Monday, December 22, 2008

कई लाख वर्ष पहले ही मर चुका था वह नक्षत्र जिसकी चमक देखकर लगाते आए थे हम सुबह होने का अनुमान


अनुनाद में यह अनिल का दूसरा अनुवाद है जिसे वीरेन डंगवाल की कविता की पंक्तियों का शीर्षक मैंने दिया है। 3 साल पहले बी० एच ० यू० में अनिल से एक मुलाकात हुई थी। उसकी स्मृति मेरे मन में है। यह अनुवाद युवा कवि और आलोचक व्योमेश शुक्ल ने उपलब्ध कराया - उनका आभार, यदि वे लें तो !


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आठ मार्च 2007 को इतिहासबोध पत्रिका इलाहाबाद द्वारा आयोजित संगोष्ठी में दिया गया उद्‍बोधन.
-------------------------------------------------------------------------------------मुझे समाजवाद के भविष्य पर बोलने के लिये कहा गया है. मैं यहाँ जो कुछ भी कहने जा रहा हूँ वह मेरी हालिया ही प्रकाशित पुस्तक ' क्राइसिस आफ सोशलिज्म - नोट्स आन डिफ़ेंस आफ़ ए कमिट्मेंट' पर आधारित होगा और अपने पक्ष में उन्हें विस्तार से स्पष्ट करने के लिये इस पुस्तक में संकलित उद्धरणों को उद्धृत करूँगा. इस प्रश्न को मैं अपने उद्बोधन के चार अलग लेकिन अंतर्संबंधित खंडों में स्पष्ट करने जा रहा हूँ.


छ्ठवें दशक के अंत के मजबूत व विद्रोही दिनों , में पेरिस के छात्रों ने उस हर व्यक्ति जो उन्हे संबोधित करता था, से सवाल किया और कहा कि पहले वह यह बतायें कि " उनके बोलने का प्रस्थान बिंदु क्या है? (अर्थात् आप बोल कहाँ से रहे हैं?) प्रत्येक वक्ता एक विशिष्ट दार्शनिक राजनीतिक जग़ह के केन्द्र से बोलता था तथा इसके लिये उन्होनें सार्वजनिक तौर पर अपने
श्रोताओं का आभार माना. यहाँ यह बताना एकदम उपयुक्त होगा कि मैं मार्क्सवाद के पक्ष में खडे़ होकर बोल रहा हूँ, ऐसा मार्क्सवाद जिसे मैं समझता हूँ. जिस मार्क्सवाद में मुझे खुद के पारंगत होने का कोई मिथ्याभिमान नही है. मैने इसे कई तरीकों से सीखा और न सिर्फ़ मैने इसे अपनि राजनीति अथवा अध्यापक के पेशे के रूप में, बल्कि अपने जीवन और जीने
के तरीके में उपयोगी पाया. यह अंतिम बात सिर्फ औपचारिक उद्बोधन नहीं है. मार्क्स को जानना, अपने जीवन में आपने क्या मूल्य बनाया, इसे कैसे समझा, जीने और दुनिया में कैसा व्यवहार कियाआदि के बारे में अंतर पैदा करता है. जार्ज बर्नाड शा ने कैसे एक बार कहा था कि " निश्चित तौर पर मुझे यह स्वीकार करना चाहिये कि कार्ल मार्क्स ने मुझे एक इंसान बनाया." अतः मार्क्स मेरे लिये महत्वपूर्ण हैं और मुझे लगता है कि अन्य किसी नहीं बल्कि इस कारण से कि आज पहले से भी कहीं ज्यादा वह हम सभी के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं, कि आज हम जिस दिनिया में रह रहे हैं वह पूँजीवादी है. सोवियत संघ के विघटन के बाद यह दुनिया पहले से कहीं ज्यादा पूँजीवादी है, तथा मार्क्स नें किसी और मनुष्य से ज्यादा, तब और अब भी, अपना सारा जीवन इस दुनिया के वास्तविकता की व्याख्या करने में समर्पित किया है तथा उनकी उपलब्धियाँ अभी भी अद्वितीय हैं. एक अर्थ में, समाजवाद के बारे में मैं यहाँ जो कुछ भी बोलने जा रहा हूँ, अपनी बेहतर समझ के साथ, वह ऐतिहासिक रूप से ज़रूरी तथा पूँजीवाद का संभाव्य नकार है.

आज समाजवाद के बारे में कोई विचार विमर्श, कम से कम इसके सभी भविष्य सहित, भूतपूर्व सोवियत संघ में जो कुछ घटित हुआ उसे छोड़कर नहीं हो सकता. हमने यहाँ जो कुछ भी देखा, जैसा कि मैनें अपनी पुस्तक में विस्तार से उल्लेख किया है, वह एक असफ़ल क्रांतिकारी प्रयोग था; जिसका निर्माण किया गया था वह एक शिकायती विकृत समाजवाद था. और एक अंतिम संकट तथा वर्गीय शोषक तंत्र के विरुद्ध वर्गहीन पीढी़ के विध्वंस से उसका पूरी तरह पतन हो गया जो ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा वर्ग विश्‍लेषण की मार्क्सवादी व्याख्या पद्धति के अनुसार पूरी तरह अनुकूल ही है. दूसरे शब्दों में, सोवियत संघ में जो असफल हुआ वह समाजवाद नहीं बल्कि समाजवाद के नाम पर निर्मित एक तंत्र था. इस विशय पर विमर्श करने के लिये मेरे पास यहाँ समय नहीं है. मैं अभी इस बात पर जोर देना चाहुंगा कि समाजवादियों को यह समझने की जरूरत है कि भूतपूर्व सोवियत संघ में ऐसा क्यों और कैसे हुआ? इसके क्रियान्वयन में क्या कुछ घटित हुआ?

