Friday, September 19, 2008

एकालाप


तुम भूलने लगे हो
कि कितने लोगों चीज़ों और हलचलों से भरी है
दुनिया
उम्र अभी चौंतीस ही है तुम्हारी
बावजूद इसके
तुम व्यस्त रहने लगे हो
अक्सर
किसी खुफ़िया एकालाप में

लगता है
तुम दुनिया में नहीं किसी रंगमंच पर हो
और कुछ ही देर में शुरू होने वाला है
तुम्हारा अभिनय
जिसमें कोई दूसरा पात्र नहीं है
और न ही ज़्यादा संवाद

पता नहीं
अपनी उस विशिष्ट अकुलाहट भरी
भारी
भरभराती आवाज़ में
त्रासदी अदा करोगे तुम
या करोगे
कोई प्रहसन

तुम्हारे भीतर एक जाल है धमनियों और शिराओं का
और वे भी अब भूलने लगी हैं
तुम्हारे दिमाग तक रक्त पहुंचाना
इसलिए
तुम कभी बेहद उत्तेजित तो कभी गहरे अवसाद में रहते हो

तुम भूल गए हो
कि कितना वेतन मिलता है तुम्हें
और उसके बदले कितना किया जाना चाहिए
काम

तुम्हें लगता है
वापस लौट गए हो बारह बरस पहले की
अपनी उसी गर्म और उमस भरी
उर्वर दुनिया में
जहाँ कभी इस छोर से उस छोर तक
नौकरी खोजते भटका करते थे तुम

सपने में दिखती छायाओं -से
अब तुम्हें दिखने लगे हैं
अपने जन
किसी तरह रोटी कमाते
काम पर जाते
भीतर ही भीतर रोते- सुलगते
किसी बड़े समर की तैयारी में
जीवन की कई छोटी-छोटी लड़ाईयां हार जाते
वे अपने जन
जिनसे तुम दूर होते जा रहे थे
लफ्ज़-दर-लफ्ज़

कहो कैसे हो शिरीष
अब तो कहो ?
जबकि भूला हुआ है वह सभी कुछ
जिसे तुम भूल जाना चाहते थे
अपने होशो -हवास में

अब
अगर तुम अपने भीतर के द्वार खटखटाओ
तो तुम्हें सुनाई देगी
सबसे बुरे समय की मुसलसल पास आती पदचाप

अब तुम्हारा बोलना
कहीं ज़्यादा अर्थपूर्ण और मंतव्यों भरा होगा !
०००
2007

5 comments:

  1. apne dil ki baten aapke shabdon me mahsus hui.

    ReplyDelete
  2. shirish jee aap 2007 me bhi achchha likhte the aur 2008 me bhi achchha likhte hain. aapne pahle bhi achchha likha hai aur bad men bhi achchha likhenge.

    ReplyDelete
  3. अब
    अगर तुम अपने भीतर के द्वार खटखटाओ
    तो तुम्हें सुनाई देगी
    सबसे बुरे समय की मुसलसल पास आती पदचाप


    अब तुम्हारा बोलना
    कहीं ज़्यादा अर्थपूर्ण और मंतव्यों भरा होगा !


    --बहुत बेहतरीन एकालाप!!

    ReplyDelete
  4. िकसे सचेत कर रहे हैं?.....
    तुम भूल गए हो
    कि कितना वेतन मिलता है तुम्हें
    और उसके बदले कितना किया जाना चाहिए
    काम
    तुम्हें लगता है
    वापस लौट गए हो बारह बरस पहले की
    अपनी उसी गर्म और उमस भरी
    उर्वर दुनिया में
    जहाँ कभी इस छोर से उस छोर तक
    नौकरी खोजते भटका करते थे तुम.

    ReplyDelete
  5. kya baat hai k vyast rehne lage ho kisi khifiya ekalaap me......?

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails