Wednesday, August 27, 2008

अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मिरे पिन्दारे - मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो - रहे - दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किसको बतायेंगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे खफ़ा है तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़ते - गिरिया से भी महरूम
ऐ राहते -जां मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिले - ख़ुशफ़हम को तुझसे हैं उमीदें
यह आखिरी शम'एं भी बुझाने के लिए आ

5 comments:

  1. " its a great loss in litreray world which can never be fulfilled " ek or gazal अहमद फ़राज़ jee kee

    जो भी दुख याद न था याद आया

    आज क्या जानिए क्या याद आया।


    याद आया था बिछड़ना तेरा

    फिर नहीं याद कि क्या याद आया।


    हाथ उठाए था कि दिल बैठ गया

    जाने क्या वक़्त-ए-दुआ याद आया।


    जिस तरह धुंध में लिपटे हुए फूल

    इक इक नक़्श तेरा याद आया।


    ये मोहब्बत भी है क्या रोग 'फ़राज़'

    जिसको भूले वो सदा याद आया।

    Regards

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  2. धन्यवाद सीमा जी इस रचना के लिए और आपकी टिप्पणी के लिए भी!

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  3. शायर अहमद फ़राज़ साहेब को श्रृद्धांजलि!!

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  4. शिरीष जी शायद अहमद फ़राज़ साहेब जैसे महान शायर को उनकी यह ग़ज़ल ही हम सबकी श्रद्धांजलि है.

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  5. फ़राज़

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