Friday, July 3, 2009

गोरख पांडे


दोस्तो !
मैं उतना हताश भी नहीं पर कहना चाहता हूं कि वो ज़माना और था, जब का यह गीत है और इसे लिखने-गाने वाले गोरख पांडे और महेश्वर भी !
फिलहाल आप सुनिये गोरख के इस गीत को महेश्वर और साथियों की आवाज़ में...




(इस गीत को 2 जुलाई 2007 की निस्तब्ध रात में वीरेन डंगवाल के साथ कोरस मिलाकर मैंने, अशोक पांडे और जवाहिर चा ने नैनीताल की सुशीतल झील के किनारे गाया था। हालांकि हमने गाया और अपने सबसे बुरे समयों में हमेशा गाते रहेंगे... लेकिन तब भी कहूंगा कि वो ज़माना और था!)
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इस पोस्ट के लिए मैं जन संस्कृति मंच का आभारी हूं !
न होता आभारी, अगर ये मंच मेरा हुआ होता......

10 comments:

  1. वाकई वो जमाना और ही था...

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  2. जनता के पलटनियाँ ना आवे. लेकिन दुनियाँ के झकझोर के हिलावे के जरूरत अबहियों बा.

    बहुत उम्दा पोस्ट शिरीष भाई.

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  3. बहुत उम्दा और अतीत स्मृति को कुरेदने वाली रचना -शुक्रिया ,दीपावली की शुभ कामनाएं !

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  4. अद्भुत गीत। सुनवाने के लिये शुक्रिया। दीपावली मुबारक!

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  5. वाह भाई। ये तो कोरस में गाने वाला गीत ही है। उम्मीद है इसे गाने के बाद मिजाज ठीक हो गया होगा॥

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  6. महेश्वर जी की आवाज़ सुनकर आंखे नम हो गई...महेश्वर जी के साथ बीते वो दिन आंखो के सामने घूम आ गये...अच्छी प्रस्तुति के लिये बहुत बहुत शुक्रिया

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  7. दिपावली की शूभकामनाऎं!!


    शूभ दिपावली!!


    - कुन्नू सिंह

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  8. दीपावली की मँगल कामनाएँ -
    बेहद आँचलिक और उत्साह भरा गीत सुनवाया

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  9. वाह आनंद आ गया। कई दिनों से उनका लिख ढूढ रहा था। पर निकला लिखा मिल नही रहा कही पर। ना लाईब्रेरी में,ना ही दुकान पर, खैर ढूढ ही लेगे। और आज ये सुनने को मिल गया।

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