR THING SEEMS UNFAIR!!
    AS IN "MACBETH" EVERYTHING GOOD AND FAIR SEEMS FOUL TO THE WITCHES AND EVERYTHING THAT IS EVIL AND FOUL SEEMS FAIR AND GOOD!
    SIMILAR IS THE CONDITION TODAY!

    POET SAYS I WILL DIE IN THE SAME PLACE WHERE ALL OTHER MORTAL BEINGS HAVE TO DIE ONE DAY!!
    THEIR DEATH WILL COME CERTAINLY BE IT TOMORROW OR LATER!!
    THEY WILL DIE THE SAME DEATH OF DECEPTION AND BETRAYAL!!

    IN THE END POET SAYS THE MEMORIES AND IMAGE OF A PERSON MAKES ONE REMEMBER THE DEAD!!
    WHICH IS MOST TRUE
    THIS POEM IS VERY TRUE AND AN EYEOPENER AND MAKES US REMEBER HOW TO CARVE OUR PATH IN LIFE WHICH IS FILLED WITH PERILS THAT ARE SURE TO KILL US!!
    ITS A POEM MARVELLOUSLY DONE!!

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  12. पढ़ते समय एक हाहाकार की तरह सुनाई पड़ती है पूरी कविता....बार बार कबीर याद आते रहे...हम न मरब मरिहैं संसारा हमकू मिला जियावन हारा....
    आपको लगातार पढ़ता हूँ...प्यारे...दगाबाज....तेरी किताब कहीं राह में रह गई....तेरी पत्रिका कहीं पत्र बन कर भटक गई....अच्छा है।

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  13. yaadvendra pandeyMay 7, 2009 at 7:37 PM

    priy shirish ji,

    apki kavita baar baar kehti to mrityu ke bare me hai,par dar asl
    ye kavita hai jiwan ki uddam lalsa ki...na na karte pyar tumhi se kar
    baithe...mujhe isme kahi se bhi mrityu ka khauf choota hua nahi dikha
    balki...mujhe mere priy angrej upanyaskar NICHOLAS EVANS(HORSE
    WHISPERER,THE LOOP aur SMOKE JUMPER jaise khub prasiddh aur anoothe
    upanyason ke lekhak)ka smaran karati hai.inka SMOKE JUMPER aise
    janbaaj naujawanon ki marmik aur jijivisha se bhari kahani hai jo dhu
    dhu kar jalte jangalon ke beech aasman se seedhe mrityu ke muh me
    jiwan bachane ke liye utarne ka jajba rakhte hain...hamare pyare
    shirish bhai aise hi smoke jumper hain aur ham inko salam karte
    hain...
    samar ke hirawal daston ki tarah ve hame un tamam nirmam aur
    vibhats par vartman ki vastavik sthitiyon se aagah karaate chalte
    hain...chaku,goli,julm,dhamake jaise sthul prateekon ki baat karte hue
    ve hame le jate hain jiwan,pyar,kalpana,smriti,swapn,vishwas aur
    kavita ke raste hastakshep ke vichaar tak...aur dost ke vishwasghat ki
    baat karte hue ham jinda kaumon ko virodh aur a-sahmatiyon ki ahamiyat
    se ru- b- ru karate hain.shirish ji jab maut ki baat karte hain to
    saamuhik nar sanghar ki baat nahi karte,vaiyaktik mrityu to hoti rahti
    hai...ye samaj jiwan aur dhadhas ke beech apni sahaj gati aur laya
    banaye rakhta hai...koi gam nahi yadi maar bhi de koi to...dikhayi
    dega jiwan lahlahata hua hi...sunai degi dhadhas bandhati hui awaj
    hi...
    ham sab saathi aapki chetavani ko darj karte hain aur saath saath
    samuh gaan gaate hue aage badhne ke liye aa rahe hain aapke saath...ap
    dekhen kisme hai kitna dam mitra !

    --------------yaadvendra pandey

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  14. adbhut kavita h....

    kbhi mauka mila to aapki kavitao ka visleashan karunga...

    nishchay hi aapme umda kavitva h...
    bahut chust shilp h is kavita ka...
    banaras wali kavita ke mukable iska shilp bahu badhitya h...

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