निश्चित तौर पर उन समाजवादियों के लिये जो बगैर पूँजीवाद मे भविष्य की इच्छा रखते हैं, यह समझना बेहद जरूरी है कि सोवियत संघ में समाजवाद के रूप में क्या निर्मित हुआ, क्या घटित हुआ तथा क्या असफल हुआ? उन्हें इस असफलता के मूल्य तथा परिणामों के महत्व को समझना चाहिये, वास्तविक आस्तित्वमान समाजवाद, जैसा कि हमने पहले ही बताया है तथा कुछ लोगों के अनुसार, यह सत्तावादी समाजवाद का विध्वंस था. यद्यपि उन्हें वास्तविक आस्तित्वमान पूँजीवाद या तानाशाही/सत्‍तावादी पूँजीवाद के मूल्य तथा परिणामों का भी ध्यान रखना चाहिये जिसने टुकड़ों में पलने के लिए विवश कर
दिया. समाजवादी तथा पूँजीवादी दुनिया के बीच दुनिया के बीच की प्रतिद्वंदिता के रूप में हमारे समय में होने वाले 'समाजवाद के लिये संघर्ष को निश्चित तौर पर गलत ढंग से देखा गया है, जैसे कि १९१७ के बाद के काल के आधिकारिक मार्क्सवाद के साथ हुआ. यह हमेशा से ही कुछ कम या अधिक कई अन्य मोर्चों के साथ एक अंतरराष्ट्रीय वर्ग संघर्ष था. वास्तविक समाजवाद के आस्तित्व वाले देश अपने अंत तक इस संघर्ष का केवल एक मोर्चा थे, जिन्होंने इस संघर्ष की स्थितियों को, नकारात्मक साथ ही साथ सकारात्मक तौर पर मजबूत या प्रभावित किया. लेकिन इन्होंने इसके परिणामों के प्रश्न को निर्धारित या प्रभावित नहीं किया. इन देशों के वर्तमान विध्वंस ने अथवा पूँजीवादी खेमों मे इनकी वापासी ने किसी भी रूप में समाजवाद के भविष्य के सवाल को निर्धारित नहीं किया है, यह संघर्ष अभी भी जारी है और पूँजीवाद के खात्मे तक जारी रहेगा. तथापि इस देशों ने जो स्थापित किआ था वह कई में अंतरराष्ट्रीय वर्ग संघर्ष का महत्वपूर्ण मोर्चा था तथा उनके विध्वंस की माग है कि समाजवादी इनकी स्थितियों/दशाओं को समझें. यदि वे एक विकृत तथा पतित समाजवाद के बोझ को ढोने तथा इसकी कुरूपता और निर्दयता की जवाबदारी की जरूरत नहीं समझते तो इसके विध्वंस की वास्तविक मार्क्सवादी व्याख्या का भार उनके द्वारा अभी भी उठाना है ताकि हमारी जनता सच जान सके तथा भविष्य के संघर्ष के लिये सही सबक सीख सके.इस व्याख्या की जरूरत हमें सिर्फ़ यह सीखने के लिये नही है कि जो कुछ हुआ उसमें क्या सही और क्या गलत है बल्कि इसलिये और भी ज्यादा है क्योंकि हमारी व्याख्या की अनुपस्थिति में, उनकी, दुश्मनों की व्याख्या का प्रचलन जारी रहेगा और वह यह कि 'समाजवाद का पतन हो गया'. इससे भी ज्यादा हमें उनको अपना इतिहास छीन लेने से रोकने की आवश्यकता है. पूँजीवादी विचारकों ने यद्यपि 'समाजवाद के खात्मे ' की घोषणा कर दिया है और उत्तरआधुनिकतावादी तो यहाँ तक कि इतिहास से सीखने की क्षमता से ही इंकार करते हैं, अक्टूबर का चित्रण करने में व्यस्त हैं. जनता की उपलब्धियों के एक
पूरे युग में जो कुछ हुआ वह इतिहास में और कुछ नहीं बल्कि एक मंहगा विचलन था. वास्तव में , आज हमें अपने इतिहास का बचाव या उस पर पुनः दावा करना,सोवियत संघ में जो कुछ हुआ उसके मूल्यांकन करना हमारे लिये अपने आप में
एक क्रांतिकारी प्रोजेक्ट है.

अपने अतीत से हमें हमेशा ही एक दुःखदायी पाठ सीखना चाहिये. वास्तविकता का सामना करना तथा वाम की जरूरी राजनीति और संस्कृति का पुनर्निर्माण करना अतंत आवश्यक है लेकिन इस बारे में बेहतर संतुलन होना भी बराबर जरूरी है.दूसरे शब्दों में यह जानने की भी जरूरत है यह अतीत पूरी तरह से दुःखभरी विरासत नही है.हमें इस मूल्यांकन या आत्मपरीक्षण में नहाने की कठौती से बच्चे को ही बाहर नहीं फेंक देना चाहिये. सोवियत संघ के अनुभवों का मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन, इतिहास में समाजवाद तथा इसके साथ जुडे़ हुये संपूर्ण कम्युनिस्ट आंदोलन, भले ही इसके द्वारा नेतृत्व अथवा पथप्रदर्शन किया गया हो, के प्रथम प्रयोग के असफलता की पराकाष्ठा स्वभावतः सभी जगह के समाजवादियों के लिये महत्वपूर्ण है, चाहे वह उत्तर हो या दक्षिण. लेकिन विशेषकर जिन्हें इन अनुभवों के अध्यायों से सीखने की जरूरत है वे हैं नेता तथा इससे भी ज्यादा
कम्युनिस्ट पार्टियों के जुझारू कैडर, जिनके लिये सोवियत संघ संदर्भ तथा पहचान का निर्णायक बिंदु था तथा जहाँ बाद के समय में कई विभेद पैदा हो गये थे.पश्चिम में , मार्क्सवाद में ही सोवियत संघ के विघटन तथा इससे जुडी़ समस्याओं के जवाब तलाशने की अनिच्छुक और अक्षम इन अधिकतर पार्टियों ने साधारणतया समाजवादी प्रोजेक्‍ट का परित्याग कर सामजिक जनवादी रास्ता पकड़ लिया है. अन्य जगहों, विशेषकर तीसरे देशों में हलाँकि औपचारिक कम्युनिस्ट बचे रहे लेकिन जो कुछ भी घटित हुआ उससे भ्रमित तथा विमुख होकर रह गये, आधिकारिक मार्क्सवाद की रूढि़यों का उन्मूलन करने में अक्षम रहे.
इन सब का आरोप ख्रुश्चेवी संशोधनवाद, गोर्बाचोव के विश्‍वासघात अथवा अमरीकी साम्राज्यवाद तथा सीआईए की गुप्त कार्ययोजनाओं पर मढ़ते रहे. यहां तक कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट संरचनायें, अथवा चीनी प्रतिरूप के पुराने ढर्रों पर चलने वाले लोग भी कमोबेश इसी सरलीकृत तथा छिछली समझ से परे जाने में असफल रहे. जब तक समाजवाद के विध्वंस तथा इसके संकट को समझा नहीं जाता तथा इस समझ को पूरे सवालों पर पुनर्विचार के लिये नहीं लागू किया जाता,आंदोलन में अतिवामपंथी तथा लंबे समय से मौजूद सुधारवादी ताकतों को वास्तविक रचनात्मक मार्क्सवाद से बदाने का कोई मौका नहीं है. अतीत में मौजूद गतिकी के कारण यह कम्युनिस्ट पार्टियाँ बची रहेंगी लेकिन पुराने नेताओं एवं पहले के संघर्ष व उपलब्धियों से प्राप्त विश्‍वसनीयता के खत्म होते जाने तथा नयी क्रांतिकारी भर्तियों की असफलता से वह सिर्फ़ अवरुद्ध होकर रह जायेंगी अथवा अर्थवादी अभ्यासों के सहारे चलकर चुनावी सुधार तथा यहाँ तक कि वर्तमान पूँजीवादी वैश्‍वीकरण के साथ सामंजस्य करके लगातार नीचे गिरती जायेंगी. मार्क्सवादी लेनिनवादी या माओवादी शक्तियाँ अपनी क्रांतिकारी प्रतिबद्धताओं का निर्वहन करते हुये भी सीमित क्षेत्र में एक दूसरे से लड़ते झगड़ते तथा अलग थलग पड़ते हुये संकुचित आंदोलन के रूप मे रही
आयेंगी. कम्युनिस्ट नाम के बावजूद यह पार्टियां तथा संरचनायें पुनः मजबूत होने तथा समाजवाद के लिये एक प्रभावी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने का मौका गँवा रही हैं. तीसरी दुनिया के समाजवादियों, जो अपने आप को कम्युनिस्ट कहते हैं उन्हें मिलाकर, के लिए सोवियत अनुभव निरपवाद रूप से अतिरिक्‍त महत्व रखता है. क्लासिकल मार्क्सवाद, उन्नत पूँजीवादी देशों तथा अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर समाजवाद के निर्माण के संदर्भ सहित, कुछ सामान्य सिद्धांतों को छोड़कर कम-अधिक रूसी बोल्शेविकों के संपूर्ण बगैर घोषित सीमा क्षेत्रों, अर्थात अंतरराष्ट्रीय प्रभुत्वशाली पूँजीवाद के सबसे उन्नत देशों के निरंतर शत्रुतापूर्ण रुख के बीच किसी पिछडे़ देश में समाजवाद के लिये संघर्ष,में अप्रत्याशित स्थापना यात्रा जैसा ही है.वहाँ कुछ अग्रणी प्रयास हुये.अतः वस्तुगत परिस्थितियों की ताकतें, इस अभूतपूर्व कार्यभार के लिये सिद्धांत तथा व्यवहार की अपर्याप्तताओं के साथ इसके पतन के कारणों सहित सोवियत अनुभव, रूस तथा अन्य गरीब और पिछडे़ देशों के क्रांतिकारियों को
अमूल्य सबक सिखाते हैं. विशेष तौर पर इस नवीन वैश्विक पूँजीवाद के प्रभुत्व के दौर में एक बेहतर, जरूरी समाजवाद के लिये तथा खुद के निर्माण के लिये भी...........

भूतपूर्व सोवियत संघ में जो कुछ भी हुआ वह, मार्क्स के तर्कों के आधार पर, पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे के समाजवादी नकार की संभाव्यता तथा जरूरत के लिए किसी भी रूप में अवैधानिक नही है। और अब समाजवाद लिये संघर्ष सिर्फ़ पहले से कहीं ज्यादा कठिन और जटिल दिशा की ओर मुड़ गया है. समाजवादी शायद इस भ्रम में कभी नहीं रहे कि समाजवाद के लिये होने वाला संघर्ष सरल अथवा तुरंत सफल हो जाने वाले अभियान की तरह है. पहली असफलता के बाद अब यह पहले से कहीं बहुत अधिक कठिन होगा, अगली बार समाजवाद को लंबा चक्करदार रास्ता तय करना होगा. लेकिन इस संदर्भ में निराशा महसूस करने का कोई कारण नही है. पिछले कुछ वर्षों की तुलना मे भौतिक परिस्थितियाँ आज ज्यादा उपयुक्‍त तथा आत्मगत ज़रूरत/दबाव अधिक मजबूत हैं. और समाजवादी उद्देश्यों का प्रभाव क्षेत्र तभी बढ़ सकता है जबकि पूँजीवाद की, खुद से उत्पन्न संकटों का समाधान करने की, असमर्थता बढ़ती जायेगी.......!

यह एक वैधानिक तर्क है कि पाले समाजवाद के लिए आंदोलन बढ़ने के जो कारण थे आज, बल्कि पिछली शताब्दी के प्रारंभ अथवा पहले अन्य किसी समय से ज्यादा, इस सदी के प्रारंभ में और मज़बूत हैं. सामाजिक जीवन के संगठन में पूँजीवाद अभी भी शोषक और पर्यावरणीय विध्वंस का रास्ता है. क्षणिक विजयी पूँजीवाद उन्हीं ढाँचागत दबावों/मजबूरियों के तहत, पहले जैसे ही विध्वंसक परिणामों को उत्पन्न कर संचालित हो रहा है.यह अभी भी संकटों से घिरा हुआ है तथा अपनी अति विशाल/अनोखी उत्पादन क्षमता के बावजूद, मानव समुदाय की ज़रूरतों के लिए, यहाँ तक कि अपने प्रभुत्व की दुनिया में व्यापक आबादी को जीने-खाने तक की सुविधा मुहैया कराने के लिए , अपनी उपलधियों को सौंपने में जन्मजात तौर पर अक्षम है. अपने वर्तमान चरम उत्कर्ष के बावज़ूद, पूँजीवाद शताब्दियों से मौजूद एक भी समस्या का समाधान नहीं कर सका. और उसने समाजवादी इच्छाओं व संघर्षों का आधा-अधूरा ही सही भरण पोषण किया. समाजवाद के विश्‍वव्यापी संक्रमण का तर्क आज भी पहले से कहीं ज़्यादा उपयुक्‍त बना हुआ है.

सोवियत संघ के विघटन ने इस तर्क में किसी भी तरह का कोई परिवर्तन नही लाया है, सिवाय इसके कि आर्थिक तौर पर शोषक, नैतिक रुप से घृणास्पद तथा पर्यावरण के लिए गैरटिकाऊ चरित्र का पूँजीवाद अब इतिहास के किसी भी समय से ज़्यादा नंगा हुआ है.......

वर्तमान प्रभुत्वशाली पूँजीवाद के विरोध मे समाजवादी विपक्ष के पुनर्निर्माण के लिए आत्मगत स्थितियाँ तथा व्यक्तिगत व जनसंगठन के स्तर पर मौजूद भ्रूणावस्था की वस्तुगत स्थितियाँ आज ज़्यादा आस्तित्वमान हैं.पश्चिम में 'कोई विकल्प नहीं' की खुशफ़हमी अब जा चुकी है. अतीत में इसी तरह की कई घोषणाओं सहित 'इतिहास के अंत' की बचकाना घोषणा मजबूती से अस्वीकृत कर दी गयी है. दीर्घ अवधि में जनता सोचती है कि कल्याणकारी पूँजीवाद प्रतिनिधिक नहीं, बल्कि वह जिस कठोर यथार्थ का अनुभव कर रही है वह प्रतिनिधिक है. लोग पूँजीवाद वास्तव में है क्या इसे कटोरता से सीख रहे हैं. वैश्‍विक पूँजीवाद, वैश्‍वीकरण तथा अमरीका के नये वर्चस्व के विनाशकारी हृदयस्थल में लोग पूँजीवाद, साम्राज्यवाद तथा अपने ही शासकवर्ग की दलाली के बारे में नया पाठ सीख रहे हैं. विकल्प का सवाल फिर एजेंडे में आ गया है तथा यद्यपि दिग्भ्रमित अथवा छितराये तरीके से ही, पूंजीवाद विरोधी संघर्ष दुनिया के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न तरीकों तथा आकारों में जारी है. ये संघर्ष पिछली शताब्दी का जस का तस दुहराव नहीं चाहते.

हमें बताया गया है कि ''इतिहास अपने आप को नहीं दुहराता'' लेकिन मार्क्स ने कहा है कि 'इतिहास हमसे ज़्यादा कल्पनाशील होता है'. इतिहास निश्चित तौर पर आश्चर्य चकित करता है- और शोषितों तथा दमितों द्वारा क्रांतियां उनमें से एक है......सशस्त्र संघर्ष अथवा व्यापक विद्रोह का उभार ही क्रांतियां नहीं होते, यद्यपि इनकी जरूरत को इंकार नहीं किया जा सकता। यह क्रांति को इतिहास के एक खास क्षण जैसे विंटर पैलेस पर कब्ज़ा या बास्तील के तूफान जैसे एक निश्चित प्रतिबिंब की तरह देखने में कोई मदद नहीं करते। क्रांति,पूंजीवादी लोकतंत्र के शासनकाल में खुद की विशिष्‍ट जटिलताओं के साथ, एक
जटिल प्रक्रिया के रूप में बेहतर ढंग से समझी जा सकती है। और जहां तक हम इसे समझते हैं वह यह कि भविष्‍य की क्रांतियों के व्यवहारिक तथा सैद्धांतिक रूपों के बारे में अनुमान नही लगा सकते। और हम यह आश्‍चर्य जानते हैं कि इतिहास का उतार-चढा़व हमें बीसवीं सदी में ले गया है। और इस बारे में संदेह का कोई आधार नहीं है कि यह और ज़्यादा हमें ले जायेगा। विद्रोह में जनता की आविष्कारिता किसी भी संवेदनशील विद्वान या दार्शनिक की कल्पना के परे रही है और यह जारी रहेगी......

क्रांति अभी पूरी नहीं हुई है. वर्गों के बीच, शोषित और शोषकों के बीच,नये और पुराने सामाजिक ढाँचे के बीच मूलभूत तनाव इसलिए नहीं ख़त्म हो जायेंगे कि सोवियत संघ खतम हो गया और फ़ूकोयामा ने उद्‍घोषणा किया है कि 'इतिहास का अंत' हो गया. बीसवीं सदी की क्रंतियों में गतिशीलता तथा ताकत पैदा करने वाली ताकतें, जिस तरह पहले थीं आज भी है. 'ऐतिहासिक कम्युनिज़्म' के अंत से गरीबी अथवा न्याय के लिए लोगों की तड़प का अंत नहीं हुआ है. तीसरी दुनिया के गरीब तथा वंचित लोग अभी भी बेहतर जीवन की उम्मीद रखते हैं. अतीत या भविष्‍य में क्रांतियों के बारे में किसी अतिउत्साह के बगैर फ़्रेड हालिडे ने अपने हाल ही के अध्ययन में बताया है कि 'सत्ताधारी और धनी लोगों द्वारा अपने खिलाफ नफ़रत तथा इतिहास की क्षमता को पूरी तरह से समझने की लगातार अक्षमता बेहद आश्‍चर्यजनक है'. उन्होंने लिखा है कि "आधुनिक इतिहास में क्रांति का एजेंडा अभी भी हमारे साथ है क्योंकि जो उद्देश्य रखे गये थे वह अभी भी पहुँच से बहुत दूर हैं, यह अभी भी क्रांति को इतिहास के एजेंडे में रखे हुए है. क्रांति अभी भी ध्रुव सत्य है, हमारे समय की अधूरी कहानी-यह कहानी चाहे जिस आकार अथवा रूप मे हो और चाहे जितना भी लंबा समय लगे, यह कहानी पूरी कही जायेगी......यह कहानी पहले भी दुनिया की क्रांतिकारी प्रक्रियाओं में कही गयी है और सोवियत संघ में असफल प्रयोग के फलस्वरूप प्रारंभिक धक्कों के बाद,समाजवाद मनुष्यता की जरूरत तथा संभावित भविष्य के रूप में दुबारा स्थापित हो रहा है. जैसे कि बोलिवियाई अपनी क्रांति की रक्षा के लिए अमरीकन साम्राज्यवादियों तथा इसके स्थानीय सहयोगियों द्वार संसदेतर प्रतिबंधों के षड्‍यंत्र के खिलाफ संघर्ष में मजबूती से डंटे हैं, वेनेजुलियाई '२१वी सदी में समाजवाद' के निर्माण की बात कर रहे हैं तथा क्युबा से प्रेरित
होकर पूरे लैटिन अमरीका में 'गुलाबी' की जगह 'लाल' के आ जाने का खतरा महसूस हो रहा है. नेपाल में जनयुद्ध के लिए लड़ रहे तथा अब लोकतंत्र के युद्ध को जीतने के लिए संघर्षरत माओवादी 'समाजवाद की ओर ले जाने वाले'आत्मनिर्भर विकास की बात कर रहे हैं. पश्चिम में वैश्वीकरण के विरुद्ध संघर्ष और गहरा रहा है जैसा कि 'न्यू यार्कर' ने 'इसे कार्ल मार्क्स की वापसी' लिखा है तथा यूरोप में समाजवाद के नए प्रयोग की बात सुनी जा रही है. कभी भी संकीर्ण वर्गीय प्रोजेक्‍ट में न रहने वाला समाजवाद आज, जैसा कि पहले कभी नहीं था, कम्युनिस्ट घोषणापत्र में किए गए मार्क्स के दावे के अनुसार 'व्यापक लोगों के हित में व्यापक आंदोलन' के रूप में मजबूती से खडा़ है.

पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ के विघटन ने कई विद्वानों, पत्रकारों,राजनेताओं, तमाम तरह के विचारकों तथा लेखकों को आसान खेल खेलने का खुला मौका दे दिया है. अगर समाजवाद परास्त हो गया तो इसका प्रतिद्वंदी पूंजीवाद जीत गया. योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्थायें अगर टूट बिखर गईं तो उसका धुर विरोधी, मुक्‍त बाजार आधारित पूंजीवाद जरूर विजयी हुआ है. इस तरह के पूरे अपचयनवादी तथा खतरनाक तथा बिल्कुल ही संदेहपूर्ण तर्क, जो सोवियत संघ में जो कुछ हुआ उसे ही समाजवाद के बराबर मानते हैं तथा इसकी असफलता को पूंजीवाद के विजय से जोड़ते हैं, न सिर्फ़ कमजोर हैं बल्कि
व्यवहारिकता के धरातल पर बिल्कुल गलत हैं. किसी वस्तुगत मूल्यांकन से स्पष्ट है कि पांच सदियों के पुराने आस्तित्व के अंत तक वैश्विक पूंजीवाद आज सबसे पतित व्यवस्था है. इस पतन के प्रमाण, समकालीन पूंजीवादी विश्‍व के प्रत्येक भाग तथा प्रत्येक पहलू में बिल्कुल आसानी से देखने को मिल रहे हैं. दुनिया में हर जगह बढ़ रही दरिद्रता और दुर्दशा में यह लक्षण
देखे जा सकते हैं, बढ़ती बेरोजगारी दर के आधिकारिक आंकड़ों, गरीबी,बेघरपना तथा भूख में, पश्‍चिमी बुर्जुवा लोकतंत्रों के बडे़ शहरों की नारकीय झोपड़पट्टियों में, भूतपूर्व सोवियत खण्‍डों की फुदकी राजधनियों में शहरी घेट्टों की विशाल बढ़ोत्तरी में तथा दक्षिणी क्षेत्रों में व्यापक तौर पर झोपड़पट्टियों की संकीर्ण गलियों के अचानक ढहाए जाने में; दुनिया की संपूर्ण असमानताओं में, निर्धनों की दरिद्रता में तथा धनी पश्‍चिमी समाजों और गरीब देशों की व्यापक जनता की बदहाली के बीच बढ़ती खाई में; पूंजीवाद द्वारा हर जगह पैदा की गई नैतिक रुप ने असहनीय तथा सामाजिक रूप से गैरजरूरी पीडा़ में, जिसे बोर्दिये ने- ला मिज़रे द मोंद कहा है.........

वास्तविक आस्तित्वमान समाजवाद- जो मार्क्स का समाजवाद नहीं था और जिसकी संभावनायें अभी खुली हुई हैं- शायद असफल हो गगा है. लेकिन वास्तविक आस्तित्वमान पूंजीवाद- जो पूंजीवाद का मात्र एक ही संभावित प्रकार है- निश्‍चित तौर पर जिस तरह से बना था उसी तरह से नहीं सफल हो सका है. किसी भी व्यवहारिक निर्णय में पूंजीवाद हमारे समय में सबसे अधिक पतित है. एक और बात कि, पूंजीवाद उपलब्धियों के आकलन के सर्वाधिक वैधानिक कसौटी की सामाजिक व्यवस्था के रूप में; समाज में उपलब्ध वास्तविक तथा क्षमतावान संसाधनों द्वारा 'रोजगार की संपूर्णता' तथा 'रोजगार की अच्छाई' के संदर्भ में एक संभावना के बतौर पूरी तरह असफल हो चुका है. मानव इतिहास में इसके पहले समाज की उत्पादन संभावना तथा समाज की प्रगति/उपलब्धियों के बीच इतना विशाल अंतर कभी नहीं रहा जितना कि आज के पूंजीवाद के विकास की वर्तमान अवस्था में है. इस बात के साक्ष्य हैं कि तीन सफल औद्योगिक क्रांतियों की असाधारण उत्पादन क्षमता ने मनुष्यता का परित्याग कर दिया है तथा गरीबी और अशिक्षा, मैली कुचली झोपड़पट्टियों तथा पूंजीवादी विश्व के सबसे धनी
देशों के लाखों से ज्यादा परिवारों तथा तीसरी दुनिया के गरीब देशों की परिधि तथा अर्धपरिधि में सिकुडी़ झोपड़ियों में भूख तथा दुर्दशा नें हज़ारों लाखों लोगों के जीवन को व्यर्थ बनाकर छोड़ दिया है. आज हमारे समय में तीसरी दुनिया निश्‍चित तौर पर पूंजीवाद के पतन का प्रतीक है........

जैसा कि पहले ही इशारा किया गया है कि इस दो असफलताओं के बीच एक अंतर है जिसे विशेष तौर पर ध्यान देना चहिए. समाजवाद कुछ समय के लिए असफल हुआ है लेकिन फिर भी मानवता को बचाए रखने तथा एक सुरक्षित दुनिया की आशा में तथा मानव जाति के जीवन मूल्य के लिए एक विकल्प के रूप में यह बचा हुआ है. इसे दोहराने की जरूरत है कि पूंजीवाद के अस्वीकार्य आर्थिक, नैतिक तथा पर्यावरणीय परिणाम, अपने यहां तथा विदेशों मे भी बर्बरता की ओर ले जाने वाली बेरोजगारी, गरीबी, असमानता को रोकने में असफलता, व्यवस्था का भटकाव या विशेष परिस्थितियों अथवा 'गलत' नीतियों द्वारा उत्पन्न 'नकारात्मक'प्रभाव नहीं है. यह सब पूंजीवाद के न सुधरने वाले तथा अनियंत्रित तंत्रजनित अथवा ढांचागत तर्क खुद व्यवस्था में निहीत शोषण तथा ध्रुवीकरण के तर्क के उत्पाद हैं. अतः ये प्रभाव, यद्यपि एक निश्‍चित दौर में कम होने तथा अन्य में बढ़ने के बावजूद, स्थायी हैं. इसलिए ये जरूरी रूप से ही असाध्य हैं. दुसरे शब्दों में हमारे समय में पूंजीवाद का पतन अपने लिए एक व्यवस्थित या संरचनागत जरूरत अथवा अपरिहार्यता लिए हुए है. बदले में,सोवियत संघ में समाजवाद की असफलता कोई व्यवस्थाजनित य संरचनागत मजबूरी नहीं लिए हुए थी. राजनीति निर्देशित अर्थव्यवस्था के कारण समाजवाद में,साधारणतया बाजार आधारित पूंजीवाद जैसे कोई ढांचागत तर्क अथवा 'कानून'नहीं होते. समाजवाद प्राथमिक रूप से सिद्धांत तथा व्यवहार के बीच त्रुटियों, सत्ता में रहते हुए कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा गलत चुनाव कॆ कारण असफल हुआ. कम्युनिस्ट सत्ताओं (तथा यूरोप में सामजिक जनवादियों) की असफलता के प्रसंग में गैब्रियल कोल्को ने लिखा है कि "ऐसी स्थितियों में होते हुए भी समाज को मुक्‍त करने तथा उसके महत्वपूर्ण (साथ ही साथ स्थायी) ढंग से रूपांतरण करने में असफलता, उनकी विश्लेषणात्मक अक्षमता तथा ठहराव; उनके नेताओं तथा संगठन की सतत कमजोरी का प्रमाण है. यह वह यथार्थ है जिसने १९१४ के बाद अनगिनत देशों में सामाजिक जनवादी तथा साम्यावाद दोनों का सीमांतीकरण कर दिया जिसने पूंजीपति वर्ग तथा उसके सहयोगियों को, जो समाजवादी सत्ता द्वारा अपने कार्यक्रमों में सुधारों के छोटे हिस्सों के क्रियान्वयन के बगैर कभी भी जीवित नहीं रह सकते थे, सदियों की समस्या से मोहलत प्रदान कर दिया. जबकि इसने दूसरी तरह से लाठी को बहुत दूर झुका दिया लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि समाजवाद की असफलता निश्‍चित तौर पर एक मानवीय असफलता थी जो कि इसके बारे में कुछ भी अपरिहार्य नहीं था. अगली बार जब कहीं और जब कभी कोई प्रयास किया जायेगा इस असफलता द्वारा सीखे गए सबक मदद करेंगे. इसलिए समाजवाद पूंजीवाद का न सिर्फ एक मात्र विकल्प है बल्कि मानवता के लिए यह एक वास्तविक पसंद हैं....

सोवियत संघ में जैसा समाजवाद निर्मित किया गया था वह असफल हो गया. अन्य जगहों पर पूंजीवाद भी पतित हो गया है. समाजवाद, जिसको कि हम जानते हैं तथा पूंजीवाद ,जिस तरह आस्तित्वमान है दोनों कि हमारे समय में असफलता
स्पष्‍ट करती है कि पूंजीवाद से समाजवाद/साम्यवाद में संक्रमण के मामले में महायुगीन संक्रमण की समस्या और समाजवाद के भविष्‍य के सवाल को हम अच्छी तरह समझ सकते हैं. दूसरे शब्दों में, हम ऐसी स्थिति में हैं जहां पुराना अपनी सकारात्मक संभावनाओं को समेटे है तह्ता नए में जन्म से ही कुछ समस्याएं होगीं. एक दूसरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ग्राम्शी ने लिखा है कि 'पुराना अपनी मौत मर रहा है और नवीन जन्म नहीं ले रहा है; इस अराजक काल में बडे़ विकृत किस्म के लक्षण दिखाई दे रहे हैं'. यह विकृत लक्षण हैं, आज के सभी उन्नत तथा कम उन्नत पूंजीवादी देशों में, पूंजीवादी सभ्यता के किसी गहरे संकट से ज्यादा, आज हमारे समय में पूंजीवाद के अनिवार्य पतन के, कम या आधिक मात्रा में, लक्षण दिखाई दे रहे हैं.......

आज हम जो कुछ देख रहे हैं वह एक युग का अंत है, पूंजीवाद से संक्रमण का युग. एक असमान दुनिया के गठन और पुनर्गठन के केंद्र के रूप में पूंजीवाद के विस्तार के इन पांच सौ विषम वर्षों में, आर्थिक मजबूती और लाभ कि परिधि तथा अर्धपरिधि के संदर्भ में पूंजीवाद अपने स्थायी अंतर्विरोधों को दबाने में सक्षम था लेकिन यह सब भविष्य में अपनी जीत के लिए स्थितियों को बदतर बनाए बिना नहीं हो सकता था. अब आगे की विस्तार की संभावना के धीरे धीरे खतम होने के साथ ही इस अंतर्विरोधों को पहले जैसे दबाना कठिन है.लोगों के लिए वास्तविक विध्वंसक परिणामों के साथ अधिक आक्रामक हो कर वे जो घोषणाएं कर रहे हैं वह खुद पूंजीवाद के वर्चस्व के युग को दर्शाती हैं. अपने सबसे अच्छे दिनों में भी पूंजीवाद, शुम्पीटर के प्रसिद्ध मुहावरे का प्रयोग करें तो 'रचनात्मक विध्वंस' की एक प्रक्रिया है.जैसे ही पूंजी में बढो़त्तरी होती हैं,प्रतियोगी शक्‍तियों को जीवित रहने के लिए प्रतियोगी होना पड़ता है तथा जो रचनात्मक नहीं हो पाते विध्वंस को अंजाम
देते हैं. बाजार तथा प्रतियोगिता की दुकान में विजेता, पराजितों से प्रतिद्वंदिता करते हैं तथा रचना तथा विध्वंस एक तथा एक समान हो जाते हैं. पराजित, यद्यपि वैयक्‍तिक इकाई या निरपेक्षतः अकुशल नहीं होते. वास्तविक दुनिया में पराजित जनता होती है और कई बार पूंजीपति भी हो सकते हैं लेकिन व्यक्तिगत और सामुदायिक तौर पर अक्सर श्रमिक लोग ही होते हैं.
'रचनात्मक विध्वंस' का मतलब है- वास्तविक श्रमिकों की बेरोजगारी,समुदायों की निराश्रयता, पर्यावरण का विनाश तथा जनता की शक्‍तिहीनता. पूंजीवाद के रचनात्मक विध्वंस का का विनाशकारी पहलू अब ऐसे बिंदु पर पहुंच गया है ऐतिहासिक 'रेजन दि एत्रे' तथा बतौर उत्पादन प्रणाली के पूंजीवाद की न्यायसंगतता एकबारगी खत्म हो गई है तथा अब हम वैधानिक तौर पर यह कह सकते हैं कि पूंजीवाद अपने समय से ज्यादा, अपनी ऐतिहासिक वैधानिकता के काल से ज्यादा समय तक जीवित है. पूंजीवाद की उपलब्धियां अब पूरी तरह से अतीत की हो चुकी हैं और इसका भविष्य सिर्फ मानवता के विध्वंस का ही वादा करता है. कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा है कि वर्ग संघर्ष 'या तो व्यापक तौर पर सामाजिक क्रांतिकारी पुनर्स्थापना में या फिर संघर्षरत वर्गों की आपसी बर्बादी से समाप्त होता है. बीसवीं सदी के महान वर्ग
संघर्ष का परिणाम निश्‍चित तौर पर 'समाज की क्रांतिकारी पुनर्स्थापना' नहीं है. मार्क्स और एंगेल्स ने जिसे 'संघर्षरत वर्गों की सामान्य बर्बादी' कहा है वह पहले से ही समाज में हो रही है. अर्थव्यवस्थाएं हर जगह कसाईखाना बन गई हैं; लाचारी, गरीबी, धन की कमीं तथा संसाधनों की विलासितापूर्ण बर्बादी; कानून तथा व्यवस्था के व्यापक विध्वंस,मूर्खतापूर्ण क्षेत्रीयता तथा नस्लीय विवाद, देशों के बीच अथवा देशों के भीतर रोजमर्रा के नए युद्ध, जनसंहारक हथियारों के प्रसार तथा वैश्विक
पैमाने पर आतंकवाद का खतरा, सब कुछ निगल जाने वाले पर्यावरणीय संकट, निकट भविष्य में ऐतिहासिक तौर पर बहुत वास्तविक संदर्भों में यह सब संघर्षरत वर्गों से ज्यादा 'समान बर्बादी के बिंदु हैं. पूंजीवाद का युग शायद अच्छी तरह से 'मानवता के संपूर्ण उन्मूलन' में ही खत्म हो जैसा कि मार्क्स द्वारा १८४५ में ही संभावना व्यक्‍त की गई थी. जिस परिप्रेक्ष्य को बाद मे रोजा लुक्जमबर्ग ने 'समाजवाद या बर्बरता' नामक उक्‍ति में व्यक्‍त किया. जिस खतरे को हम महसूस कर रहे हैं उसके संदर्भ में रोजा लुक्‍जमबर्ग के कथन को सुधारकर मेस्ज़रोज़ ने कुछ जोड़ते हुए कहा कि 'समाजवाद या बर्बरता', "अगर हम भाग्यवान हैं तो बर्बरता"--पूंजी के विनाशकारी विकास का अंतिम समायोजन मानवता का उन्मूलन है. ऐसी नियति 'मानवता का उन्मूलन' पूंजीवाद के अनियंत्रित धन बटोरने के तर्क में ही अंर्तनिहीत है. यह बिल्कुल ठीक कहा गया है कि पूंजीवाद के बारे में यह सच नही है कि 'इतिहास का अंत' हो गया है, जैसा कि बुर्जुवा विचारक हमें मानने के लिए कहते हैं, बल्कि इसका निरंतर आस्तित्व 'मनुष्‍य के इतिहास का' वास्तव में अंत कर देगा.....पहले जैसा बताया गया है कि, चीजों के विस्तृत दृष्टि को लेकर, वर्तमान समय की पराजय तथा समाजवाद की वापसी उस उतार चढा़व की उपयुक्‍त दृष्टि है जो पूंजीवाद से समाजवाद में महायुगीन संक्रमण से अपरिहार्य तौर पर जुडी़ है......बीसवीं शताब्दी वैश्विक पूंजीवाद द्वारा दुनिया भर में संपूर्ण वर्चस्व के साथ शुरु हुई थी. तब मार्क्सवादी विश्‍लेषण के, और खुद मार्क्स के पूर्वानुमान के मुताबिक बीसवीं सदी में - प्रथम विश्‍वयुद्ध के उपरांत यूरोपीय क्रांति (जिसमें सिर्फ रूस की क्रांति ही कायम रह पाई), द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में और फिर चीन, कोरिया,क्यूबा, वियतनाम, और हर जगह पूंजीवादी व्यवस्था के लगभग एक तिहाई आबादी और परिक्षेत्र में समाजवादी क्रांतियां संपन्न हुईं. पूंजीवाद की परिसीमा में समाजवाद जड़ें नहीं जमा सकता था जैसा कि पूंजीवाद ने सामंतवाद के भीतर किया. पूंजीवाद द्वारा प्रदत्‍त भौतिक आधारों पर बेहतर ढंग से निर्मित यह समाज की एकदम एक नई शुरुआत है, लेकिन जिन गरीब तथा पिछडे़ देशों में समाजवाद के निर्माण की ये कोशिशें हुई वहां ये आधार मुश्किल से ही मौजूद थे.. जो सबसे कमजोर तैयारी मे थे यह उनका कार्यभार था फिर भी इन देशों ने इस निर्माण के लिए संघर्ष किया तथा अफ्रीका व अन्य जगहों पर भी मार्क्सवाद व समाजवाद के लिए प्रतिबद्ध आंदोलनों तथा क्रांतिकारी सत्ताओं
का उदय हुआ. तथा पूंजीवाद तथा क्रांति के बाद समाजवाद की स्थापना के बीच लंबे समय तक जो प्रतिद्वंदिता रही वह अब बंद हो गई तथा उसका अचानक अंत हो गया. पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं के बाद, आने वाला भविष्य पूंजीवाद से संबंधित लगने लगा था लेकिन ऐसे परिप्रेक्ष्य सापेक्षतया नए हैं. कई सदियों से यह धारणा बहुत दूर थी कि पूंजीवाद तीसरी सहस्त्राब्दी तक बना रहेगा. लेकिन क्रांति पश्‍चात की प्रतिस्थापनाएं दिखाती हैं कि समाजवाद दूसरी सहस्त्राब्दी मे अंतिम दिनों में ही असफल हो गया. यद्यपि यह पहले दृष्‍टिकोण की समाप्ति नहीं है. समाजवाद का सोवियत प्रयोग असफल हो गया क्यूंकि वस्तुगत तथा आत्मगत दोनों तरह की स्थितियां इसके प्रतिकूल थीं. प्रारंभ में आर्थिक पिछडा़पन, फिर आंतरिक वर्गयुद्ध तथा सशस्‍त्र और निरस्त्र विदेशी हस्तक्षेप तथा वैश्विक पूंजीवाद के निरंतर प्रयासों ने समाजवाद के निर्माण में हर सफलता को बाधा पहुंचाया. इस राह के निर्धारक तत्व, अपर्याप्त तथा अक्सर ही गलत सिद्धांत थे जिन्होंने इस प्रयोग तथा कमजोर राजनीतिक नेतृत्व को दिशा निर्देश अथवा गलत दिशा निर्देश दिया.लेकिन जो जानना सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि जिस के लिए भी प्रयास हुए और जो भी कुछ असफल हुआ वह समाजवाद नहीं था बल्कि समाजवाद निर्माण के लिए पहला गंभीर प्रयास था. समाजवाद तथा साथ ही साथ क्रांति की उपलब्धियों के उद्‍देश्यों का जिन कारणों से जन्म हुआ वह अभी भी पहले से ज्यादा मौजूद हैं. इसे मानने का कोई कारण नही है कि प्रभुत्वशाली पूंजीवाद को हमेशा की ही तरह आश्चर्यचकित कर देने वाली नई क्रांतियां लंबे दिनों तक नहीं होंगी तथा समाजवाद के निर्मान के नए प्रयास नहीं किए जायेंगे. और इस बात को मानने के कई कारण हैं कि अनूकूल परिस्थितियों, ज्यादा समृद्ध सिद्धांत तथा बेहतर राजनीतिक नेतृत्व में भी ऐसे प्रयास सफल नही होगें...... यहां पूंजीवाद के उद्‍भव और विकास पर एक निगाह डालना काफी शिक्षाप्रद होगा. विद्वानों का मत है कि मध्यकाल के दिनों में पूंजीवाद अपनी गलत शुरुआत के बावजूद एक नहीं बल्कि कई घोषणाओं/उम्मीदों को समेटे हुए था.
लेकिन विपरीत परिस्थितियों में जिंदा रहने की ताकत की कमीं के कारण तथा उस दौरान मुख्यतः सामंती वातावरण के कारण कमजोर तथा विभाजित था. सामंती वातावरण से घिरा, आकार लेता पूंजीवाद आगे बढ़ने में असफल रहा. यह तब तक
नहीं था जब तक कि बाद की सदियों में एक नया संयोग नहीं आया कि फुदकता पूंजीवाद, जिसने अपने पहले के विफल प्रयासों से लाभान्वित होकर जडे़ जमाया तथा अपने शत्रुओं को धराशायी करने के लिए पर्याप्त शक्‍तिशाली बनकर उभरे तथा आगे बढ़ सके, और अंततः यह प्रकट हुआ जैसे कि इग्लैंड तथा अन्य अटालांटिक समाजों में हुआ. एक बार उदीयमान होने के बाद सामंतवाद से संघर्ष लगातार जारी था, एक ऐसा संघर्ष जो प्रभुत्व के लिए दो वास्तविक आस्तित्वमान सामाजिक संरचनाओं के बीच था. यह संघर्ष राज्य सत्‍ता (उत्पादन के साधनों पर एकाधिकार) तथा अपने हितों तथा विचारों के अनुसार
समाज को संगठित करने के अधिकार के लिए था. इससे भी ज्यादा यह एक ऐसी प्रक्रिया का विस्तार था जिसमें एक नए सामाजिक ढांचे ने वैचारिक तथा आर्थिक दोनों तरह के अविवादित प्रभुत्व के लिए खुद को तैयार करने में पर्याप्त समय लिया. इसीलिए पूंजीवा हमारे समय में वैश्विक वर्चस्व के तंत्र के रूप में उपज सका तथा विकसित हुआ. जब तक कि इसमें छेद करने के लिए समाजवाद ने अपना पहला प्रयत्‍न नहीं किया, एक ऐसा प्रयत्‍न जो अभी असफल हो गया

1 comment:

  1. बहुत ही बढ़िया

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    http://prajapativinay.blogspot.com/

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