Wednesday, January 14, 2009

फेदेरिको गार्सिया लोर्का की कविताएं : अनुवाद : शानी / 4


फेदेरिको गार्सिया लोर्का की कविताओं / गीतों के अनुवाद की ये चौथी और अन्तिम किस्त ......... इन सारी कविताओं/गीतों के अनुवादक प्रसिद्ध कथाकार दिवंगत गुलशेर खान शानी हैं और इन अनुवादों की भाषा पर उनकी अपनी एक स्पष्ट और गहरी छाप है।

बर्फ़ के तारे

पहाड़ियां चाहती हैं पानी हो जायें
और पीठ में खोजती हैं वे
टिकने के लिए
सितारे !


बादल

और चाहती हैं पहाड़ियां
निकल आयें उनके पंख
और खोजती हैं वे
बादल
सफ़ेद बुर्राक !



बर्फ़

तारे हो रहे हैं बेपर्द

झरते हैं पठारों पर सितारों के लिबास
ज़रूर आयेंगे तीर्थयात्री
और खोजेंगे आर्तनाद

कल के बुझे हुए अलाव!


सिरफिरा गीत

मां,
चांदी कर दो मुझे !

बेटे,
बहुत सर्द हो जाओगे तुम !

मां,
पानी कर दो मुझे !

बेटे,
जम जाओगे तुम बहुत !

मां,
काढ़ लो न मुझे तकिये पर
कशीदे की तरह !

कशीदा?
हां,
आओ!


सुनहरी लड़की का क़सीदा

तालाब में नहा रही थी
सुनहरी लड़की
और तालाब सोना हो गया

कंपकंपी भर गए उसमें छायादार शाख और शैवाल

और गाती थी कोयल
सफ़ेद पड़ गई लड़की के वास्ते

आयी उजली रात
बदलियां चांदी के गोटों वाली
खल्वाट पहाड़ियों और बदरंग हवा के बीच
लड़की थी भीगी हुई
जल में सफ़ेद
और पानी था दहकता हुआ बेपनाह

फिर आयी ऊषा
हज़ारों चेहरों में
सख़्त और लुके-छिपे
मुंजमिद गजरों के साथ

लड़की आंसू-ही-आंसू शोलों में नहाई
जबकि स्याह पंखों में
रोती थी कोयल

सुनहरी लड़की थी
सफ़ेद बगुली
और तालाब हो गया था सोना !


घुड़सवार का गीत

काली चांदनी में राहज़न के झनझना रहे हैं रकाब

काले घोड़े,
कहां लिए जा रहे हो पीठ पर
मुर्दा असवार?

राहज़न बेजान
कड़े करख़्त रकाब
हाथ से जिसकी छूट चुकी हो लगाम
सर्द घोड़े
फूल गंध चाकू की,
क्या खूब !

काली चांदनी में
मोरिना पर्वतमाला के बाजुओं से
होता है रक्तपात !

कोल घोड़े,
कहां लिए जा रहे हो पीठ पर
मुर्दा असवार?

सर्द घोड़े
फूल गंध चाकू की,
क्या खूब !

काली चांदनी में
चीरती हुई चीख और अलाव की धार

काले घोड़े,
कहां लिए जा रहे हो
अपना
मुर्दा असवार?


काले फ़ाख़्तों का क़सीदा

चम्पा की शाखों के बीच
मैंने देखे दो स्याह फ़ाख़्ते
सूरज था एक
चांद था दूसरा

प्यारे दोस्तो,
कहां है मक़बरा मेरा, मैंने पूछा?
मेरी दुम में, सूर्य ने कहा
हलक़ में मेरे, चांद बोला

और कमर-कमर तक मिट्टी में चलते हुए
मैंने देखे
दो बर्फानी उक़ाब
और एक लड़की निर्वस्त्र !

दोनों थे एक
और लड़की न तो यह थी और न वो

प्यारे उक़ाबो,
कहां है मेरा मक़बरा, मैंने पूछा?
मेरी दुम में, सूर्य ने कहा
हलक़ में मेरे, चांद बोला

चम्पा की शाखों के बीच
मैंने देखे दो फ़ाख़्ते
निर्वस्त्र
दोनों थे एक
और दोनों न तो यह और न वो !

3 comments:

  1. केदारनाथ अग्रवालजी की याद आगयी. कुदरत के खूबसूरत बिम्ब

    आर्द्र बनाकर छोड गया है, जबसे बादल
    पानी के अक्षर रोया है, खडे-खडे चुपचाप पहाड

    ReplyDelete
  2. lorka ko pehli bar is tarah se padha.kya shani ji ne lorka ki anya kavitayen bhi translate ki hai? koi pustak ho to padhna chahoonmga.me yahan minus 20'c par pahad pani baraf badal ko bhog raha hoon.

    ReplyDelete

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