Friday, October 24, 2008

पिता की बरसी पर - येहूदा आमीखाई


अपने पिता की बरसी पर
मैं गया
उनके साथियों को देखने
जो दफ़नाए गए थे उन्हीं के साथ एक क़तार में
यही थी
उनके जीवन की स्नातक कक्षा

मुझे याद हैं उनमें से अधिकतर के नाम
जैसे कि एक पिता को
अपने बच्चे को स्कूल लाते हुए याद रहते हैं
उसके दोस्तो के नाम

मेरे पिता
अब भी मुझसे प्यार करते हैं और मैं तो हमेशा ही करता हूं उनसे
इसीलिए मैं कभी नहीं रोता उनके लिए
लेकिन यहां
इस जगह का मान रखने की ख़ातिर ही सही
मैं ला चुका हूं थोड़ी-सी रुलाई अपनी आंखों में
एक नज़दीकी क़ब्र को देखकर

एक बच्चे की क़ब्र -
हमारा नन्हा योसी जब मरा
चार साल का था !

5 comments:

  1. हृदय स्पर्शी!!!


    आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

    ReplyDelete
  2. बहुत खूब. बहुत ही बढ़िया.

    दीपोत्सव मंगलमय हो.

    ReplyDelete
  3. क्या रहता की जगह रोता शब्द होना चाहिए?

    ReplyDelete
  4. सही कहा रवीन्द्र भाई ! टाइपिंग में हुई ग़लती अब सुधार दी गई है।

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails