Wednesday, September 17, 2008

मनमोहन की कविताएँ








शर्मनाक समय


कैसा शर्मनाक समय है
जीवित मित्र मिलता है
तो उससे ज़्यादा उसकी स्मृति
उपस्थित रहती है
और उस स्मृति के प्रति
बची खुची कृतज्ञता
या कभी कोई मिलता है
अपने साथ ख़ुद से लम्बी
अपनी आगामी छाया लिए !
***

उसकी थकान


यह उस स्त्री की थकान थी
कि वह हंस कर रह जाती थी
जबकि वे समझते थे
कि अंततः उसने उन्हें क्षमा कर दिया !
***

7 comments:

  1. शिरिष भाई, मनमोहन जी की कविताओं को यदा-कदा पढ़ने का मौका मिला है और हर बार उन्होनें चौंकाया है।

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  2. कि अंततः उसने उन्हें क्षमा कर दिया !
    बहुत बढि़या।

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  3. अच्छी कवितायें.अगर का थोड़ा-सा पर्चय भी होता तो ,खैर,
    शिरीष की नई तस्वीर अब उम्र का बयान कर -सी रही है.इसका भी अजब आनंद है.

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  4. अच्छा है लाला!

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  5. achhi kavitayen chuni...manmohan ne hindi ko kuch durlabh kavitayen di hain...

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  6. manmohanji ko kabhi appreciate n kar paaya. lekin ye wali ghzab ki hain......un ki anya kavitaon ka punarpaath karna banta hai.... nyae angle se....

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  7. shaandaar kavitayen. unhen haal hee mein haryana sahitya akadmee ne lakhtakiya puraskaar diya hai aur unhone ye lakh take ek sanstha ko de diye hain

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