Thursday, April 2, 2009

फिलीस्तीनी-अमरीकी कवि सुहीर हम्माद की कविता - दूसरी किस्त / चयन,अनुवाद तथा प्रस्तुति : यादवेंद्र

हादसे के बाद पहले शब्द
(11 सितम्बर 2001 के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के तत्काल बाद लिखी लम्बी कविता के चुनिन्दा अंश)

कोई शब्द नहीं
मैंने नहीं लिखा एक भी शब्द
कैनाल स्ट्रीट के दक्षिण की राख में नहीं है कोई कविता
मलबा और डी0एन0ए0 ढोते
रेफि्रजरेटेड ट्रकों में नहीं है कोई कहानी
एक शब्द भी नहीं

आज हो गया एक हफ्ता -
सात का अंक होता है देवताओं का
स्वर्ग का और विज्ञान का
मेरी रसोई की खिड़की से दिख रही है
एक निराकार वास्तविकता
आकाश - यहां कभी मौजूद था फौलाद
धुंआ - जहां कभी चहलक़दमी करता था हाड़मांस

शहर की हवा में आग की गंध है
और मुझे फिक्र हो रही है अपनी बहन की
इतनी शिद्दत से पहले कभी भी नहीं सोचा था इसकी बाबत
फिर इस पल
अब मुझे चिंता सताने लगी है सब अपनों की

पहली बात - हे ईश्वर ! मेरी विनती मानो
कि जब दूसरा विमान आए
तो न दिखे इसमें कोई भी ऐसा पायलट
जिसकी सूरत मिलती-जुलती हो
भाइयों से मेरे !

मुझे मालूम नहीं कि
मारने के लिए किसी को करना पड़ता है कितना खंड-खंड
अपने जीवन को
मुझ पर भूख कभी इतनी हावी नहीं हुई
कि मैं दुआ करने लगूं भूख की -
मैं इतनी क्रुद्ध कभी नहीं हुई
थाम लूं बंदूक हाथ में
रखकर परे अपनी कलम !

सचमुच कभी नहीं हुआ ऐसा मेरे साथ
मेरे स्त्री होते हुए भी नहीं
मेरे फिलीस्तीनी होते हुए भी नहीं
और अब एक टूटा-बिखरा इंसान होते हुए भी
दरअसल इतनी तो कभी भी
टूटी-बिखरी नहीं थी मैं

पहले से कहीं ज्यादा
अब लगने लगा है मुझे
कि कहीं कुछ नहीं है अंतर -
सबसे खुशनसीब राष्ट्र है तो भी - अमरीका में रहने वाले ज्यादातर लोग जानते नहीं
कि क्या होता है भेद
भारतीयों अफ़गानियों सीरियाइयों
सिखों और हिंदुओं के बीच
अब तो शिद्दत से लगने लगा है
कि सचमुच नहीं बचा कुछ भी अब फर्क इनके बीच
मृतकों को कागज़ों में दिखा देते हैं गुमशुदा
और उनके परिजन हमारे सामने लगी जर्जर जालियों के सामने आकर
लहराते रहते हैं धुंधले पड़ गए प्रिंट आउट्स (सबूत)

हम आइरिस को तलाश रहे हैं - तीन बच्चों की मां वह
यदि किसी के पास कोई जानकारी हो तो हमें फौरन बताए

हम प्रीति को ढूंढ रहे हैं - आखिरी बार वह पति से फोन पर बात करती हुई
103 वें माले पर देखी गई थी ... कि तभी अचानक लाइन कट गई

जार्ज को ढूंढने में हमारी मदद करें - उसको कुछ लोग एडेल के नाम से भी पुकारते थे
घरवाले उसकी पसन्द का खाना तैयार किए जाने कब से उसकी बाट जोह रहे थे

मैं अपने बेटे को यहां-वहां सब जगह तलाश आई
वह काफी बनाकर लोगों को पिलाया करता था

मेरी बहन कहां गुम हो गई ... अभी सोमवार को ही तो
शुरू की थी उसने अपनी नौकरी

मैं ढूंढ रही हूं शांति ... दया तलाश रही हूं
कहीं दिख जाएं करुणा के सबूत ... जीवन के साक्ष्य
मैं जीवन ही तो ढूंढ रही हूं !

_______________________________

पहली पोस्ट का लिंक यह है !

यादवेंद्र एफ-24, शांतिनगर, रुड़की - 247 667 फोन : 9411111689

2 comments:

  1. सुहीर हम्माद की यह कविता का दर्द बहुत गहरे तक असर करता है। यादवेंद्र जी का हिंदी अनुवाद इतना सुन्दर और सशक्त है कि लगता है कि हम अनुवाद नहीं, सुहीर की असल कविता ही पढ़ रहे हों। "अनुनाद" अपनी इस तरह की लीक से हटकर की गई प्रस्तुतियों के लिए ब्लॉग जगत में अपनी पुख्ता पहचान बना रहा है।

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  2. सुहीर हम्माद की यह कविता का दर्द बहुत गहरे तक असर करता है। यादवेंद्र जी का हिंदी अनुवाद इतना सुन्दर और सशक्त है कि लगता है कि हम अनुवाद नहीं, सुहीर की असल कविता ही पढ़ रहे हों। "अनुनाद" अपनी इस तरह की लीक से हटकर की गई प्रस्तुतियों के लिए ब्लॉग जगत में अपनी पुख्ता पहचान बना रहा है।

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