Saturday, May 30, 2009

मारिओ बेनेदेती की कविताएं - दूसरी तथा समापन किस्त

पिछली पोस्ट से जारी...
कुछ और हाइकू

1.
मैं चाहता हूं
कि हर साल शुरू हो
तो शुरू हो शनिवार से

2.
ऐसा कोई आह्लाद नहीं
जो ज़्यादा आह्लादकारी को
आह्लाद के पूर्वाभास से

3.
कोई नहीं ऐसा जो चुहलबाज़ी करे
सत्य से
जो ऐसा करते हैं, झूट से ही करते हैं

4.
बंदी स्वप्न में देखता हूं
हरदम ऐसी चीज़
जो देखने में हो हू-ब-हू चाबी जैसी
***

भौंचक और क्रुद्ध *

हम हैं यहां
भौंचक्के
और क्रुद्ध
हालांकि ये मौत
एक ऐसी विडम्बना है
जिसका बना हुआ था बरसों से पूर्वाभास

तुम हमारी क्लेशपूर्ण अशांत चेतना हो
वे कहते हैं कि तुम्हें अग्नि के सुपुर्द कर दिया गया
बिलकुल उसी तरह जैसे किया करते हैं
भद्रजनों के साथ

अच्छी लगी ये ख़बर .....

एक प्रचंड कोमलता थी जो
जो कूट कूट कर भरी हुई थी
तुम्हारे अंदर

वे कहते हैं उन्होंने जलाकर भस्म कर दीं
तुम्हारी योग्यताएं
सिवा एक अदद अंगुली के

इतना ही पर्याप्त है हमें दिखाने को राह
ताकि हम कर सकें भर्त्सना
दुष्टात्मा की और उसके वीभत्स कलंकों की

और रख सकें
रख सकें एक बार अंगुली
बंदूक के घोड़े पर
फिर से...
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* ये कविता बेनेदेती ने 1967 में चे ग्वेवारा की हत्या किये जाने की ख़बर सुनकर लिखी थी...बेनेदेती का लैटिन अमरीका में सक्रिय अनेक सशस्त्र संगठनों से निकट का सम्बन्ध रहा और उन्होंने इस पर कभी पर्दा भी नहीं डाला !
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Friday, May 29, 2009

मारिओ बेनेदेती की कविताएं - पहली किस्त


अंग्रेज़ी साहित्यिक दुनिया में भले ही मारिओ बेनेदेती को उतना न जाना जाता हो पर लैटिन अमरीका के साहित्यिक जगत में उन्हें सदी के खूब बड़े क़द के कहानीकार, कवि, पत्रकार और राजनीतिक रूप में बेहद मुखर बुद्धिजीवी के तौर पर जाना जाता है। 1973 से 1985 के बीच जब उरुग्वे में सैनिक तानाशाही थी, तब बेनेदेती को प्रखर राजनीतिक विचारों के कारण अपना देश छोड़कर कभी अर्जेंटीना तो कभी पेरू, क्यूबा और स्पेन में शरण लेनी पड़ी। उन्हें स्पेनिश भाषाभाषी अनेक साहित्यिक सम्मान मिले। लैटिन अमरीका के अनेक संगीतकारों और फिल्मकारों ने उनकी कविताओं का प्रयोग अपने कार्यक्रमों में किया। 2006 में अनेक बड़े लैटिन अमरीकी साहित्यकारों के साथ मिलकर उन्होंने प्यूर्तो रिको की आज़ादी के लिए अभियान चलाया।

मारिओ बेनेदेती
उरुग्वे
(14/09/1920 से 17/05/2009)


हाइकू

1
मैं चाहता हूं
देखूं सब कुछ दूर से खड़ा होकर
पर तुम बने रहो मेरे साथ साथ

2
कुछ भी हो
मौत इस बात का सबूत है
कि था यहां भी जीवन

3
केवल चमगादड़ है
जो समझता है दुनिया
पर सीधी नहीं उल्टी तरफ़ से

4
तर्क के अंदर
वही शंकाएं प्रवेश कर पाती हैं
जिनके साथ लगी होती हैं चाबियां

5
जब मैं इकट्ठा कर पाया
एक एक कर अपनी तमाम अनिद्राएं
तभी घिर आयी मुझ पर नींद
***
खुद को बचा बचा कर मत चलो

खुद को बचा बचा कर मत चलो
सड़क के किनारे चलते हुए
ठिठको नहीं
मत जमाओ बर्फ़ की तरह अपनी खुशी को
अनिच्छा के साथ मत बढ़ाओ प्रेम के क़दम

खुद को बचा बचा कर मत चलो अब
या कभी भी

खुद को बचा बचा कर मत चलो
चुप्पी से ना भर लो खुद को अन्दर तक
ना ही दुनिया को बन जाने दो
सन्नाटे से भरी महज महफ़ूज़ जगह
अपनी पलकें मुंदने ना दो भारी होकर
जैसे आन पड़ी हो कोई मुसीबत
बोलो मत बग़ैर होठों को हरक़त में लाए
और सोना नहीं हरगिज़ उनींदेपन के बग़ैर

खुद के बारे में सोचना तो रक्त की कल्पना किए बग़ैर नहीं
वैसे ही समय देखे बिना
मत रख देना खुद को फैसले के तराजू पर ...

पर तमाम कोशिशें कर लेने के बाद भी
ना मुमक़िन हो पाए ऐसा
और अपनी खुशी को जमाना पड़ जाए बर्फ़ की मानिंद
अनिच्छा के साथ ही बढ़ाने पड़ जाएं प्रेम के क़दम
और चलना पड़े खुद को बचा बचा कर ही
चुप्पी भर लेनी पड़े दूर दूर तक अन्दर
दुनिया बनानी पड़ जाए
सन्नाटे से भरी महज एक महफ़ूज़ जगह
पलकों को मूंदना पड़ जाए मुसीबत की मानिंद भारी पड़कर
बोलना पड़े होठों को हरक़त में लाए बग़ैर
सोना पड़े उनींदेपन के बिना ही
रक्त की कल्पना किए बिना ही सोचना पड़ जाए खुद के बारे में
समय देखे बग़ैर
रखना पड़ जाए खुद को फैसले के तराजू पर
सड़क के किनारे चलते हुए
पड़ जाए एकदम से ठिठकना
और तुम चलने भी लगो खुद को बचा बचा कर

हो जाए जब ऐसी हालत
तब
बेहतर होगा छोड़ ही मेरा साथ
***
मेरे द्वारा अनूदित कुछ कविताएं अनुनाद के अलावा कबाड़ख़ाना पर यहाँ और यहाँ पढ़ें !
***

Thursday, May 28, 2009

केशव तिवारी की कवितायें


आजकल नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल (नाथ और अग्रवाल इसलिए कि अब कुछ लोग केदार का तात्पर्य सिर्फ़ केदारनाथ सिंह लगाते हैं) की कोई परम्परा है और उसके अपने कवि हैं, यह मानने का प्रचलन आश्चर्यजनक ढंग से कम होता जा रहा है! इस परिदृश्य में केशव तिवारी जैसे कवि इस परम्परा का बोध कराते हैं। अनुनाद पर उनका स्वागत है।
कवि का वक्तव्य

मेरा यह मानना रहा है कि आज तक विश्व की कोई भी महान कविता अपनी परम्पराओं से जुडकर और उसकी जडता से मुक्त होकर ही महान रही है। लोक मेरे लिए जीवन और कविता में एक सबसे बडी प्रेरणा रहा है। जहॉ अभी श्रम के महत्व को वह स्थान नहीं मिला है, जिसका वह हकदार है। लोक मेरे लिए सर्वहारा का ही पर्याय है वे तमाम लोग जो शोषित और पीड़ित है। धरती के किसी भी हिस्से में रह रहे है, मेरे ही लोक का हिस्सा है। कविता लिखना मेरे लिए उनकी इसी लडाई में एक छोटी से हिस्सेदारी के सिवा और ज्यादा कुछ भी नहीं है।

तो काहे का मैं
किसी बेइमान की आँखों में
न खटकूं तो काहे का मैं
मित्रों की गाढे में याद न आंऊ
तो काहे का मैं
कोई मोहब्बत से देखे और मैं उसके
सीधे सीने में न उतर जाऊं
तो काहे का मैं
अगर ये सब कविता मैं तुम्हे
सिर्फ़ सुनाने के लिए सुनाऊं
तो फिर काहे का मैं
***

मइकू का नाम

घड़े बिकने आये है बाजार
अक्षय तृतीया है आज
आज के ही दिन नेवासे पाते है
नये घड़े
हर ओर है अकाल का जोर
पानी के लिए हो रही है हत्यायें
आकाश की ओर मुख बाये
बैठे है घड़े, पानी और पानी
इस बार घड़ा बनाते जाने क्या क्या
सोचे होगें मइकू
इनके बिकने के बारे में या फिर
सूखे रह जाने के बारे में
वे लोग जिनके उतान होने के लिए
गगरी भर दाना काफी है
उनके घर खाली गगरी ढनगेंगी
यहाँ-वहाँ
मइकू ये सब जानते है फिर भी
गगरी गढते वक्त एक सूत
रेंच न रह जाये कि
नाम धरे लोग
नहीं है दाना पानी पर
मइकू का नाम तो है
मौजे भर में
***

कुमाऊँ
मै बहुत दूर से थका हरा आया हूँ
मुझे प्रश्रय दो कुमाऊँ
ये तुम्हारे ऊंचे पर्वत जिन पर जमा ही रहता है।
बादलो का डेरा
कभी दिखते कभी विलुप्त होते
ये तिलिस्मी झरने तुम्हारे सप्तताल
तुम इनके साथ कितने भव्य लगते हो कुमाऊँ
शाम को घास का गट्ठर सर पर रखे
टेढे-मेढे रास्ते से घर लौटती
घसियारी गीत गाती औरतें
रजूला की प्रेम कहानियों में डूबा
हुडुक की धुन पर थिरकता
वह हुडकिया नौजवान
उस बच्चे की फटी झोली से उठती
हींग की तेज महक
तुम उसकी महक में बसे हो कुमाऊं
यह मौसम सेबों के सुर्ख होने का है।
आडुओं के मिठास उतरने का है
और तुम्हारी हवाओं में कपूर की
तरह घुल जाने का है
उनके भी घर लौटने का मौसम है।
जिन्हे घर लौटते देखकर मीलों दूर से
पहचान जाती है तुम्हारी चोटियाँ !
***

