Friday, August 29, 2008

विष्णु खरे की लम्बी कविता - हर शहर में एक बदनाम औरत होती है


(यह थमा हुआ वीडियो विजुअल 2004 के अंकुर मिश्र स्मृति सम्मान समारोह से)
 


'' कहानी में कविता कहना विष्णु खरे की सबसे बड़ी शक्ति है '' - रघुवीर सहाय


हर शहर में एक बदनाम औरत होती है

कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता उसके बारे में
वह कुंआरी ही रही आयी है
या उसका ब्याह कब और किससे हुआ था
और उसके तथाकथित पति ने उसे
या उसने उसको कब क्यों और कहां छोड़ा
और अब वह जिसके साथ रह रही है या नहीं रह रही
वह सही-सही उसका कौन है
यदि उसको संतान हुई तो उन्हें लेकर भी
स्थिति अनिश्चित बनी रहती है

हर शहर में एक बदनाम औरत होती है

नहीं वह उस तरह की बदनाम औरतों में नहीं आती
वरना वह इस तरह उल्लेखनीय न होती
अकसर वह पढ़ी-लिखी प्रगल्भ तथा अपेक्षाकृत खुली हुई होती है
उसका अपना निवास या फ्लैट जैसा कुछ रहता है
वह कोई सरकारी अर्धसरकारी या निजी काम करती होती है
जिसमें ब्यूटी सैलून नृत्य-संगीत स्कूल रेडियो टीवी एन जी ओ से लेकर
राजनीतिक तक कुछ भी हो सकता है
बताने की ज़रूरत नहीं कि वह पर्याप्त सुंदर या मोहक होती है
या थी लेकिन इतनी अब भी कम वांछनीय नहीं है

जबकि सच तो यह है कि जो वह वाकई होती है उसके लिए
सुंदर या खूबसूरत जैसे शब्द नाकाफ़ी पड़ते हैं
आकर्षक उत्तेजक ऐंद्रिक काम्या
सैक्सी वालप्चुअस मैन-ईटर टाइग्रेस-इन-बेड आदि सारे विशेषण
उसके वास्ते अपर्याप्त सिद्ध होते हैं
अकसर तो उसे ऐसे नामों से पुकारा जाता है
जो सार्वजनिक रूप से लिए भी नहीं जा सकते
लेकिन बेशक वह जादूगरनियों और टोनहियों सरीखी
बल्कि उनसे अधिक मारक और रहस्यमय
किसी अलग औरत-ज़ात कर तरह होती है
उसे देखकर एक साथ सम्मोहन और आतंक पैदा होते है।

वह एक ऐसा वृत्तान्त ऐसी किंवदंती होती है
जिसे एक समूचा शहर गढ़ता और संशोधित-संविर्द्धत करता चलता है
सब आधिकारिक रूप से जानते हैं कि वह किस-किस से लगी थी
या किस-किस को उसने फांसा था
सबको पता रहता है कि इन दिनों कौन लोग उसे चला रहे हैं
कई तो अगल-बगल देख कर शनाख्त तक कर डालते हैं
कि देखो-देखो ये उसे निपटा चुके हैं
उन उनकी उतरन और जूठन है वह
स्वाभाविक है कि यह जानकारियां सबसे ज्यादा और प्रामाणिक
उन दुनियादार अधेड़ों या बुजुर्ग गृहस्थों के पास होती हैं
जो बाक़ी सब युवतियों स्त्रियों को साधिकार बिटिया बहन भाभी कहते हैं
सिर्फ़ शहर की उस बदनाम औरत को उसके नाम से पुकारते हैं
और वह भी मजबूरन
और उसकी संतान हुई तो कभी उसके मामा नाना या चाचा नहीं बनते

