Friday, September 26, 2008

मालकौंस

कुमार गंधर्व का गायन सुनकर।
मुझे ये राग बहुत पसंद है और मेरे कानों और दिमाग को ये एक विलक्षण मानवीय रहस्यात्मकता का राग लगता है। आप सभी मित्र अपनी बात ज़रूर बताएं !

जीवन-राग श्रृंखला २००३-०४
(अनोखी सहजता वाले उस हृदय के लिए जिसने "संगतकार" लिखी)

बहुत हौले
बहुत चुपके आराम से गुजरती रात
बिना कोई चोट पहुंचाए
बिना किसी दर्द के
बिना समझ में आए मगर ये मुमकिन न था

बहुत मुमकिन था
कि मुझे खोज लेती नींद
मगर मैं खोज पाता उसे बिना खुद को सपनों में भटकाए
ये मुमकिन न था

बहुत गाढ़ा था अन्धेरा
आंखों की समझ से लगभग बाहर
आवाज थी एक रोशनी
दूर से आती
दूर तक जाती
टिमटिमाती कभी जलती धधक कर
कभी धीमी पड़ जाती

मानो सपने में होता था सभी कुछ
देह में
भीतर तक खिलते थे
इच्छाओं के फूल
इधर-उधर टटोलते कामना भरे हाथों को मिलते थे
अपने जैसे दूसरे हाथ

आधी रात की ताजी भुरभुरी मिट्टी में
खुलते-खुलते रह जाती थी
बरसों से ख़ामोश खड़े
पेड़ों की आंख

धरती तक पहुंचने में चुक गया तारों का उजास
और स्मृतियों का दिल तक पहुंचने में
दिमाग में लेकिन अकेला भटकता था एक खयाल

अभी दूर थी सुबह
लेकिन मुमकिन था सोच पाना उसके बारे में

गर्म और गंधभरे घोंसलों में
ये परिन्दों का
पहली करवट बदलने का समय था

बहुत सारी चीजें थीं
जो अन्धेरे में भी छुप नहीं पाती थीं

छुप नहीं पाता था पानी
जहाँ भी हो
तमाम नदियों और समुद्रों के बीच
उसकी आवाज आती थी

छुप नहीं पाती थी हवा
हर कहीं
एक शरीर से दूसरे शरीर
एक सांस से दूसरी सांस के बीच
उसकी आवाज आती थी

छुप नहीं पाते थे दुख
हर जगह
हताश दिलो और दिमागों के बीच
उनकी आवाज आती थी

छुप नहीं पाती थी रोशनी
हर समय
दूसरी तमाम आवाजों के बीच
उसकी आवाज आती थी

2 comments:

  1. भीतर तक खिलते थे
    इच्छाओं के फूल
    इधर-उधर टटोलते कामना भरे हाथों को मिलते थे
    अपने जैसे दूसरे हाथ

    bahut sundar kavita...pichli padhi hui kavitaon men mere sabse nikat...shubhkamnayen...

    ReplyDelete
  2. अच्छा है. पहले भी पढ़ी-सुनी थी. आज पुनः आनन्द प्राप्त हुआ लला.

    ReplyDelete

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