बेतवा तट एक रात

ठंड से ठिठुरती चाँदनी रात
कभी बादलों की रजाई ओढता
कभी हटाता गहरी नींद में
कुनमुनाता चाँद
आसमान को बाँह में लेने को आतुर
पूरे विस्तार से बाहें उठाये पेड
कभी पहाडों से लिपटती
कभी धकियाती बेतवा
हवा के साथ-साथ बहता उन्माद
इस समय यहाँ पर तो
उन चित्रकारों को होना चाहिये
बासी पड रहे है जिनके रंग।
***

अवधी
यह पहली बार मेरी ज़ुबान पर
आई थी माई के दूध की तरह
इसके ही इर्द-गिर्द मडराती है मेरी संवेदना
यह वह बोली है जिसमें
सबसे पहले मैने किसी से कहा
कि मै तुझे प्यार करता हूँ
इसके प्राण बसते है
बिरहा, कजरी और नकटा में
आल्हा और चैती मे तो
सुनते ही बनता है इसका
ओज और ठसक
जायसी, तुलसी, तिरलोचन की
बानी है यह
यह उनकी है जिनका
सुख-दु:ख सना है इसमें
धधक रही है जिनकी छाती
कुम्हार के आंवा की तरह
जिसमे पक रहे है
यहाँ की माटी के कच्चे बर्तन
कल के लिये।
***

खैराडा जंक्शन का गेटमैन

आस-पास फूले पलाश के बीच
ख़ाकी धूसर वर्दी पहने
सर पर लाल पगडी बाँधे
जैसे कोई पलाश का पेड़ ही
चलकर आ गया है
टेलीफ़ोन की घंटी पर दौड रहा है
लीवर गिरा रहा है
प्रतीक्षारत वाहन चालकों से उलझ रहा है
बायें, हाथ में लाल, हरी झंडी थामें
दाहिने हाथ को हिला-हिलाकर
गुजरती कानपुर पैसेन्जर से
बच्चो का अभिवादन स्वीकार कर रहा है
सब कुछ ठीक-ठाक गुजर जाने पर
पटरी पर बैठकर
सूंट रहा है बीड़ी यह
बूढा ठिगना
लाल पगडी वाला पलाश
***

घड़ा

अभी कुछ देर पहले ही
वह कचरे और
कंकड से सना मिट्टी का लोंदा था
पहली बार मिला है इसे
गति और कौशल का संयोग
उखडती साँसों और
बीडी के कसैले धुंये के बीच
आकार पा रहा है ये
धरती के ही रंग का यह
जब आंवा से पक कर निकलेगा
तब भोर के सूरज से कहेगा
देखो मेरा रंग तुम्हारे रंग से
कम चटख नहीं है
मुझे बनाने वाला तुम्हे बनाने वाले से
ज्यादा हुनरमंद है
जब पहुँचेगा ये बाजार तो
टनक-टनक कर देगा
अपने खरे होने का सबूत
ये उनकी तरफ आँख भी नहीं करेगा
जिन्हे नहीं है इसकी जरूरत
और जिन्हे होगी इसकी जरूरत
उनके लिए गला डुबाकर भी
निकाल लायेगा पानी।
***

दीवट का दिया

मैं तुम्हारी कोठरी के दीवट पर रखा दिया हूँ
तुम मेरे पास आओ
लटियाये बालों को सुलझाओ
पाटी पारो
माथे पर लगाओ
लाल रंग वाली बडी टिकुली
माँग भर सेन्दुर,
एडी भर महावर रचाओ
और मै तुम्हारी मद्धिम रोशनी में झिलमिलाऊं
जैसे छरहर नीम की छॉह में
झिलमिलाता है चाँद।
***

भरथरी गायक

जाने कहाँ- कहाँ से भटकते-भटकते
आ जाते हैं ये भरथरी गायक
काँधे पर अघारी
हाथ में चिकारा थामें
हमारे अच्छे दिनों की तरह ही ये
देर तक टिकते नहीं
पर जितनी देर भी रूकते हैं
झाँक जाते हैं
आत्मा की गहराइयों तक
घुमन्तू-फिरन्तू ये
जब टेरते है चिकारे पर
रानी पिंगला का दुख
सब काम छोड
दीवारों की ओट से
चिपक जाती हैं स्त्रियाँ
यही वही समय होता है
जब आप सुन सकते है
समूची सृष्टि का विलाप
***

गवनहार आजी

पूरे बारह गाँव में
आजी जैसे गवनहार नहीं थी
माँ का भी नाम एक दो गाँव तक था
बड़ी बूढ़ी औरतें कहती थीं कि
मेंझली को ही अपना गला
सौंपकर गई थी आजी
पर एक फर्क था
माँ और आजी के बीच
आजी के जो गीतों में था
माँ के जो गीतों में था
वह उनके जीवन से धीरे-धीरे
छिटक रहा था
उस सबके लिये जीवन भर
मोह बना रहा उनमें
जांत नहीं रह गये थे पर
जतसर में तुंरत पिसे
गेहूं की महक बनी रही
एक भी रंगरेज नहीं बचे थे
पर `` केसर रंग धोती रंगाव मोरे राजा``
का आग्रह बना रहा
कुएं कूडे-दानों में तब्दील हो गये थे
पर सोने की गगरी और रेशम की डोरी
के बिना एक भी सोहर पूरा नहीं हुआ
बीता-बीता जमीन बंट चुकी थी
भाइयों-भाइयों के रिश्तों में खटास आ गई थी
फिर भी जेठ से अपनी झुलनी के लिए
जमीन बेच देने की टेक नहीं गई
माँ के गीतो को सुनकर लगता था
जैसे कोई तेजी से सरकती गीली रस्सी को
भीगे हाथों से पकडने की कोशिश कर रहा है।
***

वे

वे जो लम्बी यात्राओं से
थककर चूर है उनसे कहो
कि सो जायें और सपने देखें
वे जो अभी-अभी
निकलने का मंसूबा ही
बाँध रहे है
उनसे कहो कि तुरंत निकल पडे
वे जो बंजर भूमि को
उपजाऊ बना रहे है
उनसे कहो कि
अपनी खुरदरी हथेलियॉ
छिपाये नहीं
इनसे ख़ूबसूरत इस दुनिया में
कुछ नहीं है
वे जो कारख़ानों में
जुटे है
उनसे कहो कि
निराश न हों
इस दुनिया मे जो भी
अच्छा बचा है
सब उनकी बदौलत है
वे जो दुनिया में कहीं भी
आन्दोलनरत है
और अपने हक़ की लडाई
लड रहे है
उनसे कहो कि
फंदे सिर्फ उनका ही गला नहीं पहचानते
और वे जो कवि है
और कविता लिख रहे है
उनसे इसी दम कहो कि
कविता में ताप बनाये रखें
बरसों की जमी बर्फ़
इसी से पिघलेगी।
***

Wednesday, May 27, 2009

अनुनाद के मुद्रित संस्करण से......


हरीशचंद्र पाण्डे की कविताएँ

अनुनाद के पन्ने पर टीप - हरीशचंद्र पाण्डे हिंदी कविता के एक सीधे-सादे और सच्चे नागरिक हैं, इतने कि उनकी सरलता भी एक किंवदंती बन चली है, जिसे लोग दूसरे लोगों के बरअक्स गुज़रे ज़माने की तरह याद करते हैं. बक़ौल मंगलेश डबराल 'हरीशचंद्र पाण्डे की कविताओं के पीछे यह मानवीय और मासूम-सा विश्वास हमें सक्रिय दिखता है कि हर रचना संसार कि बुराई, गंदगी, अश्लीलता, क्रूरता और विनाश के विरुद्ध के सतत कार्रवाई है.' अब तक उनके तीन कविता संकलन छपे हैं, जिनमें एक शुरूआती लेकिन महत्त्वपूर्ण कविता पुस्तिका भी शामिल है।

उत्तराखंड में जन्मे हरीशचंद्र पाण्डे आजीविका की तलाश में इलाहाबाद पहुँचे और फिर वहीं बस गए. उन्होंने हमारे अनुरोध का मान रखते हुए कविताएँ उपलब्ध करायीं, इसके लिए आभार


एक सिरफिरे बूढ़े का बयान

उसने कहा-
जाऊँगा
इस उम्र में भी जाऊँगा सिनेमा
सीटी बजाऊँगा गानों पर उछालूँगा पैसा
'बिग बाज़ार' जाऊँगा माउन्ट आबू जाऊँगा
नैनीताल जाऊँगा
जब तक सामर्थ्य है
देखूँगा दुनिया की सारी चहल-पहल

इस उम्र में जब ज़्यादा ही भजने लगता हैं लोग ईश्वर को
बार-बार जाते हैं मन्दिर मस्जिद गिरजा
जाऊँगा...मैं जाऊँगा...ज़रूर जाऊँगा
पूजा अर्चना के लिए नहीं
जाऊँगा इसलिए कि देखूँगा
कैसे बनाए गए हैं ये गर्भगृह
कैसे ढले हैं कंगूरे, मीनारें और कलश
और ये मकबरें

परलोक जाने के पहले ज़रूर देखूँगा एक बार
उनकी भय बनावटें
वहाँ कहाँ दिखेंगे
मनुष्य के श्रम से बने
ऐसे स्थापत्य...
***

वत्सलता

आज पिन्हाई नहीं गाय
बहुतेरी कोशिश करता रहा ग्वाला
बछड़ा जो रोज़ आता था अपनी माँ के पीछे-पीछे
उससे लग-लग अलग होकर
नहीं रहा आज
देर तक कोशिश जारी रही ग्वाले की
कि थनों में उतर आये दूध
पर नहीं...
किसी की भी हों
आँखें
अदृश्यता को बखूबी जानती हैं

देने से नहीं
दूध न देने से पता चला

वत्सलता और छाती का रिश्ता!
***

Monday, May 25, 2009

ट्राम में एक याद - ज्ञानेंद्रपति

यह विख्यात कविता ज्ञानेंद्रपति की शुरूआती कविताओं में है और पहली बार 1981 में छपे उनके संकलन "शब्द लिखने के लिए ही कागज़ बना है" में संकलित हुई, जो अब अप्राप्य है। यहाँ इसे "कवि ने कहा" नामक प्रतिनिधि संकलन से लिया जा रहा है। कवि ने अनुनाद को उनकी कविताएँ लगाने की स्नेहिल अनुमति दी है, इसके लिए अनुनाद के सभी सहलेखकों के साथ मैं उनका आभारी हूँ। इस कविता के बाद हम लगातार कवि की कविताएँ अनुनाद पर देते रहेंगे, जिनमें कई समयावधियों का प्रतिनिधित्व होगा। यहां प्रस्तुत कविता अपनी निरन्तर रागात्मकता और विकलता की वजह से मुझे बहुत प्रिय है, इसलिए अग्रज ज्ञानेंद्रपति के अनुनाद पर स्वागत के रूप में पहली कविता यही..... जो आप सबको भी निश्चित ही बहुत पसन्द आयेगी.....सोचिए अब तो ट्राम भी एक याद है !