उस बदनाम औरत के विषय में अकसर इतने लोग बातें करते हैं
खुद उससे इतने लोग अकसर बातें करते या करना चाहते हैं
उसके पूर्व या वर्तमान प्रेमियों से इतने लोग इतना जानना चाहते हैं
उसके साथ इतने लोग संयोगवश दिखना चाहते हैं
उसे इतनी जगहों पर उत्कंठा और उम्मीद से बुलाया जाता है
कि यह निष्कर्ष अपरिहार्य है कि उसका वजूद और मौजूदगी
किसी अजीब खला को भरने के लिए दुर्निवार हैं
जो औरतें बदनाम नहीं हैं उनका आकर्षक दुस्वप्न
और उनके उन मर्दों के सपनों का विकार है वह बदनाम औरत
जो अपनी पत्नियों को अपने साथ सोई देखकर
उन्हें और अपने को कोसते हैं
सोचते हैं यहां कभी वह औरत क्यों नहीं हो सकती थी
उसके सफल कहे जानेवाले कथित प्रेमियों के बारे में सोचते हैं
कि ऐसी सस्ती औरत ही स्वीकार कर पाती होगी इतने घटिया लोगों को
फिर सोचते हैं सब झूट बोलते हैं कमीने शेखीबाज़
ऐसी चालू औरत ऐसों को हाथ तक नहीं रखने देती
आशंका और आश्वस्ति के बीच वे अपनी सोती पत्नियों को देखते
उसके सद्गुणों से द्रवित बाधामुक्त होते हैं

अध्ययन से मालूम पड़ जाएगा
कि शहरों की ये बदनाम औरतें बहुत दूर तक नहीं पहुंच पातीं
निचले और बीच के तबकों के दरमियान ही आवाजाही रहती है इनकी
न उन्हें ज्यादा पैसा मिल पाता है और न कोई बड़ा मर्तबा
वे मंझोले ड्रांइगरूमों औसत पार्टियों समारोहों सफलताओं तक ही
पहुंच पाती हैं क्योंकि उच्चतर हलक़ों में
जिन औरतों की रसाई होती है वे इनसे कहीं ज़हीन और मुहज्जब होती हैं

ऐसी बदनाम औरत को अलग-अलग वक्तों पर
जिनके साथ वाबस्ता बताया जाता है
क्या वाकई वह उनसे प्रेम जैसा कुछ करती थीं और वे उससे?
क्या उन्होंने इससे फ़ायदा उठाया
या वह भी उतने ही नुक़सान में रहीं ?
क्या, जैसा कि एक खास रूमानियत के तहत माना जाता है ,
उसे किसी आदर्श संबंध की तलाश है?
या कि उसे िफ़तरतन हर छठे महीने एक नया मर्द चाहिए
या वह अपनी बनावट में के उन संवेगों से संचालित है
जिन्हें वह भी नहीं समझती?

कुछ कह नहीं सकते
ऐसी किसी औरत से कभी किसी ने अंतरंग साक्षात्कार नहीं लिए हैं
न उसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया गया है
और स्वयं अपने बारे में उसने अब तक कुछ कहा नहीं है
उसे हंसते तो अकसर सुना गया है
लेकिन रोते हुए कभी नहीं देखा गया

यह तो हो नहीं सकता कि उस बदनाम औरत को
धीरे-धीरे अपनी शक्तियों का पता न चलता हो
और इसका कि लोग उससे कितनी नफ़रत करते हैं
लेकिन कितनी शिद्दत से वे वह सब चाहते हैं
जो वह कथित रूप से कुछ ही को देती आयी है
बदनाम औरत जानती होगी कि वह जहां जाती है
अपने आसपास को स्थाई ही सही लेकिन कितना बदल देती है
कभी-कभी सार्वजनिक या एकांत उसका अपमान होता होगा
शायद वह भी किसी को तिरस्कृत करती हो
फ़ाहशा कहलाने का जोखिम उठाकर
घर और दफ्तर में उसे घिनौने और डारावने फोन आते होंगे
अश्लील चिटि्ठयों की वह आदी हो चुकी होगी
रात में उसके बरामदे के आगे से फिब्तयां कसी जाती होंगी
खिड़कियों के शीशे पत्थरों से टूटते होंगे
यदि वह रिपोर्ट दर्ज़ करवाने जाती भी होगी
तो हर वर्दीवाला उसकी तरफ़ देखकर मुस्कराता होगा

