Wednesday, November 26, 2008

सपने में बड़बड़ाता मैं आदमी हूं नई सदी का - तुषारधवल की कविताएं


जैसा अनुनाद के पाठक जानते हैं कि मैं अकसर ही अपने साथ के और बाद के किसी न किसी युवा कवि को अपने ब्लॉग में प्रस्तुत करता रहा हूं। पिछले दिनों में आपने व्योमेश शुक्ल, अलिन्द उपाध्याय और गिरिराज किराड़ू को पढ़ा है। आज के कवि हैं तुषारधवल। तुषार हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में दिखे हैं और उनका संकलन भी किसी प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान में प्रकाशनाधीन है शायद ! कुछ समय पहले अनुराग वत्स के सबद पर तुषार की मुक्तिबोधीय अभिव्यक्ति की इच्छा से भरी एक लम्बी कविता `काला राक्षस´ ब्लॉगजगत में पढ़ी जा चुकी है। मेरे पास दो महीने पहले अपनी एक औंचक फोनकॉल से सम्पर्क में आए इस सहृदय मित्र की चालीस कविताएँ हैं और उनमें से कुछ आज और कुछ बाद में आपको पढ़वाऊंगा - जो आकार में छोटी, लेकिन आशय में बड़ी होंगी। तुषार की कविता के बारे में सबसे पहले जो बात समझ आती है, वह यह है कि ये कवि एक महानगर में रहता है। तुषार मुम्बई में रहते हैं और अपने भीड़भाड़ भरे तार-तार होते "आसपास" पर पूरा भरोसा भी करते हैं। मेरी बात का यह मतलब न लगाया जाए कि वे महानगरत्व को स्वीकारने के लिए आतुर हैं, बल्कि वे तो उसके रग-रेशों में बसी ज़िन्दगी में आवाजाही कर रहे हैं। यह आवाजाही जब कविता का रूप लेती है तो उनके कविकर्म के प्रति गहरे तक आश्वस्त भी करती है। जब वे कहते हैं कि `मुझे सपनों में कोई गांव नहीं पुकारता ´ तो पता चलता है कि उनका भी कोई गांव है और यह एक विशिष्ट मुहावरे में सम्भव हो पाता है। आगे यह मुहावरा और विकसित और स्पष्ट हो, अनुनाद की यही शुभकामना है।

मैंने तुषार की कविताओं पर कोई बौद्धिक, लच्छेदार और महत्वाकांक्षी वक्तव्य नहीं दिया है, बल्कि उन्हें अनुनाद के पाठकों के आगे खुली प्रतिक्रिया के लिए रखा है। इन प्रतिक्रियाओं में मेरी अपनी दिलचस्पी भी तुषार से कम नहीं होगी। उम्मीद है आप भी कंजूसी नहीं करेंगे !
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काम पर जाती घरेलू औरतें

अपने बच्चों को दुनिया में उतार आयी हैं
वह दुनिया जिस पर वे भरोसा करना जानती हैं

घर से निकलती हैं रोज़ सुबह फोन पर
सखियों को बुलाकर
इकट्ठे ही चढ़ेंगी 9:32 की लोकल में
उनके हाथों में फाइलें नहीं
अपनी-अपनी परेशानियां और उन पर सबकी साझा राय होती है
उनके साथ अकसर होतीं हैं टिफिन बॉक्स के अलावा कुछ डिब्बियां भी
जिनमें हल्दी कुमकुम और शगुन की चीज़ें होती हैं
बांटती हैं अखंड सुहाग, संतति और शुभ की कामना घर से दफ्तर के बीच लोकल ट्रेन में

दफ्तर में भी वही धुन चलती रहती है
बॉस और फाइलों के बीचोंबीच
वे फिल्मों के किस्से और पतियों की बातें करती हैं
अंताक्षरी खेलती,गाती हुई घर लौट जाती हैं पिसकर अपनी दुनिया में पिसने
पिस पिस कर और भी महीन हुआ जाता है उनका धीर
ऐसे ही उनका होना संसार में घुल जाने को तैयार होता है

वे खतरनाक जंगलों से एक साथ गुज़रती हैं
मशाल उठाए
अपनी देह से ढक देती हैं दूसरों की लाज
बिना जाने उसका कुनबा

नाचती रहती हैं सुरसा के मुंह में
पीड़ाओं के बीच उनका होना अनवरत उत्सव है
साझा साझा होने का

वे कबीर की बेटियां हैं
वे सूफियों की सन्तानें हैं
जो अपना संसार उठाए पुरुषों की दुनिया में
आ जाती हैं
वे मुहम्मद का पैग़ाम हैं
जो जेहादियों को जेहाद का मतलब बता रही हैं !


मुझे भरोसा है

मैं प्रक्षिप्त शब्द !
मृत्यु के नाचते पैरों के बीच
अन्त का मुकम्मल अन्त
कलम से पूछता हूं

एक पन्ना कहीं उड़ कर पूरी दुनिया छाप लाता है
और उसमें दुनिया भर की क़ब्रें होती हैं

मुझे नहीं चाहिए ये क़ब्रें ये नक्शे
क्योंकि अभी भी दुनिया को हाथों की ज़रूरत है
पहचान को ज़बान की ज़रूरत है

हवस के चेहरों पर फलसफों के मुखौटे
ध्वस्त मुंडेरों पर नाचने वाले
अपने ही गिद्धों से परेशान होते हैं
और
चुप कर दिए गए लोग
बस देखते रहते हैं

उनके सन्नाटों में कोई चीखता है
पुकारता है
उनकी व्यस्तताओं के बीच

मुझे भरोसा है उसी बस्ती का
जहां लोग बोलना भूल गए हैं !


जिन्न

जरूरत नहीं है
फिर भी मुझे चाहिए
मैं हिस्सा हूं हवस का

कुरेदा तो निकला
मेरी तहों से
जिन्न

आकाश में दौड़ता हूं
सड़कों पर तैरता हूं
जड़ नहीं शाखा नहीं
किसी आकाशीय तल पर रहता हूं
वहीं से मारता हूं गोता
और निकाल लाता हूं कल्पना भर सामान
नए असन्तोष

मुझे सपनों में कोई गांव नहीं पुकारता
नहीं दुलारते हैं पूर्वज
दंतकथाओं का कोई सिरा नहीं जुड़ा है मेरे पोर से
अणु परमाणु अस्तित्व का
मेरे चंद ही हैं सरोकार
मैं क्लोन हूं
नई सोच का

फायदे का गणित सीखता
सेंसेक्स की सीढ़ियों पर ही सोता हूं
गर्भाशय बदलता हूं जब चाहे

ठेल कर तुम्हारी कायनात
अपनी सृष्टि खड़ी कर रहा
नींद में चलता
सपने में बड़बड़ाता
मैं आदमी हूं नई सदी का !


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पुनश्च : ये पोस्ट लिखे जाने तक तुषार का शहर अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले का शिकार हो चुका है और तुषार ने बताया कि वो किसी तरह बच- बचा कर घर वापस आया है ! हालाँकि फ़ोन पर आशल - कुशल मिल चुकी है, तब भी मैं उसके लिए चिंतित हूँ।


ये पोस्ट ऐसी सभी मानवद्रोही गतिविधियों का विरोध करती है !

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4 comments:

  1. गुज़रे मालेगांव से लेकर आज की मुम्बई तक के सभी गुनहगारों को धिक्कार ! तुषार जी की कविताएं खुद व्यक्त कर पाने में समर्थ लगीं पर उन पर क्या कहूं अभी तो मुम्बई हावी है!

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  2. पढकर तो तुरंत ही तुषार जी से बात करने का मन है। पर नम्बर नही मिल रहा है। वो कुशल से है ये पता होते हुए भी मन कर रहा है कि बात करूँ। खैर हम भी उनके लेखन के मुरीद है।

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  3. धन्यवाद पढ़वाने के लिए। बस यही कहूंगा - अभी भी दुनिया को हाथों की जरूरत है।

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