Friday, April 24, 2009

ईश्वर को मोक्ष - नीलाभ

(नीलाभ की कविता `हर किस्म की मृत्यु से नफ़रत और हर किस्म के जीवन से प्यार की कविता´ है। अपनी पीढ़ी के कवियों के व्यापक वर्णक्रम में नीलाभ के कवित्व का अपना अलग रंग है। उनकी कविता मानव जीवन के वैविध्यपूर्ण लैंडस्केप, सीस्केप और माउंटेनस्केप के विस्तार में मानवीय सारतत्व और जिजीविषा के उत्सों का संधान करती हुई कभी वेणुगोपाल, कभी राजेश जोशी, कभी आलोकधन्वा, कभी अरुणकमल, कभी गोरख पांडे, कभी वीरेन डंगवाल या कभी विष्णु खरे की कविता के निकट से गुज़रती है, लेकिन चीज़ों को देखने समझने का कोण हरदम उनका अपना होता है और उनका शैली-वैशिष्ट्य हरदम बना रहता है। नीलाभ की कविता एक यायावर-ह्रदय कवि की यायावर कविता है, जिसे अपनी लगभग चार दशक लम्बी यात्रा के दौरान गुरुत्व और आवेग विरल द्वंद्वात्मक तनावपूर्ण संतुलन के साथ ही व्यापक वैविध्य भी अर्जित किया है -कात्यायनी)


पच्चीस बरस पहले मैंने नीलाभ के संग्रह `जंगल खामोश है´ की समीक्षा करते हुए लिखा था - जो चीज़ बढ़िया लगती है वह यह कि कवि फाइटर है। आज भी उनकी यही चीज़ सबसे पहले दिखती है जबकि लड़ाई और अब ज्यादा जटिल और तेज़ हो गई है....... टकसाली ढंग की अच्छी कविता लिखने वालों से अलग होकर वे ऐसी कविताएं लिखने की कोशिश करते हैं, जो `अशुद्ध कविता´(पाब्लो नेरूदा) के दायरे में आती - वेणुगोपाल


ईश्वर को मोक्ष

वह ईश्वर था जिसके बारे में कहा जाता था कि उसने दुनिया बनाई थी। मगर इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के आते-आते उसे इसका भी भरोसा नहीं रह गया था। अपनी कथित रूप से बनाई दुनिया में उसके पास रहने को जगह नहीं रह गई थी, गो हर गली-मुहल्ले या चौराहे पर या कहीं-कहीं तो सड़क के बीचोंबीच भी बने हुए थे उसके घर जिन्हें छेक रखा था अपान वायु छोड़ते पुजारियों ने जिसकी दुर्गन्ध से पथरा गए थे उसके प्रतिरूप। यों आम विश्वास यह भी था कि वह रहता है मिट्टी के हर ज़र्रे में, पानी के हर कण में, हवा के हर परमाणु में। मगर इक्कीसवीं सदी के पहली दहाई के आते-आते वह पूरी तरह बेघर हो गया था। जब वह हवा के परमाणु में खोजता था अपना ठौर, वह पाता था वहां कोयले, पेट्रोल और डीज़ल को कब्ज़ा जमाकर बैठे हुए। जल के कण से उसे धकेल कर बाहर कर देते थे बार-बार कारखानों के ज़हरीले स़्त्राव। मिट्टी के हर ज़र्रे में भरे हुए थे नाना प्रकार के उर्वरकों के रसायन। वह सुबह खांसता था तो काले बलग़म के लौंदे गिरते थे उसके मुंह से। अरसे से वह रक्तविकार का शिकार था। उनींदी रातों में धुंए और धुंध से करियाए आकाश में धुंआसी लालटेन की तरह टिमटिमाते ध्रुव या शुक्र तारे को निहारते हुए वह अपनी अनश्वरता पर खीझ कर कामना करता था अपने सृजे मनुष्य से जन्मने का ताकि मोक्ष पा सके वह किसी तरह अपनी जर्जर अमर काया से।
***

(नीलाभ ने अपनी कवितायें प्रकाशित करने का अधिकार अनुनाद को दिया है। यह कविता और कात्यायनी तथा वेणुगोपाल के कथन परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित उनके संकलन "ईश्वर को मोक्ष" से साभार।)

1 comment:

  1. neelabh ji ki kavita ke aaqhiri hisse se mahadevi verma ki in panktiyon ki yaad taaza ho gayi-----
    "kya amaron ka lok milega, teri karuna ka uphaar
    rahne do he dev ! are, yah mera mitne ka adhikaar."
    baharhaal, neelabh ji ki kavita sachmuch saabit karti hai ki wah 'fighter' hain & 'ashuddha kavita ke halqe mein jaane se unhen uzra nahin hai.
    camus ne kaha tha ki 'mujhe ve log zyaada pasand hain, jo saahitya ki bajaaye jivan mein paksha lete hon !' mere qhayaal se is maamle mein neelabh ji aaj ke hindi saahitya-sansaar mein ek apvaad hi hain . unki kavita bhi is sachaai ka saakshya hai.
    ---pankaj chaturvedi
    kanpur

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