ट्राम में एक याद

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
कुछ-कुछ खुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?
अब भी कविता लिखती हो?

तुम्हें मेरी याद न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आंखों के आगे झूली हो
तुम्हारी क़द-काठी की एक
नन्हीं-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
आंखों में उतरती है किताब की आग?
नाटक में अब भी लेती हो भाग?
छूटे नहीं है लाइब्रेरी के चक्कर?
मुझ-से घुमन्तू कवि से होती है कभी टक्कर?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत बहुत मित्र?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?
अब भी जिससे करती हो प्रेम, उसे दाढ़ी रखाती हो?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं गेंद-सी उल्लास से भरी हो?
उतनी ही हरी हो?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हंसी कम कम है
विराट धक्-धक् में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ाली है
वहां उगी है घास वहां चुई है ओस वहां किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

फिर आया हूं इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ देखता हूं
आदमियों को किताबों को निरखता लेखता हूं
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग-बिरंगे लोग
रोग-शोक हंसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूं अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूं तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है

चेतना पारीक, कहां हो कैसी हो?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो !
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कवि ने कहा
किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज
नई दिल्ली- 02
मूल्य - 70/-
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Saturday, May 23, 2009

अनुनाद के मुद्रित संस्करण से ......


अशोक पांडे की कविताएँ

अनुनाद के पन्ने पर टीप - अशोक पांडे अन्य भाषाओँ से हिंदी में होने वाले अनुवाद की दुनिया का एक सुपरिचित नाम है और अब यही एक तरह से उनकी मूल पहचान भी है। उनके कुछ यात्रा-वृत्तांत भी काफी सराहे गए। आज के हिंदी परिदृश्य में कम लोग जानते हैं कि अशोक एक विलक्षण कवि भी हैं और अनुवाद के काम को मिशन के तौर पर अंजाम देने के फलस्वरूप उन्होंने अपने कविरूप की अनदेखी की है। 92 में उनका एक कविता संकलन `देखता हूँ सपने´ नाम से छपा और पहचाना गया। युवा पीढ़ी में बिना किसी वैचारिक तैयारी के कवि हो जाने की आकांक्षा जब कई-कई तरह से सामने आ रही है, तब अशोक का यह निर्मोह एक तरह का साहित्यमूल्य बन जाता है।

अनुनाद अशोक पांडे की इन कविताओं को छापकर ख़ुश है और यह कामना करता है कि उनकी 92 के बाद की कविताएँ भी कभी संकलन के रूप में आएँ। हो सका तो अनुनाद ख़ुद इस अपनी इस कामना को पूरा करेगा।

काना बिलौटा

भीड़ भरी स्मृति में
घात लगाए बैठा है गहरे कहीं
वह काना बिलौटा
गई गर्मियों की एक रात
जो घर के बग़ीचे में मर गया

कुरूप और अशक्त
दुत्कारें ही खाता घर भर की
चप्पलें पड़तीं पीठ पर
फिर भी दुबका रहता दुछत्ती के कबाड़ में अदृश्य प्रेत
शान से पूँछ उठाए घूमती बिल्लियों को देखा ही करता
कानी आँख से
फिर भी जीवन को ढोता

रसोई से उठती गंध बेचैन करती हो
भूख का कोई क्या करे, चोरी करता - मार खाता
पलटकर देखता सूनी कातरता से
बाँई आँख सदा रहती घायल
लड़ाइयों में हार जाता होगा छोटी बिल्लियों से भी
बचा ही लेता ईश्वर का दिया शरीर ज्यों-त्यों
फिर भी जीवन से लड़ता
मुहल्ले की सरहद पर कटहल का
वह घना पुराना पेड़ ही दोस्त उसका एकमात्र
पड़ा रहता उसी की छाँह में
बिल्लियाँ तो पसरी रहतीं घरों के भीतर
मखमली आराम में
-दुखी तो होता होगा
सुन्दर अपने भाई-बहनों को देख
रातों को रोता, देखा तो करता होगा
मजबूत पंजों
और वीरान रसोइयों के ख़्वाब
आँख वह बहती हुई लगातार
दुखती हुई लगातार

आदमी होता तो ज़हर खाकर मर ही जाता
इतनी गहरी टीस जैसा जीवन
कितना कुरूप
कितना अशक्त
पर लड़ता जीवन से अंतिम अत्याचार तक
नायक मेरी इस कविता का
वह भी एक सितारा
मेरी स्मृति के ठंडे सलेटी आसमान पर
चमकता !
****
रिटायर्ड लोगों की कॉलोनी से कविताएँ

रिक्शा रुका उस घर के सामने
सूटकेस उतारे गए
बच्चे उतरे अपने माँ-बाप के साथ
मैं उसी घर की तरफ़ आ रहा था
रोज़ ही आता-जाता हूँ
उस घर के सामने से
जिसके बाहर थोड़ी हरियाली है
वृद्ध एक कोई दम्पत्ति उसे आबाद किए हैं
चोर घुस गया था एक दफ़े बाथरूम में
पड़ोसियों ने मदद की थी
-रात थी क़रीब साढ़े आठ-नौ
कम वोल्टेज़ की पीली रोशनी में सुनाई दिए
दो अतिउल्लसित बूढ़े स्वर
मैं मई की गर्मी में भी सिगरेट सुलगाए था अनमना
-फिर सुनाई दी बच्चे की किलकारियाँ
एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज़
अचानक मिले प्रेम की अधिकता से उत्पन्न

एक बार की चोर निगाह मैंने उस घर के भीतर
फिर झटपट फेंकी सिगरेट
उसे मुँह में लगाए मुमकिन न था मुस्कुरा पाना
-मैं भी शामिल हुआ
थोड़ी देर
सूने उस घर की ख़ुशी में !
***
पैतृक गाँव में पूजा है
जाहिर है पिता ही जायेंगे

परिचित दुर्गन्ध की तरह
पहचाना जा सकता है माँ की आवाज़ का असंतोष
गाँव की खटपट से हमें क्या मतलब -
वह अवश भुनभुनाती है

पिता जा चुके हैं हमारे जागने से पहले
मैं इस लम्बी यात्रा के बारे में सोचता हूँ
जिसे वे अकेले कर रहे होंगे
किसी गाड़ी की किसी सीट पर बैठे विचारमग्न
फिर सोचता हूँ उनकी उम्र के बारे में और डर जाता हूँ
पर मेरे पास और बहुत -सी चीज़ें हैं
व्यस्त हो जाने के लिए

एक शाम घर में घुसते ही वे दिखाई देते हैं
वैसे ही - बिस्तर पर अधलेटे
एक साथ अख़बार और टी.वी. पर गड़ाए
अपनी चश्मेदार आँखें - जैसे
कहीं गए ही न हों

तीन दिन तक जाने-अनजाने मैं उनकी प्रतीक्षा करता हूँ
कि पूछूँगा उनसे गाँव के बारे में - पर ऐसा होता नहीं
पिता ख़ुद कुछ नहीं कहते
वे खोए रहते हैं अपनी व्यक्तिगत स्मृतियों में
हम बच्चों का उनमें कोई दख़ल नहीं
वे बहती हैं उनकी शिराओं में
जैसे मेरे गाँव में बहती है गगास* !
***
चहारदीवारी तक़रीबन हर घर के बाहर है
लोहे का गेट भी - कुत्ता भी, बच्चों जैसा पला हुआ

भीतर एक कमरा पर्याप्त होता है दो बूढ़ों के वास्ते
बाक़ी कमरे तो तभी बजते हैं जब
नाती-पोते दौड़ लगाते हैं -

चारपाई पर बैठे
थाली से उठाते खाना धीरे-धीरे
टी.वी. देखते हुए
दो जोड़ी कान लगातार लगे रहते हैं टेलीफ़ोन से -
जो बजता ही नहीं

रात जब दूर स्टेशन से सुनाई देती है रेल की सीटी
तो धर फुसफुसा कर पूछता है बूढे कानों से -
`` बेटे ज़्यादा वफ़ादार होते हैं या पालते कुत्ते?´´
***
(बतर्ज़ वीरेन डंगवाल)

मैं मध्य वर्ग का अभाव हूँ
बाहर से भरे-पूरे दीखने वाले घर की आत्मा में खटकता हर पल
नितांत गोपन अभाव - मैं मध्य वर्ग का दुख हूँ
जो शादी जैसे मौकों पर भी
पोले पलस्तर कर तरह झरता रहा लगातार
मैं मध्य वर्ग का क्रोध हूँ जो भरी हुई
गाड़ी में बद्तमीज़ आवाजों का प्रतिरोध न कर सकते हुए
दफ़्तरों की देहरियों पर पसरा रहा
गिड़गिड़ाहट का रूप धरे मैं
मध्य वर्ग का लालच हूँ
महफ़िल में औरों से एक पैग ज़्यादा खींच लेने की
मक्कार इच्छा
और मुफ़्त की सिगरेट पी लेने के क्षणिक रोमांच
की उच्चतम सीमाओं को छूता मैं
मध्य वर्ग का अच्छापन हूँ
मित्र-हितैषियों को
अटक-बेअटक अपनी बचत उधार देता हुआ
चुटकुलों पर ठठाकर हँसने वाला अच्छापन
मैं मध्य वर्ग का हौसला हूँ
जो मौत से भी बुरे वक़्तों को पार कर आता है
बिना एक भी खरोंच के
ऐसा जानकार हौसला
जिसमें, सुना है युगों को पलट देने की ताब होती है !
---------------------------------------------------
* गगास - रानीखेत की तलहटी में बहती एक पहाड़ी नदी, जिसके क़रीब कवि का गाँव है।
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Friday, May 22, 2009

अनुनाद के मुद्रित संस्करण से......

