Tuesday, October 7, 2008

शरदस्य प्रथम दिवसे


बहुत दूर कुछ शिखर दिखते थे कमरे की खिड़की से बाहर
उनसे बहुत पहले एक तिरछी घाटी
उससे पहले कुछ मकान
बिजली के कुछ तार जाते हुए यहाँ से वहाँ
आपस में उलझी कपड़े टांगने की रस्सियाँ
कुछ लोग
आपस में बतियाते हुए
और उनसे भी पहले
बाहर देखते ही दिख जाती थीं सलाखें
उस खिड़की की
जिसे में सुबह सबसे पहले खोलता था
बन्द करता था रात
सबसे बाद !

मुझे कोई संवाद नहीं दिया गया था
मुझे हिलना भी नहीं था अपनी जगह से

दरअसल मुझे कुछ भी नहीं करना था उस खूबसूरत दृश्य में
जो सिर्फ़ मेरी तरफ़ से दिखता था।

मैं कई दिनों से
कहीं जाने के बारे में सोच रहा था
पर मेरे पाँव हिलते न थे

मैं कई दिनों से
कुछ चीज़ों की तरतीब देने के बारे में सोच रहा था
पर मेरे हाथ उठते न थे

मैं कई दिनों से
कुछ बोलने के बारे में सोच रहा था
बल्कि मैं तो बोल भी रहा था

पर मेरे शब्दों में आवाज़ न थी।

मैं बहुत साहसी होना चाहता था
और बहुत धीर भी

मैं उदार भी होना चाहता था
और बहुत गम्भीर भी

मैं ज़्यादा होना चाहता था
और कम भी

मैं ``मैं´´ भी होना चाहता था
और ``हम´´ भी।

शायद ऐसे ही ख़त्म हो जाता है सफ़र
हर बार

बहुत घने
भाप भरे जंगल पुकारते हैं हमें

पेड़ों के तने
बहुत चिकने कुछ खुरदुरे भी


पतझर में साथ छोड़ जाने वाली
चतुर-चपल पत्तियां


लम्बी लचीली डगालें

मिट्टी की बहुत पतली चादर तले
रह-रहकर
करवट बदलती है ज़िन्दगी

अख़ीर में
ऐसी ही किसी जगह हमें लाता है प्रेम

हम जहाँ से कहीं नहीं जाते
वहाँ से
कोई नहीं आता हमारे पास।

(ये कविता जैसा कुछ २००३ में रानीखेत में रहते हुए लिखा गया था)

2 comments:

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