Friday, October 3, 2008

जेब काटने वाली औरत

मुझे बहुत हैरानी हुई यह जानकर कि वह एक औरत थी
जिसने दस दिन पहले मेरी जेब काटी थी
बस अड्डे पर रोडवेज़ की एक पुरानी जर्जर बस में

थाने से एक सिपाही ख़बर लाया
और साथ में मेरा ख़ाली बटुआ भी
जो भीतर की परतों में
मेरे पहचान-पत्र के बचे रहने से पहचाना गया

कैसी होगी वह औरत जो जेब काटती है
सोचा मैंने
मुझे इसमें भी सदैव सेवा को तत्पर पुलिस की
कोई शरारत लगी

पता नहीं किस फेर में
मैं थाने चला गया उस औरत को देखने
मेरी कल्पना को ध्वस्त करती
वह एक ख़ामोश लेकिन तेज़-तर्रार औरत थी
तीस-पैंतीस बरस की
सलीके का सलवार-कुर्ता पहने

उसे किसी बात का कोई भय नहीं था

पुलिस वाले
बार-बार रंडी कहकर पुकारते थे उसे
और वह निर्विकार ताकती थी थानाध्यक्ष के पीछे लगी
अब तक साबुत बची
गांधी जी की लाठीधारी एक पुरानी तस्वीर को

उसके पास ऐसे बीस-पचीस बटुए निकले थे
साहब के कृपापात्र
तेज़ी-से अंदर-बाहर जाते एक अत्यंत गतिशील हवलदार ने
बतलाया मुझको

मुझे दिखाई दिए वे दृश्य बसों के
जहाँ मजबूरी में लोलुप पुरुषों के बगलवाली सीट पर
बैठ जाने की इजाज़त मांगती
और बैठ जाने के बाद लगातार कसमसाती रहती थीं
कुछ औरतें

यह भी उन्हीं में से होगी
शायद
अपनी ज़िन्दगी की लगातार विवशता में जगह-जगह भटकते
इसने खुद ही ईजाद किया होगा
ऐसे हालात में उन कामी पुरुषों और अपनी वंचित दुनिया को
अनायास ही जोड़ देने वाला
यह विचित्र और कारगर तरीका

मुझे याद आती हैं
घरों में पति की जेब से पैसे निकालती वे औरतें
जिनके पास
किसी एक जेब की विशिष्ट सुविधा है

यह भले ही मज़ाक लगे
पर उस एक जेब से ही तो चलता है संसार
उस औरत का
पूरी होती हैं ज़रूरतें उसकी और बच्चों की
हमारे औसत भारतीय समाज में
उसी के वज़न से तो मापी जाती है हैसियत
उसके आदमी की

इतने सारे लोगों की जेब काटती उस औरत को देख
बहुत अंदर कहीं महसूस हुआ मुझे
क्या सचमुच इतनी जेबविहीन है उसकी ज़िन्दगी

दुनिया में कहीं कोई जेब नहीं क्या
जिसमें वो झाँक सके
निस्संकोच बिना अपराधी बने

मुझे नहीं मालूम उसका क्या हुआ

सिगरेट के गाढ़े धुंए के पीछे से अनवरत देखते
थानाध्यक्ष के अर्धनिमीलित नेत्रों ने
उसके बारे में आख़िर क्या फैसला लिया?

मुझे नहीं पता
मैं तो बस देख सका था
पुलिस की गालियों और अंदरूनी जांच - पड़ताल के
आसन्न संकट से बेपरवाह उस औरत को
जो अपने किए पर कतई शर्मिन्दा नहीं थी

मुझे लगता था बेआवाज़
भीतर ही कहीं बदल रहा था हमारा संसार
हर दिन कुछ और क्रूर होता हुआ

या फिर
अपने पतियों की जेब टटोलने की सुविधा से लैस
औरतों की दुनिया में
चुक गई थीं
उसकी ही सारी संभावनाएं
और वंचना की सबसे करुण कथा को कहती
जेब काटते हुए भी
जैसे वह ज़िन्दा ही नहीं थी

क्या वाक़ई
वह अपने किए पर कतई
शर्मिन्दा नहीं थी?

० ० ०
वसुधा में २००६ में प्रकाशित

8 comments:

  1. एक घटी घटना को बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है।सत्य के धरातल पर एक सवाल उठाती आप की रचना बहुत बढिया लगी।

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  2. सुन्दर यथार्थ कविता। घटना न घटी हो तब भी।

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  3. शिरीष भाई, तुम्हारी हर कविता पिछले दिनों मैनें पढ़ी है इसे मिलाकर। कविता के पीछे जो विचार तैरते हैं और जिस अन्वेषण पर तुम्हारी कविता खड़ी होती है वे मुझे हर बार अभिभूत कर देते हैं।
    भौत्ते सुंदर हो।

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  4. bahut accha dil ko choo lene vali aur sachaai ko bayan karne vali kavita.

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