Thursday, December 11, 2008

कबीर की कविता और कुमार गन्धर्व का स्वर


कौन ठगवा नगरिया लूटल हो !




चंदन खाट के बनल खटोला
तापर दुलहिन सूतल हो !

उठो सखी री मांग संवारो
दुलहा मोसे रूठल हो !

आए जमराजा पलंग चढ़ि बैठे
नैनन अंसुवा टूटल हो !

चार जने मिल खाट उठाइन
चहुं दिसि धूं धूं ऊठल हो !

कहत कबीरा सुनो भाई साधो
जग से नाता टूटल हो !

6 comments:

  1. सुबह सुबह कुछ सुना ....

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  2. hamre yaha.n nirgun gate samay aksar ye geet gaya jaata tha...! thanks

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  3. कुमार गन्धर्व की आवाज़ में कबीर हमेशा एक अलौकिक अनुभव होता है। सुनवाने का आभार।

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  4. kumar ji par apane likha achchha laga.

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