Thursday, April 9, 2009

कोरियाई कवि कू सेंग की कविताओं का सिलसिला / पहली किस्त

अनुवादक की बात

कू सेंग की कविताएँ पहली बार मेरे दोस्त अशोक पांडे को इंटरनेट पर उसकी लगातार यात्राओं के दौरान मिलीं। उसे वो पसन्द आयीं। उसने 'इंफेंट इस्‍प्‍लेंडर' नाम का एक संकलन डाउनलोड किया लेकिन फिर उसका मन फर्नान्दो पेसोआ, मीवोष, शिंबोर्स्का , साइफर्त, नेरूदा, अख़्मातोवा, हुआर्रोज़ जैसे अधिक चमत्कारी और प्रतिष्ठित नामों में रम गया। मैं खुद उन दिनों हिब्रू कवि येहूदा आमीखाई की कविताओं की ऊबड़खाबड़ धरती पर भटक रहा था और उस बेहद अर्थपूर्ण भटकाव के जादू में लगभग डूबा हुआ था। अशोक ने और मैंने आमीखाई की कविताओं के अनुवाद किए, जिनका संयुक्त रूप से प्रकाशन संवाद´ ने किया। इस दौरान कू सेंग कहीं काग़ज़ों के ढेर में गुमनाम रहा। बीच में एक बार मेरा ध्यान उस ओर गया तो उनकी चार कविताओं के अनुवाद एक संक्षिप्त टिप्पणी के साथ वरिष्ठ कवि विजेन्द्र की पत्रिका `कृतिओर´ में छपे भी, लेकिन एक निरन्तर काम नहीं हो पाया। अब किसी हद तक यह हुआ है।

2004 में 85 से अधिक के अत्यन्त सर्जनात्मक जीवन के बाद स्वाभाविक मुत्यु प्राप्त करने वाला यह कवि एक ही साथ काफी सहज और काफी विचित्र भी है। उलटबाँसी की शैली में कहें तो इसकी विचित्रता ही इसकी सहजता है और यही सहजता ही मानो विचित्रता भी है। अपनी कहन में यह बहुत सपाट और अभिधात्मक है। इस कवि की मूल काव्यभाषा से मेरा कोई परिचय नहीं है और इसका अंग्रेज़ी अनुवाद पूरी तरह गद्यानुवाद ही हैं, लेकिन उसमें भी अपनी ज़मीन, अपने अस्तित्व और अपने समय से जुडे़ सवालों विपर्ययों और विडम्बनाओं को समर्पित एक खिलन्दड़ी और अद्भुत काव्यात्मा हर कहीं साफ़ झलकती है और कभी-कभी तो बिजली के जैसी कड़कती भी है। मैंने कोशिश की है कि मैं इन कविताओं को समकालीन हिन्दी कविता की भाषा और शिल्प में ढालने की कोशिश करूँ, जिससे पाठकों को इन गद्य-कविताओं से अपनापा महसूस करने में कोई कठिनाई न लगे। इसी क्रम में कुछ सन्दर्भ भी कविताओं के नीचे दर्ज है।