राजेन्द्र कैड़ा की कविताएँ

अनुनाद के पन्ने पर टीप : राजेन्द्र बिना शीर्षक की कविताएँ लिखते हैं, जिनमें एक प्रबल भावावेग निरन्तर जारी रहता है। लगता है कि ये सभी कविताएँ एक किसी बहुत लम्बी लिखी जा रही कविता का हिस्सा हैं, जिसमें टूटने की हद तक खिंचता एक शानदार तनाव है। यह तनाव या बेचैनी नए कवियों में पहली बार इस स्तर पर देखी जा रही है। इन कविताओं में प्रेम है, प्रार्थना है, असफलता है, दुख है, धैर्य है, समय की पहचान है और सबसे लाजवाब चीज़ के रूप में मौजूद वह एक `समूचा पागलपन´ है, जिस पर कोई भी कवि गर्व कर सकता है।

राजेन्द्र के पास एक आत्मीय और `प्रसन्न´ भाषा है, जिसे उन्हें बहुत साधना नहीं पड़ता, जो ख़ुद -ब-ख़ुद कविता के शिल्प में अपनी राह तलाशती है। रोज़मर्रा के साधारण जीवन और मनोभावों को वे इस तरह आँकते हैं कि हमारे सामने दुनिया के मानी खुलते जाते हैं। उनकी कविताएँ एक आम हिन्दुस्तानी नौजवान के समक्ष लगातार खुलते जीवन और संसार की कविताएँ है। इनकी सबसे बड़ी सफलता ये है कि ये बहुत सादाबयानी से अपनी बात कहती हैं, जो दरअसल कविता लिखने का एक बेहद असाधारण ढंग है। अपने कवि रूप में भाषा, डिक्शन या किसी और स्तर पर भी वे किसी से प्रभावित नज़र नहीं आते, इसलिए भी उनकी कविताएँ प्रभावित करती हैं।

बड़े संतोष की बात है कि अत्यन्त सम्भावनाशील कवि होने के बावजूद राजेन्द्र अपनी कविताओं को महज छपाने के लिए लिखा गया नहीं मानते, जो उनकी विषयवस्तु से भी जाहिर होता है। उन्हें शमशेर की इस बात पर गहरा विश्वास है कि `कविता एक बार लिखी जाकर हमेशा के लिए प्रकाशित हो जाती है´। राजेन्द्र कैड़ा की कविताएँ पहली बार किसी साहित्यिक पत्रिका में छप रही हैं। हमें भरोसा है कि उनके इन शुरूआती लेकिन बेहद सधे हुए क़दमों का हिंदी कविता संसार में स्वागत होगा।

एक

तुम्हारा प्रेम प्रार्थना है
मेरे लिए
छोटी-सी पृथ्वी के सारे धैर्य जैसा

बहुत ज़रूरी काम से पहले बुदबुदाए जाने वाले
कुछ शब्दों जैसा
अपनी सारी असफलता
समूचे पागलपन
कुछ थके हुए शब्दों को करता हूँ

तुम्हारे नाम

मेरे मीठे प्यार की तरह
इन्हें भी चखो

सब कुछ खोने के बाद भी
तुम्हारा प्रेम
प्रार्थना है मेरे लिए !
***
दो

सपनों पर किसी का ज़ोर नहीं

न तुम्हारा
न मेरा
और न ही किसी और का

कुछ भी हो सकता है वहाँ
बर्फ़-सी ठंडी आग
या जलता हुआ पानी
यह भी हो सकता है कि
मैं डालूं अपनी कमीज़ की जेब में हाथ
और निकाल लूँ
हहराता समुद्र - पूरा का पूरा

मैं खोलूं मुट्ठी
और रख दूँ तुम्हारे सामने विराट हिमालय
अब देखो -
मैंने देखा है एक सपना -
मैं एक छोटा-सा बच्चा लटकाए हुए कंधे पर स्कूल बैग
अपने पिता की अंगुली थामे
भाग रहा हूँ स्कूल की घंटी के सहारे
भरी हुई क्लास में
सबसे आगे बैंच पर मैं
और तुम मेरी टीचर !

कितना अजीब-सा घूरती हुई तुम मुझे
और मैं झिझककर करता हुआ
आँखें नीची
मैंने देखा - ` दो और दो होते हुए पाँच ´
और खरगोश वाली कहानी में बंदर वाली कविता का स्वाद
तुम पढ़ा रही थीं - `ए´ फार `एप्पल´
और मुझे सुनाई दिया `प´ से `प्यार´
तुम फटकारती थीं छड़ी
सिहरता था मैं
खीझकर तुमने उमेठे मेरे कान
सपनों के ढेर सारे जादुई नीले फूलों के बीच ही
मैंने देखा - मेरा सपना,
खेलता हुआ मुझसे !
जब बड़े-बड़े अंडों से भरा मेरा परीक्षाफल देते हुए
तुमने कहा मुझसे -
` फेल हो गए हो तुम हज़ारवीं बार ´
और इतना कहते समय मैंने देखा -
तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखों मे दमकता हुआ
पृथ्वी भर प्यार
और मुझे महसूस हुआ
कि वहीं कहीं आसपास शहद का छत्ता गुनगुना रहा था
धीमे से
हज़ार-हज़ार फूलों के
सपनों का गीत !
***
तीन

बदलता है समय
पर ऐसे नहीं कि एकदम सब कुछ बदल जाए
और सब कुछ हो जाए ठीक
ऐसा नहीं होता
कि एकाएक शहर के सारे कौवे हो जाएँ सफ़ेद
या पंख लगे हाथी चुगें आपकी छत पर चावल
समय बदलता है उतना ही धीरे
जितना कि `क´ के बाद `ख´ लिखती है धीमे-से
कोई बुढ़िया
और तब बदल जाता है इतिहास
जब कोई कह दे तुलसी के साथ मीर और ग़ालिब भी
बदलता तो तब भी है बहुत कुछ
जब भूलकर सब कुछ एक लड़की ठीक अपने साथी की तरह
मारती है पहला कश
और बाहर फेंकते हुए धुँआ
मुस्काती है धीमे-से

धीमे से बदल जाते हैं सपने
रंग तक बदल जाता है पानी का
सपने
लगने लगते हैं थोड़े और पराये
और खारा पानी हो जाता है थोड़ा और खारा
फेंफड़ों और हवा के बीच अक्सर बदल जाता है संवाद
हालाँकि यह बदलाव उतना ही धीमे होता है
जितना धीमे औार चुपचाप बदलता है बालों का रंग
कोई पढ़ नहीं पाता इसे
लेकिन यह भी एक बदलाव है
जब रात की एकांत खुमारी में
या छुपकर घर के किसी कोने में एक शैतान लड़की
करती है एक शरारत भरा एस.एम.एस.
अपने युवा प्रेमी को
तब भी बदलता है बहुत कुछ
***
चार

इस दुख का क्या करूँ
सोचा होगा उसने
कोई तैयार नहीं इसका स्वाद चखने को
तब धीमे से उसने पकाया होगा फिर से इसे
और घोल दिया होगा इसमें गहरा प्यार
लो अब तो जानबूझ कर लेना ही पड़ेगा हर किसी को गहरा लगाव
कुछ अनन्त आँसू, सारी असफलता और उत्तेजना के गाढ़े घोल को लोगों ने कहा प्यार !
अब वो अपनी बिल्ली के तीन बच्चों के लिए हो
प्यारे पिता के लिए हो
तुम्हें अपना मान चुकी एक जोड़ी आँखों के लिए हो
या इस अनगढ़ पृथ्वी के लिए
तुम आख़िर में ख़ुद को फँसा ही पाओगे
अब तुम कुछ नहीं कर सकते
कभी न कभी किसी न किसी तरह यह प्यार
तुम्हें अपने पवित्रतम अंदाज़ में दुख ही देगा
तुम्हारे चमकीले सुखों से ज़्यादा अपना दमकता दुख !
***
पाँच
(चप्पलकथा ..... - यह शीर्षक जैसा कुछ - सम्पादक द्वारा)

कुछ बेफि़क्रे लोग ज़रूर करते हैं मेरा भरोसा
लेकिन बन-ठनकर जीने वाले तो तभी होते हैं पूरे
जब सूट के साथ सजे हों बूट भी
मेरा कोई भी ढंग नहीं करता किसी को भी पूरा
एक लापरवाह अधूरापन
चिपका ही रहता है मेरे साथ
इसलिए कई बड़ी चमकती इमारतों और संस्थानों में
प्रतिबंधित हूँ में
लेकिन बहुत पुरानी साथिन भी हूँ आदमी की - शायद
उसके आराम की आदिम खोज

औरत, आग और हथियार के बाद तो
मेरा ही नम्बर आएगा
चाहे तो कर सकते हैं आपके बड़े-बड़े इतिहासकारी
ये छोटी-सी खोज
पता नहीं क्यों लेकिन मुझे लगता है कि मुझे बनाया होगा
किसी औरत ने सबसे पहले
अपने खुरदुरे और आदिम अंदाज़ में
हो सकता है
मैं रही होऊँ प्रथम अनजाने प्रेम की आकिस्मक भेंट
किन्हीं खुरदुरे कृतज्ञ पैरों के लिए आराम की पहली इच्छा
मेरे भीतर तो अब भी चरमराता है
आदमी का पहला सफ़र
जब पहली बार मैंने उसके तलवों और धरती के बीच
एक अनोखा रिश्ता बनाया होगा
वो आदमी और पृथ्वी के बीच पहला अंतराल भी था
हालाँकि
घास और धूल के बहाने अब भी उसकी त्वचा
जब तब गपियाती रहती है पृथ्वी से
कभी-कभी आपका पिछड़ापन बचा लेता है आपको
कई झंझटों से
मसलन मुझे पहनकर नहीं जीते जाते युद्ध
वहाँ तो बड़े-बड़े और मज़बूत जूतों का राज है
और इतनी अपवित्र मैं
कि कोई नहीं ले जाता मंदिर या किसी पवित्र जगह
हाँ ! इस देश की एक पुरानी कहानी में
एक भाई ने ज़रूर बनाया था मुझे राजा
और दे दी थी राजगद्दी
चलो पर वो तो कहानी थी बस !

मेरी जीभ में आदमी का आदिम स्वाद है
थके हारे आदमी की शाम शामिल हो जाती है कभी- कभी
मेरी सिकुड़ी हुई साँस में
***

Wednesday, May 20, 2009

भाषा के इस भद्दे नाटक में - चंद्रकांत देवताले

हमारे लोकतंत्र के महापर्व के दौरान और उसके बाद के तामझाम को देखकर एवं शुभा की कविताओं की दूसरी किस्त (धीरेश जी को धन्यवाद सहित) में 'मुस्टंडा और बच्चा' पढ़ कर चन्द्रकान्त देवताले की यह कालजयी कविता बरबस याद आ गई.

भाषा के इस भद्दे नाटक में
तुम मुझसे पूछते हो
मैं तुमसे पूछता हूँ
सुबह हो जाने के बाद
क्या सचमुच सुबह हो गयी है

भय से चाकू ने
हादसे की नदी में डुबो दिया है
समय की तमाम ठोस घटनाओं को
ताप्ती का तट, सतपुड़ा की चट्टानें,
इतिहास के हाथी-घोड़े
कवितायेँ मुक्तिबोध की
ये सब बँधी हुई मुट्ठी के पास
क्या एक तिनका तक नहीं बनते

उत्साह की एक छोटी-सी मोमबत्ती से
चुँधिया गयी हैं कितनी तेजस्वी आँखें
कोई नहीं देख पाता फफूँद से ढँकी दिन की त्वचा
महिमा-मण्डित महाकाव्य के बीचोंबीच
दबा-चिपका चूहे का शव
कोई नहीं ढूँढ पाता...

वे भी जो अपने पसीने से
घुमाते हैं समय का पहिया
नहीं जानते अपनी ताक़त
क्योंकि उनके हाथ
नमक ओ' प्याज के टुकड़े को ढूँढते-ढूँढते
एक दिन काठ के हो जाते हैं

वहाँ से,उस ऊँची जगह से
वे कुछ कहते हैं
हम कुछ सुनते हैं
किंतु वह कौनसी भाषा है
जो दाँतों के काटे नहीं कटती
जो आँतों में पहुँचकर अटक जाती है
कभी एक बूँद खून टपकाता हुआ छोटा-सा चाकू
अभी एक बित्ता उजास दिखाती हुई छोटी सी मोमबत्ती
सौंपते हुए यह भाषा
इतिहास के आमाशय
और भूखंड के मस्तिष्क को
पंगु बना देना चाहती है

भाषा में गूँथी हुई विजय
भाषा के पोत में चमकते हुए सपने
भाषा में छपी हुई गाथाएँ
चखते हुए अपनी आँखों से इन्हें
क्या हम एक दिन अंधे हो जाएँगे

तुम सोचते हो
सब सोचना चाहते हैं
मैं भी सोचता हूँ

किस अग्नि-स्नान के बाद
उगेंगे-छपेंगे वे शब्द
जिनके पेट में छिपा होगा वह सत्य
जिसे देखते ही पहचान जाना होगा आसान
किंतु भाषा के इस भद्दे नाटक में घमासान
जिसे विदूषक ने आज दफ़ना दिया है कहीं
मंच के नीचे या नायकों के तख्तेताऊस के पास

देखो दोमुँहे शब्दों को
ध्यान से देखो
सुनो उनकी पीठ पीछे की फुसफुसाहट
मंच के तमाम तामझाम के बाद की
वह नेपथ्य की भूमिगत साज़िश...

इस साज़िश को मैं पहचानता हूँ
अपनी कविता की कपट-बेधी आँखों से
क्योंकि कपट से कपट के बीच धँसी हुई यह भाषा
सुख के पहाड़ की चोटी तक पहुँचाती है
हड्डियों को सपना दिखाती है तपती धूप में
एक क्षण बाद
गायब पहाड़
क्षत-विक्षत सपना
जस की तस् हड्डियाँ
यह भाषा चुपके-चुपके
आदमी का माँस खाती है

सत्य को जब चीथता है कोई शब्द
या कोई शब्द ध्वस्त हो
देता है हमें सत्य
तब टपकता है दूध कविता का
मज़बूत होती हैं घास की जड़ें

किंतु इसी वक्त यह मुझसे नहीं होगा
होगा तब भी
टेंटुआ मसकना इस झूठी भाषा का
सबसे होगा,

मुझे मक्खी को मकड़ी
या तिनके को तमंचा बनाना नहीं आता
अभी यहीं इसी वक़्त मुझसे ही
सब भेद जानना
उस गूँगे आदमी से वक़्त पूछने जैसा होगा
जिसके हाथ में अभी घड़ी तक नहीं है
किंतु मुद्दे की चीज़ है उसके संकेत
जिन तक पहुँचना अपने आप
उस झूठी घड़ी को तोड़ने जैसा होगा,
जिसने कभी हमें सही वक़्त नहीं बताया

यह उन तमाम झूठी ज़ुबानों को
काटने जैसा भी होगा
जिनकी छाया पड़ने से
भाषा का पानी
यानी
आदमी का सत्
कीचड़ हो चुका है.
****

Monday, May 18, 2009

भारतभूषण तिवारी की दो कवितायें

भारतभूषण तिवारी ने अपनी ये दो कवितायें अनुनाद के अनुरोध पर भेजी हैं और अपने तथा अपनी कविता के विषय में महज इतना कहा है - " मेरा औपचारिक परिचय इतना ही कि सॉफ्टवेयर में काम करता हूँ और पिछले चार-पाँच सालों से अमेरिका में हूँ और मॅनहटन न्यू यॉर्क सिटी का सबसे मशहूर (मगर क्षेत्रफल में सबसे छोटा) हिस्सा ही। मशहूर इतना कि कई बार मॅनहटन को ही न्यू यॉर्क सिटी मान लिया जाता है। यह अमेरिका का ही नहीं बल्कि समूचे विश्व का प्रमुख व्यापारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र है। "   भारत अनुनाद के सहलेखक भी हैं और मैं आज बतौर कवि यहाँ उनका स्वागत कर रहा हूँ।

मॅनहटन - 1 


मेरे बेडरूम की खिड़की से मॅनहटन नज़र आता है
अपनी गरिमा से बहती हुई हड़सन
जिसके दूसरे छोर पर खडा मॅनहटन
अपनी आकाश से गाली-गलौज करती अट्टालिकाओं के साथ मुझे
मुँह में सिगार दबाए,रेशमी स्लीपिंग रोब पहने
फिल्मी नायिका के उस रौबदार बाप जैसा लगता है
जो कहना चाहता है,
'मेरी बेटी का पीछा छोड़ने की तुम क्या कीमत लोगे?'
मैं अधिक समय तक उससे नजरें नहीं मिला सकता
घबराकर आँखें नीची कर लेता हूँ.

बेवकूफ़ होती हैँ खिड़कियाँ जो चाहती हैं दिखाना बाहर का दृश्य
जस का तस.

बचपन में मेरे घर की खिड़की से कारखाना दिखाई देता था
'रामायण-महाभारत' के राक्षसों-दानवों की तरह
डरावने स्टीम इंजन, काले धुँए के बादल छोड़ते हुए
चार-बारह,बारह-आठ का साइरन बजते ही
तेल-धूल-कोयले से सने कपड़ों में ड्यूटी पर जाते
या बाहर आते मज़दूर.

खिड़कियाँ क्यों होती हैं इतनी मुँहज़ोर
जो उस पार की चीजों को इस पार ले आना चाहती हैं?

हड़सन के पानी पर तैरता जहाज़ धुँआ बिल्कुल नहीं छोड़ता
बिल्कुल भी नहीं
मगर लगता है कई बार
जैसे जहाज़ कालिख उगलने वाले दैत्यरूपी इंजन में बदल जाएगा
और बेडरूम की खिड़की का काँच तोड़कर मेरे सिरहाने आ बैठेगा
और करेगा मुझसे वो सारे सवाल
जिनके जवाब ढूँढने के लिए
मुझे काले धुएँ से गुज़रकर मालगाड़ी के उस डिब्बे पर चढ़ना होगा
जिसमें भरा है टनों कोयला.

पता नहीं क्यों
मुझे कभी-कभी धोखेबाज़ लगती हैं खिड़कियाँ.

जब बादल छा जाते हैँ तो मॅनहटन उसमें ऐसे डूबता सा लगता है
जैसे किसी शरारती बच्चे ने तस्वीर की इमारतों की ऊपरी मंज़िलों पर
मटमैला रंग छलका दिया है
बादलों के धुंधलके में बड़ा कमज़ोर और बीमार सा लगता है मॅनहटन
मैं ज़रा नॉर्मल होने लगता हूँ
मगर जानता हूँ मैं
कि जब हवा राम-बुहारी बन बादलों को झाड़ देगी
और सूरज वैकेशन से लौट आएगा
तब मॅनहटन फ़िर ग़ुरूर से दमकने लगेगा मुझे नीचा दिखाने के लिए
एम्पायर-स्टेट की चोटी पर जलता बुझता बिजली का बल्ब
मुझे चिढ़ाने लगेगा
अपनी हज़ारों वाट रोशनी के साथ
मॅनहटन पूरी रफ़्तार से मेरी तरफ़ आता दिखाई देगा
और मैं घबराक्रर विन्डो-ब्लाइंड नीचे गिरा दूँगा.

