Wednesday, October 15, 2008

आशुतोष दुबे की कविताएं


आशुतोष दुबे की ये कविताएँ उनके संकलन "यकीन की आयतें" से ली गई हैं और इन्हें हमारे चित्रकार दोस्त श्री रविन्द्र व्यास ने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उपलब्ध कराया है, अनुनाद इस सहयोग के लिए उनका आभारी है। आशुतोष जी ने कई तरह से एक बड़ी रेंज में अपना काव्य सामर्थ्य साबित किया है और उनका पहला संकलन "असंभव सारांश" भी पर्याप्त चर्चित रहा है। मुझे नहीं लगता की उनके रचनाकर्म के पक्ष में किसी बड़े वक्तव्य या सबूत की ज़रूरत है ! बस आप पढ़िये ये तीन कविताएँ और अपनी अनुभूति से अवगत भी कराइए हमें ...


संसार चलता है


उनकी
निराशा बहुत घनी होती है
सिर्फ
एक नम्बर से जीवन
जिनकी पकड़
से छूट जाता है

हताशा उनमें
इतना कोहरा भर देती है
कि आगे
का कुछ भी दिखना बंद हो जाता है
वे टटोलते
हुए आ जाते हैं खिड़की तक
और जीवन
से बाहर छलांग लगा देते हैं

इससे एक
छोटे से डर में
एक बहुत
बड़े डर का डूब जाना दिखता है

और वे
कई नम्बरों से पीछे होते हैं
नीचे होते
हैं जो किसी भी सूची में
चींटियों की
तरह दीवार पर चढ़ने की कोशिश में
बार-बार गिरते-उठते और फिर गिरते हैं

उनके बारे
में कोई नहीं जानता
कि अपनी
राख में से अगली बार
वे फिर
से साकार हो पाएंगे या नहीं

इससे एक
छोटी सी कोशिश में
एक विकट
उम्मीद का पता मिलता है

और संसार
चलता है
***

पुल

दो दिनों के बीच है
एक थरथराता पुल
रात का

दो रातों
के दरमियां है
एक धड़धड़ाता
पुल
दिन का

हम बहते हैं रात भर
और तब
कहीं आ लगते हैं
दिन के
पुल पर

चलते रहते हैं दिन भर
और तब
कहीं सुस्ताते हैं
रात के
पुल पर

वैसे देखें
तो
हम भी
एक झुलता हुआ पुल ही हैं
दिन और
रात जिस पर
दबे पांव
चलते हैं
***

कुछ हमेशा बीच में था

हम
एक दृश्य में दाखिल होना चाहते थे।

हम भीतर
जाना चाहते थे और भीतर जाने
की उत्कंठा
में अपने पूरे वेग से टकराते
हैं कांच
की उस दीवार से जो दृश्य के
और हमारे
बीच में थी जिसके बारे में
हम कुछ
नहीं जानते थे।

न जानना
भी एक अपराध है जो न दीवार
को साबुत
रहने देता है, न हमें।

दृश्य
अलबत्ता वैसा ही बना रहता है।

कांच टुकड़े सीढ़ियों पर झरने की तरह बहते हैं।

इसके बहुत बाद फर्श पर खून की कुछ बूंदें दिखाई देती हैं
जो हमारे
घावों पर टपकी हैं।

कांच की
दीवार के उस तरफ कोई चौंककर
सिर नहीं उठाता।

कोई दौड़ा-दौड़ा नहीं आता।
इतने शोर, इतने ध्वंस का दृश्य में कोई हस्तक्षेप
नहीं होता।

अपने कांच
के अदृश्य टुकड़ों की चिलक लिए
लौटते हैं हम।

हमारे घाव किसी को दिखाई नहीं देते।
*** 

5 comments:

  1. न जानना
    भी एक अपराध है जो न दीवार
    को साबुत
    रहने देता है, न हमें।

    आपने सही कहा -- नहीं लगता की उनके रचनाकर्म के पक्ष में किसी बड़े वक्तव्य या सबूत की ज़रूरत है !। बहुत सुंदर कवितायें । प्रस्तुत करने का शुक्रिया।

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  2. एक अच्छे कवि को जगह देने के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से भी आपका आभारी हूं। एक ऐसे समय में जब हिंदी का संसार अपने पुराने-नए कवियों को ठीक से याद नहीं रख पाता तब आप जैसे कविता के सहृदय पाठक, प्रेमी लगातार कविताएं छाप रहे हैं और पढ़वा रहे हैं यह बहुत ही आश्वस्तिकर है। इसी तरह से इस कृतघ्न समाज में कविता के लिए जगह बनाई और फैलाई जा सकती है।
    आप लोग यानी सबद के श्री अनुराग वत्स, कबाड़खाना के श्री अशोक पांडे और साथी, अनहद-नाद के श्री प्रियंकर, वैतागवाड़ी के श्री गीत चतुर्वेदी और हाल ही में ब्लॉग की दुनिया में आए श्री कुमार अंबुज(और भी ब्लॉग होंगे जो कविताएं छाप रहे हैं)के कारण अच्छी कविता को हमेशा जगह मिलती रहेगी और इस तरह कविता की जान बचाई जा सकेगी।
    मैं आपको और इन सब ब्लॉगर्स को एक बार फिर शुभकामनाएं देता हूं क्योंकि ये जो काम कर रहे हैं, इसका ज्यादा बेहतर तरीके से नोटिस लिया जाना चाहिए।

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  3. श्री उदय प्रकाश का ब्लॉग, श्री विष्णु नागर का कवि, श्री बोधिसत्व का विनय पत्रिका, योगेंद्र कृष्णा का शब्द-सृजन ब्लॉग भी बेहतरीन कविताएं दे रहे हैं। इसके अलावा और भी ब्लॉग हैं जो कविताएं दे रहे हैं लेकिन इनमें जो मुझे उल्लेखनीय लगे उनका जिक्रभर किया गया है। हो सकता है कुछ नाम छूट गए हों।

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  4. अशुतोष जी कवितायें आज की हिन्दी कविता के लिए आश्वतिकर हैं.
    ऐसे ही मिलवाते रहो भाई अच्छी कविता से!

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