मैं रूपान्तरकार या अनुवादक के तौर पर एक और बात साफ़ करना चाहूँगा कि मेरा ख़ुद का वैचारिक धरातल काफी सजग रूप से जीवन के सभी भीड़ और भटकाव भरे रास्तों पर से हमेशा ही बाँयें चलने का रहा है और रहेगा। इस बात का उल्लेख इसलिए ज़रूरी लगा क्योंकि यह कवि अपनी मूल प्रवृत्तियों में काफी धार्मिक और आध्यात्मिक भी है, जिसका एक सतही सबूत इस बात से भी मिलता है कि उसकी कविताओं का अंग्रेज़ी अनुवादक ब्रदर एंटोनी नाम का एक फ्राँसीसी पादरी है। मुझे इन कविताओं से गुज़रते हुए ऐसा लगा कि धार्मिक और आध्यात्मिक होते हुए भी कू सेंग अपने इन्हीं जीवन-मूल्यों के पार भी जाता है। वह इनसे जुड़े कई विद्रूप उजागर करता है। वह `अपने ही साथ खेलता´ है और `गीले सपने´ भी देखता है। वह एक नौजवान एथलीट लड़की के प्रति अपने आकर्षण को खुलेआम कविता में लिखकर उजागर करता है। उसकी एक कविता में यह घोषणा भी दर्ज है कि उसे अपने जीवन में `टेन कमांडमेंट्स´ में से किसी का भी पालन नहीं किया। अपने हमउम्र साथी को एक नौजवान लड़की के साथ बैठा देख वह उस पर शक करता हुआ उससे ईर्ष्या भी करता है और अखीर में यह पता चलने पर कि लड़की दरअसल उस दोस्त की घर से भागी हुई पोती है , वह उसके साथ मिलकर एक विद्रूप भरी हँसी हँसकर शराबघर का रस्ता पकड़ता है। चित्रकार मित्र की बनाई एक तस्वीर में शराबनोशी का नज़ारा कर चिकित्सकीय निषेध के कारण खुद न पी सकने के अवसाद में डूब जाता है। इस तरह के काव्यप्रसंगों में नैतिकता के धरातल पर खुद के साथ इतनी क्रूरता से पेश आने वाला यह कवि इस रूप में हमारे समक्ष खुद को ठीक से जानने-पहचानने की एक अजीब-सी चुनौती भी रखता है। यह जानना भी रोचक होगा कि वह अपने देश में नर्सरी कक्षाओं से लेकर परास्नातक उपाधियों तक पढ़ाया जाता है। कई शोधार्थी उस पर शोध भी करते हैं। यह उसकी कविता की रेंज है। अपने देश और भाषा में कू सेंग की लोकप्रियता कल्पना से परे है। भारतीय सन्दर्भ में कहूं तो बिना हिचक कह सकता हूँ कि एक विशिष्ट सामाजिक अर्थ में उसकी कविताएँ कहीं-कहीं निराला और नागार्जुन जैसा बोध भी कराती हैं। मेरा काम फिलहाल इन कविताओं की समीक्षा करना नहीं है। मैं सिर्फ एक पर्दा उठा रहा हूँ और फिर देखते हैं कि समकालीन हिन्दी कविता के पाठकों को इस अटपटे विदेशी कवि में क्या कुछ नज़र आता है?


हिन्दी में कू सेंग की कविताओं के अनुवाद का ये निश्चित रूप से पहला प्रयास है। इसे अधूरा ही समझा जाए। अंग्रेज़ी में इंटरनेट पर उपलब्ध उनकी तीन पुस्तकों से चुनकर एक बड़ा कविता-संग्रह बनाने का प्रयास मैं ज़रूर करूँगा लेकिन उससे पहले इन कुछ कविताओं पर पाठकीय प्रतिक्रियाओं की मुझे ज़रूरत होगी।

अग्रज कवि श्री चन्द्रकान्त देवताले और श्री मंगलेश डबराल ने इन कविताओं के शुरूआती अनुवाद पर कुछ अनमोल प्रतिक्रियाएँ और सुझाव दिए - इसके लिए उनका भी आभार। अशोक अपना बड़ा भाई और यार है इसलिए उसका आभार व्यक्त करना निहायत बेवकूफी का काम होगा ......... तब भी अगर वो स्वीकारे.........तो......!



(पहली किस्त में इतनी कैफि़यत ज़रूरी थी, आगे ये सिलसिला निर्बाध जारी रहेगा। यह अनुवाद `पुनश्च´ से पुस्तिकाकार प्रकाशित हो चुके हैं, जो अब अनुपलब्ध है। जल्द ही इनका पुनर्प्रकाशन `शाइनिंग स्टार´ नामक एक नए प्रकाशन से होगा।)

- शिरीष कुमार मौर्य

अपने ही साथ खेलना

प्राइमरी स्कूल में कदम रखने से थोड़ा पहले
एक दिन
मेरी नातिन ने पूछा मुझसे - " नाना लोग कहते हैं आप बहुत मशहूर हैं !"तो फौरन ही पलटकर मैंने पूछा उससे - " मशहूर होना क्या होता है
तुम जानती हो? "
उसने कहा - "नहीं "मैंने उसे बताया - " यह कोई अच्छी चीज़ नहीं है बेटी ! "
इस साल
वह मिडिल स्कूल की दूसरी कक्षा में है
और मेरी एक कविता भी है उसकी किताब में
मुझे पता लगा
वह सबसे मुझे जानने का दावा करती है

"तो तुमने अब क्या बताया लोगों को मेरे बारे में?" - इस बाबत मैंने पूछा उससे
" यही कि आप एक साधारण बूढ़े आदमी हैं
लेकिन उस लड़के की तरह
जो अकेले
बस अपने ही साथ खेलता रहता है ! "
-- उसने जवाब दिया
मैं बहुत खुश हुआ उसके जवाब से
" बहुत अच्छे बेटी धन्यवाद ! " - मैंने उससे कहा
और फिर मेरा बाक़ी का दिन
काफ़ी मौज से कटा!



सपने

पिछली रात
मुझे एक गीला सपना आया -
मेरी हमबिस्तर थी एक फूल-सी नाजुक नौजवान औरत
जो मेरी पत्नी हरगिज़ नहीं थी
तो इस तरह यह सब बेवफ़ाई जैसा कुछ था
और जागने पर
मुझे अपराध-बोध हुआ

कुछ ही दिन पहले ही
मैंने सपने में देखा कि मैं कोरिया का सी0आई0ए0 प्रमुख़ बन गया हूं!
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में
यों भी मुझसे अकसर कहते ही रहते हैं मेरे मिलने वाले -
" तुम्हें समाज में एक ऊंची हैसियत पाने की कोशिश करनी चाहिए"और कभी-कभी
मज़ाक में
मैं भी जवाब दे देता उन्हें-
"हो सकता है कि मैं सी0आई0ए0 प्रमुख बन जाऊं "लेकिन
यह एक बेहूदी बात है

अब मैं सत्तर का होने को हूँ
और इस बात पर यक़ीन करता हूँ कि हमारी इन मछली-सी गंधाती
देहों से अलग होने के बाद भी
(जैसे समुद्र तटों पर मिलते हैं सीपियाँ और शंख)
लहरों से दूर
जारी रहेगा हमारा जीवन
लेकिन
कुल मिलाकर यह सब सपने जैसा ही है -
निरा बचपना !

या फिर
इस बात का संकेत
कि कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुके हैं मेरे गुनाह
मेरे भीतर
मुझे हैरानी होगी अगर मैं कभी मुक्त हो पाया
इन फंतासियों से
जागते या सपना देखते हुए !


4 comments:

  1. धन्यवाद, इतने सुन्दर रचनाओं को हिंदी में पढ़ने के लिए.

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  2. पहली कविता तो वाकई ही एक सुखद अहसास के साथ है, शिरीष। अब मालूम नहीं यह तुम्हारे अनुवाद का कमाल है या कविता ही उतनी सहज है कि मुझे लगा अनुवाद तो नहीं ही पढ रहा हूं,मूल ही है।
    मेरी शुभकामनाएं मित्र। अच्छा काम हो रहा है। जमकर लगे रहो मित्र।

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  3. वाह! क्या सादगी है! कहीं कोई घटाटोप नहीं.कोई गूढ़ अर्थ देने की महत्वाकांक्षा नहीं.शिरीष जी बाएँ चले या दाएं, सहज चलने में कोई बुराई नहीं. आपका ये काम अद्भुत है. हम वैसे भी दुनिया को अनुवाद की खिड़की से ही देख पा रहें है.

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  4. tipanni aur anuwad dono achhe lage...kavitayen aur dete...kahir,wah sambhawtah aage denge...badhai...

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