सौंदर्य बोध निहायत ही घटिया होता है खिड़कियों का
और मेरे बेडरूम की खिड़की के पास तो सौंदर्य बोध है ही नहीं.
****

मॅनहटन - 2

सितम्बर की उमस भरी रात में
मॅनहटन परेशान सा लग रहा है
मैं जब भी रात में अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखता हूँ
तो मॅनहटन को जान-बूझकर नज़रअंदाज़ करता हूँ
हाँ, कभी-कभी कनखियों से निहार लिया करता हूँ
अगर हड़सन के साथ बातें करने में मग्न हुआ
तो वह भी मेरी तरफ़ ध्यान नहीं देता.

मगर आज दिन भर सूरज की किरणों का ताप झेलकर
थकी-हारी हड़सन

मॅनहटन की ओर पीठ करके लेटी हुई है
उस मज़दूर औरत की तरह
जो दिन भर कड़ी धूप में सिर पर ईंटें ढोने के बाद
कमर सीधी करते ही ऊँघने लगती है
शायद इसीलिए मॅनहटन बौखलाया सा लग रहा है.

मैं शायद बताना भूल गया
पिछले कुछ महीनों में इतनी जान-पहचान तो हो गई है कि

मॅनहटन अब मुझे इन्टीमिडेट नहीं करता
इसी वजह से अब ज़्यादातर खुली रहने लगी है मेरे बेडरूम की खिड़की
क्या पता आ ही बैठे वह कुहनी टेककर
मेरी खिड़की पर

बातें तो बहुत सारी करनी है मॅनहटन से
पूछने हैं कई सवाल, जानना है कईयों का हाल.

शायद बता ही दे उस बुढ़िया की कहानी
जिसका मेडन लेन की दुकानों की सीढ़ियों पर रैन-बसेरा है
शायद पता हो उसे
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के सामने अखबार की प्रतियाँ बाँटने वाली
अश्वेत महिला की आँखों से टपकती लाचारी का कारण
क्या पता सुना ही दे
कॉफ़ी-बेगल का ठेला लगाने वाले मार्क के युवा बेटे के सपनों की दास्तान
सी-पोर्ट पर बैठने वाले बूढ़े भिखारी की मैली-कुचैली पोटली का राज़ ही खोल दे शायद
या कह उठे संघर्ष-गाथा
अपनी साइकिलों के कैरियर पर
पिज़ा-बर्गर और न जाने क्या-क्या डिलीवर करते हिस्पैनिक पुरुषों की.
डव-जोन्स,नॅस्डॅक और एस एण्ड पी 500 के उतार-चढ़ाव
नाइन इलेवन के हमलों में मारे गए लोगों की फ़ेहरिस्त
संयुक्त राष्ट्र महासभा की बहसें और प्रस्ताव
टाइम्स स्क्वेयर के चौंधिया देने वाले होर्डिंग
ब्रूकलिन-ब्रिज के सवा-सौ सालों के इतिहास
और सेंट्रल पार्क के क्षेत्रफल के अलावा
इन सारी बातों की जानकारी भी रखता तो होगा मॅनहटन।
****

Sunday, May 17, 2009

शुभा की कुछ और कविताएं

टूटना

(1)
एक और एक
दो नहीं होते
एक और एक ग्यारह नहीं होते
क्योंकि एक नहीं है
एक के टुकड़े हैं
जिनसे एक भी नहीं बनता
इसे टूटना कहते हैं

(2)
हवा आधी है
आग आधी है
पानी आधा है
दुनिया आधी है
आधा-आधा है
बीच से टूटा है
यह संसार बीच से टूटा है
***

मुस्टंडा और बच्चा


भाषा के अन्दर बहुत सी बातें
सबने मिलकर बनाई होती हैं
इसलिए भाषा बहुत समय एक विश्वास की तरह चलती है

जैसे हम अगर कहें बच्चा
तो सभी समझते हैं, हाँ बच्चा
लेकिन बच्चे की जगह बैठा होता है एक परजीवी
एक तानाशाह
फिर भी हम कहते रहते हैं बच्चा ओहो बच्चा

और पूरा देश मुस्टंडों से भर जाता है

किसी उजड़े हुए बूढे में
किसी ठगी गई औरत में
किसी गूंगे में जैसे किसी स्मृति में
छिपकर जान बचाता है बच्चा
अब मुस्टंडा भी है और बच्चा भी है
इन्हें अलग-अलग पहचानने वाला भी है
भाषा अब भी है विश्वास की तरह अकारथ
***


स्पर्श


एक चीज़ होती थी स्पर्श
लेकिन इसका अनुभव भुला दिया गया
मतलब स्पर्श जो एक चीज़ नहीं था
भुला दिया गया

अब यह बात कैसे बताई जाए

एक मेमना घास भूलकर
नदी पर आ गया
ज़रा सा आगे बढ़कर नदी ने उसे छुआ
और मेमने ने अपने कान हिलाए
***

फिर भी

एक लम्बी दूरी
एक आधा काम
एक भ्रूण
ये सभी जगाते हैं कल्पना
कल्पना से
दूरी कम नहीं होती
काम पूरा नहीं होता

फिर भी
दिखाई पड़ती है हंसती हुई
एक बच्ची रास्ते पर

***

Saturday, May 16, 2009

अनुनाद के मुद्रित संस्करण से .......असद ज़ैदी


इससे पहले अनुनाद के प्रिंट एडिशन से हम नरेश चंद्राकर, व्योमेश शुक्ल और वीरेन डंगवाल की कवितायें यहाँ लगा चुके हैं। सोचा कि अनुनाद में छपी सभी कवितायें आपको पढ़वाई जायें ! इस बार प्रस्तुत हैं असद ज़ैदी की दो कवितायें। आगे आप इसी क्रम में चंद्रकांत देवताले, हरिश्चंद्र पांडे, अशोक पांडे, विशाल श्रीवास्तव, शैलेय, सादी यूसुफ़(अनुवाद -अशोक पांडे), राजेन्द्र कैडा की कवितायें और अलिंद उपाध्याय का एक वक्तव्य पढेंगे।


असद ज़ैदी की कविताएँ

अनुनाद के पन्ने पर टीप : असद ज़ैदी की कविताएँ एक गहरी बेचैनी और समय की देह पर दर्ज़ सांघातिक गतिविधियों से भरी कविताएँ हैं। इनसे महज पाठकीय सुख नहीं मिलता, बल्कि ये परेशान करती हैं और पाठक को उसके भीतर साबुत नहीं रहने देतीं। इस विशिष्ट अर्थ में असद ज़ैदी हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में अग्रणी माने जायेंगे। अपने प्रवेशांक में ही उनकी इन दो कविताओं को छाप पाना हमारी सम्पादकीय उपलब्धि है।

करने वाले काम

वापस खींचो सारे छुरे
जो तुमने घोंपे थे पसलियों के बीच
हँसली के ऊपर
गुर्दों के आसपास

लौटाओ लोगों को मुर्दाघरों से
इमरजेंसी वार्ड में जहाँ नाइट ड्यूटी पर लगे
दो उनींदे डॉक्टर
तुम्हारे किसी शिकार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं
वे ऐसे तो उसे बचा नहीं पाएंगे
खींचकर वापस लाओ वहाँ से भी उन सब मरते हुए लोगों को
बिठाओ उन्हें उनकी बैठकों और काम की जगहों में
सुनो उनसे उनके पसंदीदा मज़ाक़
जब उनमें से किसी की औरत चाय लेकर आए
तो हस्बे-मामूल बोलो नमस्ते भाभी !
और कोई बच्चा-बच्ची झाँकते दिखाई दें तो
बुलाओ और कहो देखो ये रहे तुम्हारे पापा
वापस लो अपनी चश्मदीद गवाहियाँ
जिनका तुमने रिहर्सल किया था
बताओ कि इबारत और दीद भयानक धोखा थीं
और याददाश्त एक घुलनशील ज़हर
फिर से लिखो अपना
सही-सही नाम और काम

उन समाचारों को फिर से लिखो
जो अफ़वाहों और भ्रामक बातों से भरे थे
कि कुछ भी अनायास और अचानक नहीं था
दुर्घटना दरअसल योजना थी
मत पोंछो हर जगह से अपनी उंगलियों के निशान
छुड़ाओ अपने बालों से वह बेहूदा खिजाब
फिर से बनाओ वही हथेलियाँ जो पसीजती थीं एक मासूम पशुता से
और मनुष्यता के ताप से ...
***

जागना रोना
(हैं ख़्वाब में हनोज़ जो जागे हैं ख़्वाब में - ग़ालिब)

तमाम फि़क्रमंदी और मेहनतकशी के पर्दे में रखा रहता है
दुख का भोंपू ख़ुद से रह-रहकर बजता हुआ
आदमी एहतियात से उठता है
और बजाने लगता है रेडियो
जहाँ से दबंग आवाज़ में देवकीनंदन पांडे सुनाने लगते हैं
आज की ख़ास - ख़ास खबरें

ये सब पीछे से उठती आवाज़ें हैं जिनका
कोई अब ज़िक्र नहीं है, लोग ऐसे हो गए हैं
कि अपने पिछले दुख भी गँवा बैठे
लोग संजय का ज़माना भूल गए, उन दुखों की पहचान भी भूल गए
पुराने अब झकझोरकर नयों से नहीं कहते
अरे नौजवानो, संजय....संजय !
जब कुछ वहशत होती है तो आप जा खड़े होते हैं
पिछवाड़े में खुलती खिड़कियों के पास और देखते हैं
काली, सफ़ेद और सलेटी दुनिया
उसके अँधेरे उसके उजाले और रहस्यमय परछाइयाँ - वहीं कुछ गोशों से
बनकर निकलता दिखाई देता है भविष्य
तैयार होकर फिंकता हुआ ताज़ा सामान
भावी दुनिया के लोथड़े जो सरकते हैं
एक अनिश्चयपूर्ण रंगीन भाप में
एक फ़ासिस्ट मोटरबाज़ की मूर्ति के पास
हर रोज़ रखी दिखती है एक ताज़ा माला।
***

Friday, May 15, 2009

शुभा की चार कविताएँ





पेड़ों की उदासी
पेड़ों के पास ऐसी कोई भाषा नहीं थी
जिसके ज़रिये वे अपनी बात
इन्सानों तक पहुंचा सकें

शायद पेड़ बुरा मान गए किसी बात का
वे बीज कम उगाने लगे
और बीजों में उगने की इच्छा ख़त्म हो गई
बचे हुए पेड़ों की उदासी देखी जा सकती है
----

हमारे समय में

हम महसूस करते रहते हैं
एक दूसरे की असहायता
हमारे समय में यही है
जनतंत्र का स्वरूप

कई तरह की स्वाधीनता
है हमारे पास

एक सूनी जगह है
जहाँ हम अपनी असहमति
व्यक्त कर सकते हैं
या जंगल की ओर निकल सकते हैं

आत्महत्या करते हुए हम
एक नोट भी छोड़ सकते हैं
या एक नरबलि पर चलते
उत्सव में नाक तक डूब सकते हैं

हम उन शब्दों में
एक दूसरे को तसल्ली दे सकते हैं
जिन शब्दों को
हमारा यकीन छोड़ गया है
----

आता-जाता आदमी

चिड़िया गाती है
हवा पानी में घुल जाती है
धुप रेत में घुस जाती है

पेड़ छाया बनकर दौड़-भाग करते हैं
पानी पर काई फैलती है बड़ी शान से
टिड्डे उड़ान रोककर घास पर कूदने लगते हैं

ओछे दिल का आदमी बड़ी-बड़ी आँखें
बड़े-बड़े कान लिए आता-जाता रहता है
बिना कुछ देखे-बिना कुछ सुने
----

इच्छा

मैं चाहती हूँ कुछ अव्यवहारिक लोग
एक गोष्ठी करें
कि समस्याओं को कैसे बचाया जाए
उन्हें जन्म लेने दिया जाए
वे अपना पूरा कद पाएं
वे खड़ी हों
और दिखाई दें
उनकी एक भाषा हो
और कोई उन्हें सुने
---- --------------------------------------------------------
शुभा बेहद कम छपने वाली कवियत्री हैं. उनकी जो कविताएँ गाहे-बगाहे विभिन्न पत्रिकाओं में छपी हैं, उनमें स्त्री विमर्श बेहद ओथेन्टिक और मुखर रूप से सामने आया है. यहाँ दी जा रही कविताओं का स्वर थोड़ा भिन्न है. १९९२ और उसके बाद के हादसों से उपजी व्यथा की अनुगूंज भी इस स्वर में शामिल है.(कुछ और कविताएँ अगली पोस्ट में...)

Wednesday, May 13, 2009

गंगा-स्तवन : वीरेन डंगवाल

(यह कविता अनुनाद के प्रिंट एडिशन से)

यह वन में नाचती एक किशोरी का एकांत उल्लास है
अपनी ही देह का कौतुक और भय
वह जो झरने बहे चले आ रहे हैं
हज़ारों-हज़ार
हर क़दम उलझते-पुलझते कूदते-फाँदते
लिए अपने साथ अपने-अपने इलाक़े की
वनस्पतियों का रस और खनिज तत्व
दरअसल उन्होंने ने ही बनाया है इसे
देवापगा गंग महरानी!
***
गंगा के जल में बनती है
हरसिल इलाक़े की कच्ची शराब
घुमन्तू भोटियों ने खोल लिए हैं क़स्बे में खोखे
जिनमें वे बेचते हैं
दालें-सुईधागा-प्याज-छतरियाँ-पौलीथीन
वग़ैरह
निर्विकार चालाकी के साथ ऊन कातते हुए

दिल्ली का तस्कर घूम रहा है
इलाक़े में अपनी लम्बी गाड़ी पर
साथ बैठाले एक ग्रामकन्या और उसके शराबी बाप को
इधर फोकट में मिल जाए अंगरेजी का अद्धा
तो उस अभागे पूर्व सैनिक को
और क्या चाहिए !
***
इस तरह चीखती हुई बहती है
हिमवान की गलती हुई देह
लापरवाही से चिप्स का फटा हुआ पैकेट फेंकता वह
आधुनिक यात्री
कहाँ पहचान पाएगा वह
ख़ुद को नेस्तनाबूद कर देने की उस महान यातना को
जो एक अभिलाषा भी है
कठोर शिशिर के लिए तैयार हो रहे हैं गाँव
विरल पत्र पेड़ों पर चारे के लिए बाँधे जा चुके
सूखी हुई घास और भूसे के
लूटे-परखुंडे
घरों में सहेजी जा चुकी
सुखाई गई मूलियाँ और उग्गल की पत्तियाँ
***
मुखबा में हिचकियाँ लेती-सी दिखती है
अतिशीतल हरे जल वाली गंगा
बादलों की ओट हो चला गोमुख का चितकबरा शिखर
जा बेटी, जा, वहीं अब तेरा घर होना है
मरने तक
चमड़े का रस मिले उसको भी पी लेना
गाद-कीच-तेल-तेज़ाबी रंग सभी पी लेना
ढो लेना जो लाशें मिलें सड़ती हुई
देखना वे ढोंग के महोत्सव
सरल मन जिन्हें आबाद करते हैं अपने प्यार से
बहती जाना शांत चित्त सहलाते-दुलराते
वक्ष पर आ बैठे जल पाँखियों की पाँत को।
****
(लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल और सुंदरचंद ठाकुर के साथ, हरसिल-गंगोत्री के रस्ते पर)
****

कोरियाई कवि कू सेंग की कविताओं का सिलसिला / दसवीं किस्त




शाम का धुंधलका

संयोग ही था
कि हम तीनों को ओलंपिक पार्क जाने का मौका मिला
एक दोस्त के घर हुई शादी से लौटते हुए
फरवरी के आखिरी दिनों में
आते बसंत की रौशनी से हम हतप्रभ रह गए
हमें लगा कि ऐसे में हमारा अलग-अलग रस्ते पकड़ कर
अपने घर चले जाना गलत होगा

हम अपने वृद्ध पेंशन कार्ड लाना भूल गए थे
लेकिन टिकट खिड़की पर बैठी लड़की ने हमसे रियायती दर ही ली
और मुस्कुरा कर हममें से एक की तरफ इशारा करते हुए बोली-
क्या यह `सोन्या रूल्स ऑफ वॉरफेअर´* जैसे नहीं हैं?

इसे बसंत भी कहा जा सकता था
लेकिन सूखी घास वाले पीले पार्क में देखने को कुछ भी नहीं था
पेड़ ठूंठ -से खड़े थे
हर चीज़ मानो अंतहीन उजाड़ थी
और चारों तरफ खड़े तथाकथित आधुनिक मूर्तिशिल्प भी
इतने सुंदर नहीं थे

एक पहाड़ी के ऊपर से गुज़रते हुए हमें
तीन बूढ़ों का एक और समूह मिला
वे हमारी ही उम्र के थे
हमारी ओर भरपूर गर्मजोशी से बढ़ते हुए

"मेरे दोस्त वो क्या है जो तुमसे कहता है जाओ
उन लोगों में शामिल हो जाओ? "
- मेरे दोस्त उपन्यासकार चांग पाई-सॉक ने
मुझे देखते हुए कहा
- "तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम उनसे बेहतर हो? "

हालांकि
हमने आपस में खूब हँसी -मज़ाक किया
पर हमारे कपड़े
हमारी असलियत बखान रहे थे

ऐसे स्थान से गुज़रते हुए
जिसमें आप पुरानी भूगर्भीय हलचलों के अवशेष देख सकते थे
हम एक और पहाड़ी पर पहुंचे
वहाँ से हमें दूर पैवेलियन दिखता था
एक तालाब
और पत्थरों का एक पुल
लेकिन अब हममें से किसी में भी
आगे चलने की ताकत नहीं बची थी
कवि किम कवांग-क्यून जो चलने के लिए छड़ी का सहारा ले रहे थे
सबसे पहले बोले-
- "वहाँ कुछ ख़ास नहीं दिखाई दे रहा!"
" तुम जैसे साथियों के साथ
कुछ भी अच्छा नहीं दिख
सकता" - हमारे इस संग-साथ को
कमतर सिद्ध करते हुए मैंने कहा
और यह सुनते ही बूढ़े पाई-सॉक फट पड़े-
" हाँ क्यों नहीं इसके लिए तो लेडी मिनिस्टर ** को आना चाहिए था यहाँ"
हममें से कोई भी अब हँसी रोक नहीं सकता था

हम एक दूसरे पर झुंझला रहे थे
देखा जाए तो हम कुछ नहीं थे
तीन सूखे पेड़ो के सिवा
हम बसंत देखना चाहते थे लेकिन हमारी उम्र में आकर
कुछ भी ऐसा नहीं बच गया था
जो हमें खुश करता

हम ऐसे तीन पुराने पेड़ों की तरह हो गए थे
जो आसमान को ताकते रहते हैं
जहां झिलमिला रही है डूबते दिन की
पीली रौशनी!
_____________________________________________________________________ अनुवादक की टीप :
*सोन्या रूल्स ऑफ वारफेअर एक मूल चीनी उपन्यास का नाम है- जिसे पाई-सॉक ने कोरियाई भाषा में अनुवाद किया और इस पर आधारित टी0वी0 सारियल बेहद लोकप्रिय हुआ।
** लेडी मिनिस्टर निबंधकार कु0 चो क्योंग-हुई का एक नाम है( जो कभी कैबिनेट मंत्री
रहीं।)


एक टेढ़ी मुस्कान


गृहणियों को व्याख्यान देने के अपने काम से
मैं टॉकसू पैलेस गार्डन गया
वहाँ अचानक ही मैंने देखा अपने एक हमउम्र दोस्त को बैठे हुए
एक जवान लड़की के साथ

वहाँ वे पूरी वाचालता के साथ बैठे थे
कुहनी से कुहनी सटाए

मुझे इस दृश्य पर यक़ीन ही नहीं आया
उसे चिढ़ाने के लिए मैंने ज़ोर से पुकारा- `` बूढ़े साथी क्या हाल हैं तुम्हारे ?´´वह उठकर आया और बोला -
`` क्या तुम जलन महसूस कर रहे हो मुझसे?
तुम्हारे मन में जो आए करो
फूलों के बिस्तर क्या सिर्फ तुम्हारे लिए हैं? ´´
- उसने टका-सा जवाब दिया

अपनी राह पकड़ते हुए मैंने गौर किया
वह सत्तर के ऊपर था
उसकी पत्नी दिवंगत हो गई थी पिछले साल ही
वह अपने फ्लैट में अकेला रहता था
हो सकता है कुछ.........

अपना व्याख्यान समाप्त करके जब मैं वापस लौटा
तो देखा वह बैठा है बेंच पर
अकेला
`` ठुकरा दिये गए? ´´- चिढ़ाते हुए पूछा मैंने

`` वह मेरी पोती थी यार जो किसी के प्रेम में पड़कर
घर से भाग गयी है
और मुझसे बात करना चाहती थी! ´´
-उसने एक टेढ़ी मुस्कान के साथ जवाब दिया

यह हमारे जीवन का विद्रूप था

मैं भी मुस्कुराया वैसी ही एक टेढ़ी मुस्कान
और हम अपनी पसंदीदा मधुशाला की ओर बढ़ लिए !


Tuesday, May 12, 2009

विनोद दास की कविताओं का सिलसिला / दूसरी कविता



रंग



यह काल की अविराम घड़ी का तेज है
या कुछ और
सृष्टि में रंगों का बढ़ता जा रहा है तेज
बेस्वाद टमाटर होता जा रहा है
कुछ और लाल
कुछ और चटकदार

उदास
निस्तेज सिकुड़ा सिकुड़ा
हमारा दुख भी
दिखता है जगमग
छोटे रंगीन परदे पर

रंगो की बढ़ती जा रही हैं
लपलपाती इच्छाएं
खोती जा रही है उनकी आब
उनकी दीप्ति
उनकी छुवन और
उनका ठाठ

रंगलहर
जो उठाती है ह्रदय में ज्वार
नहीं है उस परवल में
जो आपके घर की टोकरी में चमक रहा है

नहीं है वह रस और स्वाद
जो बरसों बरस आपकी जीभ की स्मृति में मचलता रहा है

परवल पर चमकती पॉलिश की परत
उस सेल्सगर्ल की मुदित खोखल मुस्कान से
कितनी मिलती जुलती है
जो काउंटर पर बेच रही है
नेलपॉलिश

इस अलौकिक और अंतहीन रंगयात्रा में
सबकुछ होता जा रहा है गड्ड मड्ड

हत्यारा दिखता है महानायक
निरंकुश अफसर महान शब्दशिल्पी
बलात्कारी स्त्री विमर्श का प्रवक्ता

सिर्फ़ मनुष्यता का रंग होता जा रहा है
स्याह और मलिन
मेरी आंखों के नीचे बढ़ते हुए
काले गोल धब्बों की तरह !
***

कोरियाई कवि कू सेंग की कविताओं का सिलसिला / नौवीं किस्त



कवि के परिचय, अनुवादक के पूर्वकथन तथा बाक़ी कविताओं के लिए यहा क्लिक करें !



मैं


मैं एक नहीं दो हूँ भीतर से
या शायद तीन

एक मैं जिसे लोग बाहर देखते हैं
और एक मैं जो छुपा रहता है भीतर
और तीसरा जो अवचेतन में हैं
जो अपने आप नहीं जा सकता अध्यात्म की ओर
हर मैं एक दूसरे से दूर खड़ा रहता है

आज फिर
नाई की दुकान में दाढ़ी और बाल बनवाने के बाद
जैसे ही एक लड़की ने मुझे एक संदेश लिखा कागज़ का एक टुकडा दिया
ग़लती से उसके हाथ
मेरे अंतरंग अंगों को छू गए
और मेरे भीतर एक बहस छिड़ गयी -
एक मैं था जो उसे चेताना चाहता था
और दूसरा उम्मीद कर रहा था
उसके हाथों के दोबारा फिसलने की
आप कह सकते हैं
कि मुझसे मेरी ही यह लड़ाई
स्थायी है
और निरंतर भी

लेकिन
अभी थोड़ा पहले ही
एक रात सपने में मैं एक ऐसी औरत के साथ था
जिससे मैं कभी नहीं मिला
और ऐसा होना बहुत वीभत्स है
पर मैं स्खलित हो गया
यह कौन सा मैं था जिसने इसे अंजाम दिया?
इन तीनों में से कौन-सा
सही या गलत है ?
कौन-सा अच्छा है, कौन बुरा ?
और इनमें से कौन है जो वास्तव में
मैं हूँ ?

मैं जितना हैरान होता जाता हूँ
उतना ही कम समझ पाता हूँ अपने अखीर और
इस गड़बड़ को

और अपनी इन अलग-अलग
प्रतिक्रियाओं के चलते और भी बेचैन होता जाता हूँ
यह जानने के लिए
कि वह कौन-सा मैं होगा
जो मरेगा एक दिन
और ले जाया जाएगा
फैसले के लिए!


बाहर आओ साँप !

मैं महान कलाकार पंग-गॉग के अतीत से संबधित
चित्रों की एक चित्र में गया
होआम गैलरी के दोनों तलों पर शीर्षक
यह उनके सत्तर साल के कर्मशील जीवन का शुरू से अखीर तक का
पूरा काम था

उनके साथ गैलरी में टहलते हुए
चूँकि कुछ कहना ही था
सो मैंने कहा - " क्या यह सब चित्र आपने अपनी प्रेरणा से बनाए हैं ? "और उन्हें इसके लिए बधाई दी

" कभी-कभार मैंने दूसरे लोगों के काम की नकल भी की! "- उन्होंने स्वीकार किया

हम कुछ आगे बढ़े
और उस चित्र के आगे ठिठक गए जिसका शीर्षक था
"बाहर आओ साँप "
उसमें - "किसी बड़ी तश्तरी जैसे चाँद के नीचे
एक बड़ी चट्टान जैसा मेंढक बैठा हुआ है
उसके पिछले पाँव फैले हुए हैं
और थुलथुला पेट नास्मन पर्वत जितना बड़ा
उसने अपने बायें पंजे की हथेली में एक गिलास थामा हुआ है- किसी तरल से भरा
आँखें उसकी बड़ी-बड़ी कटोरी जैसी
मुँह भरा हुआ ऐसे मानो कुछ उगलने को तैयार
एक अजीब और छू लेने वाली निगाह
सब कुछ शराब में बहा हुआ "

आहा - मैं बोल पड़ा - "यह तो तुम्हारा आत्मचित्र है मेरे दोस्त! "

हाँ उसने कहा - " तुम शायद इस प्रशंसनीय स्थिति को जानते हो?
नैतिकता या पवित्रता की राह पर मैं इतना अच्छा नहीं की हूँ
लेकिन यह पीने-पिलाने के बीच आ जाता है तो................. "

हमने एक दूसरे को देखा ग़ौर से और ठठा कर हँसने लगे

"क्या तुम अब भी पीते हो मेरे बूढ़े दोस्त?"

"नहीं, मैं तो इस सबको अलविदा कह चुका हूं!
और तुम? "

"मैं भी !
डॉक्टर का आदेश जो है! "

और इस थोड़ी-सी बातचीत के बाद
हम दोनों ही
डूब गए
एक अवसाद भरी ख़ामोशी में !


Monday, May 11, 2009

छोटे नहीं होते सपने - लाल्‍टू की दो कविताएं


हमारी दुनिया की हर अच्छी चीज़ को बचाते हुए एक नयी दुनिया बनाने की छटपटाहट लाल्टू के शब्दों में है. उनके यहाँ कविता 'रेटरिक' होकर 'पैशन' है. यथास्थिति से घमासान करते हुए भी लाल्टू की कवितायें जीवन से टूटकर प्यार करती हैं. प्रस्तुत हैं उनकी दो कवितायें जो हमारे अनुरोध पर उन्होंने अनुनाद के लिए भेजी हैं.



एक

छोटे-बड़े तारे नहीं जानते ग्रहों में कितनी जटिल
जीवनधारा
आकाशगंगा को नहीं पता भगीरथ का
इतिहास वर्तमान
चल रहा बहुत कुछ हमारी कोशिकाओं में
हमें नहीं पता
अलग-अलग सूक्ष्म दिखता जो संसार
उसके टुकड़ों में भी है प्यार
उनका भी एक दूसरे पर असीमित
अधिकार
जो बड़े हैं
नहीं दिखता उन्हें छोटों का जटिल संसार
छोटे दिखनेवालों का भी होता बड़ा घरबार
छोटी नहीं भावनाएं, तकलीफें
छोटे नहीं होते सपने.
कविता,विज्ञान,सृजन,प्यार
कौन है क्या है वह अपरंपार
छोटे-बड़े हर जटिल का अहसास
सुंदर शिव सत्य ही बार बार.

(पश्यंतीः अक्तूबर - दिसंबर २०००)


दो

गाओ गीत कि कोई नहीं सर्वज्ञ
पूछो कि क्या तुम्हारी साँस तुम्हारी है
क्या तुम्हारी चाहतें तुम्हारी हैं
क्या तुम प्यार कर सकते हो
जीवन से, जीवन के हर रंग से
क्या तुम खुद से प्यार कर सकते हो
धूल, पानी, हवा, आस्मान
शब्द नहीं जीवन हैं
जैसे स्वाधीनता शब्द नहीं, पहेली नहीं
युवाओं, मत लो शपथ
गरजो कि जीवन तुम्हारा है
ज़मीं तुम्हारी है
यह ज़मीं हर इंसान की है
इस ज़मीं पर जो लकीरें हैं
गुलामी है वह
दिलों को बाँटतीं ये लकीरें
युवाओं मत पहनो कपड़े जो तुम्हें दूसरों से अलग नहीं
विच्छिन्न करते हैं
मत गाओ युद्ध गीत
चढ़ो, पेड़ों पर चढ़ो
पहाड़ों पर चढ़ो
खुली आँखें समेटो दुनिया को
यह संसार है हमारे पास
इसी में हमारी आज़ादी, यही हमारी साँस
कोई स्वर्ग नहीं जो यहाँ नहीं
जुट जाओ कि कोई नर्क न हो
देखो बच्चे छूना चाहते तुम्हें
चल पड़ो उनकी उँगलियाँ पकड़
गाओ गीत कि कोई नहीं सर्वज्ञ, कोई नहीं भगवान
हम ही हैं नई भोर के दूत
हम इंसां से प्यार करते हैं
हम जीवन से प्यार करते हैं
स्वाधीन हैं हम.
***

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