Wednesday, April 1, 2009

फिलीस्तीनी-अमरीकी कवि सुहीर हम्माद की कविता : चयन, अनुवाद तथा प्रस्तुति : यादवेन्द्र / पहली किस्त

जार्डन के एक शरणार्थी शिविर में 1973 में जन्मी सुहीर हम्माद अपने बचपन का कुछ समय बेरूत में फिलीस्तीनी सिविल वॉर की छाया में गुज़ारने के बाद अपने परिवार के साथ 5 साल की उम्र में सनसेट पार्क, ब्रुकलिन(अमरीका) आ गईं। उनकी कविताओं की एक किताब "बोर्न पेलेस्टीनियन, बोर्न ब्लैक" और एक संस्मरण "ड्राप्स ऑफ दिस स्टोरी" प्रकाशित हैं। उन्होंने "हाफ अ लाइफटाइम" नाम से एक फिल्म भी बनाई है और अपने अनुभवों पर आधारित एक फिल्म " फ्राम बेरूत टू ब्रुकलिन" की पटकथा लिख रही हैं। युवा पीढ़ी के सर्वाधिक चर्चित नामों में एक।

शरण और भाषा के बारे में
( हरीकेन कटरीना के हादसे के बाद यह कविता लिखी गई। बचाव आपरेशन बार-बार टी0वी0 पर दिखाए जा रहे थे और पीड़ितों को शरणार्थी कहकर सम्बोधित किया जा रहा था, जबकि वे अमरीका के नागरिक थे।)

मेरी कतई कोई मंशा नहीं
कि भर दूं जीवित मुंहों में अनुकूल शब्द
या दफ़न कर दूं बेकद्री से
प्राण त्याग चुके लोगों को

मैं ऐसी बहरी नहीं हो गई
कि पनाह देने वाली झोपड़ियों से निकलकर बाहर आती आवाज़ें न सुनाई दें मुझे

नागरिक, नागरिक होते हैं, शरणार्थी नहीं
और अमरीकी तो शरणार्थी होते ही नहीं

मैं चालाकी से घुमाऊंगी नहीं
शब्दों को इधर से उधर अपने अनुकूल बनाने की गरज से
और न ही झांकूंगी बगलें

मैं तो इतना जानती हूँ
बिल्कुल नहीं होते ऐसे लोग कि कंगालों का दर्जा हासिल करने की करें मांग
बिल्कुल नहीं होते ऐसे लोग जो चाहें करुणा के स्थान पर तरस का भाव
बिल्कुल नहीं होते ऐसे लोग जिनके सीने हो जाएं चौड़े गुलाम कहलाने पर
भले कितनी भी विकट गांठें क्यों न हों गुलामी की

हम निष्ठावान हों तो किसके लिए?
जिस सरकार ने छोड़ दिया
बूढ़ों को प्यास से तड़प-तड़प कर दम तोड़ने को
दूर दूर तक पसरे पानियों के बीच
वो तो विदेशी सरकार है
सर्पाकार कतार बांधे अनपढ़ लोगों को
लिखत-पढ़त के लिए थमाया जा रहा है कागज़ों का पुलिंदा
उनके नाम तो कब के मिटाए जा चुके हैं
मैं उस कूट भाषा के बारे में सोच रही हूं
और शब्दों के बारे में भी
जो कर रहे हैं उसकी पीठ पर सवारी

मैं सोचती हूं हर बार ऐसा ही क्यों होता है
कि ग़रीबों पर चस्पां की जाती हैं चिप्पियाँ पहचान के लिए
जिसके लिए रज़ामंदी उनकी होती नहीं कभी

मैं सोचती हूं अपने दादा-दादी के बारे में
जो अधिकतर लोगों के लिए महज़ शरणार्थी थे
और कुछ के लिए तो
कभी था ही नहीं उनका वजूद भी
खुद अपने आपको वे कहते थे भूमिहीन
मायने इसके कि वे थे वास्तव में बेघरबार
तूफ़ान आने से पहले
भागकर जान बचा सकें वे
नहीं किया गया ऐसा कोई इंतज़ाम तम्बू वगैरह का
क्योंकि अमरीकी लोग तम्बुओं में कब रहते हैं भला?
ये तो होते हैं हाइती, बोलीविया और रवांडा के लोगों के वास्ते
अमरीकी शरणार्थी कब होते हैं भला
बल्कि यह शब्द तो बना ही है बाक़ी बची दुनिया के लिए

अमीर अपने मवेशियों के लिए बनाते हैं जैसे बाड़े
मानवीय गरिमा बची रहे उनकी
इसलिए उन्हें छोड़ना ही उन्हें को लगता है मुनासिब
उनके हैं बच्चे बहुत सारे
उनके होते हैं अकसर हाथ फैले पर पेट खाली
उनकी होती है गिनती भी बहुत
और वे अपने आपको बचाने की फिराक में रहते हैं
प्रकृति के उत्पात से ही नहीं बल्कि आदमी की धन-दौलत से भी

बीच के दौर में अकसर हो जाता है उनका विस्मरण भी
कुछ गिने-चुने हैं जो उन्हें करते हैं याद :
गिनी का अहमद
सेंकता है मेरे लिए सैंडविच और बोलता भी जाता है
तो यही है तुम्हारा अपना देश?

हां भाई, यही है मेरा देश?
और ये ही है सारे के सारे मेरे अपने लोग

उन्हें इस तरह निकाला गया वहां से
जैसे सैनिकों ने बरसाई हों गोलियां उनके ऊपर
और पड़ोसियों ने बचा लिया हो उन्हें
जैसे-तैसे

पर वे हैं कि ज़िद पर अड़े ही हुए हैं

शेष दुनिया भी तो देखे अब
जो दिख रहा है मुझे
यह वक्त नहीं बग़लें झांकने का

बाक़ी बची हुई दुनिया भी रहती है
यहीं इसी अमरीका में !

4 comments:

  1. ये नाम पहली बार सुना . कविता बहुत उम्दा लगी. यदवेंद्र जी को शुक्रिया इस प्रस्तुति के लिए.

    ReplyDelete
  2. यादवेन्द्र जी ,

    कवि सुहिर हम्माद की कविता से परिचित करवाने के लिए शुक्रिया अच्छी लगी उनकी कविता ......!!

    ReplyDelete
  3. Yadvendraji,

    Bahut-bahut badhai! Itne achchhe anuvad ke liye.

    Sukhdeo

    ReplyDelete

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