जो औरतें बदनाम नहीं हैं
उनका अपनी इस बदनाम हमज़ात के बारे में क्या सोच है
इसका मर्दों को शायद ही कभी सही पता चले
क्योंकि औरतें मर्दों से अकसर वही कहती हैं
जिसे वे आश्वस्त सुनना चाहते हैं
लेकिन ऐसा लगता है कि औरतें कभी किसी औरत से
उतनी नफ़रत नहीं करतीं जितनी मर्दों से कर सकती हैं
और बेशक उतनी नफ़रत तो वे वैसी बदनाम औरतों से भी कर नहीं सकतीं
जितनी मर्द उससे या सामान्यत: औरतों से कर पाते हैं
अगर हर फुर्सत में एक नई औरत को हासिल करना अधिकांश मर्दों की चरम फंतासी है
तो बदनाम औरत भी यह क्यों न सोचे
कि अलग-अलग या एक ही वक्फ़े में कई मर्दों की सोहबत भी
एक शग़ल एक खेल एक लीला है
और कौन कह सकता है कि उसमें सिर्फ़ वहीं गंवाती है
संभव है कि औरतों में ही इसे लेकर मतभेद हों
लेकिन यदि मर्द औरत का इस्तेमाल कर सकता है
तो बदले में औरत उसका इस्तेमाल क्यों न करे
और आखिरी बात तो यह
कि यदि मर्द को हर दूसरे दिन एक नया जिस्म चाहिए
तो औरत वह बदनाम हो नेकबख़्त
वैसा ही चाहे तो यह उसका हक़ कैसे नहीं?

शहर की ऐसी बदनाम औरत
यदि वाकई भयभीत और शोकार्त होती होगी
तो शायद उस क्षण की कल्पना कर
जब एक दिन वह अपनी संतान का अपमान जानेगी या देखेगी
या उसे अचानक बदला हुआ पाएगी
उसकी आंखों में पढ़ेगी वह उदासी और हिकारत
देखेगी उसका दमकता चेहरा अचानक बुझा हुआ
समझ जाएगी कि उसके बारे में सही और ग़लत सब जान लिया गया है
कोई कैिफ़यत नहीं देगी वह शायद
सिर्फ़ इंतज़ार करेगी कि उसकी अपनी कोख से बना हृदय तो उसे जाने
और यदि वैसा न भी हुआ
तो वह रहम या समझ की भीख नहीं मांगेगी
सबको तज देगी अपने अगम्य अकेलेपन को नहीं तजती
शहर की वह बदनाम औरत

ऐसी औरत के आख्यान खुद उससे कहीं सर्वव्याप्त रहते हैं
वह कब छोड़कर चली जाती है शहर
और किस वास्ते किसके साथ यह मालूम नहीं पड़ता
फिर भी उसे जहां-तहां एकाकी या युग्म में देखे जाने के दावे किए जाते हैं
ऐसी औरत की देह के
सामान्य या अस्वाभाविक अवसान का कभी कोई समाचार नहीं मिलता
कभी-कभी अचानक किसी नामालूम रेल्वे स्टेशन या रास्ता पार करती भीड़
या दोपहर के सूने बाज़ार में अकेली वह वाकई दिखती है अपनी ही रूह जैसी
उसकी उम्र के बावजूद उसकी बड़ी-बड़ी आंखों उसकी तमकनत से
अब भी एक सिहरन दौड़ जाती है
उसकी निगाहें किसी को पहचानती नहीं लगतीं
और लोगों और चीज़ों के आर-पार कुछ देखती लगती हैं
शायद वह खोजती हो या तसव्वुर करती हो अपने ही उस रूप का
स्वायत्त छूटकर जो न जाने कहां किसमें विलीन हो चुका ले चुका अवतार
शायद उसी या किसी और शहर की अगली बदनाम औरत बनकर !
***

6 comments:

  1. शिरीष जी आपने ये लम्बी कविता लगाई, मेरी समझ में भी आई, लेकिन बहुत लोगों तक ये नहीं पहुंची - टिप्पणी एक भी नहीं !

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  2. kai baar tippani soojhtee naheen aur kai baar sajish ke tahat chuppi sadh lee jaati hai.

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  3. ye kavita mujhe to vikal kartee hai

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  4. mujhe apni badnaam premikayen yaad aa rahi hain. jinhe aaj tak pyar karta hoon....aur un sab ko i love you keh paane tak mujhe jeena hai !

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  5. बहुत ही खतरनाक पगडंडी पर पांव रखा है विष्णु जी ने। बड़ी कनिाई रही होगी संतुलन सााने में। बहुत अंदर तक चुभ गई यह कविता।
    राजीव लोचन साह

    ReplyDelete
  6. बहुत ही खतरनाक पगडंडी पर पांव रखा है विष्णु जी ने। बड़ी कनिाई रही होगी संतुलन सााने में। बहुत अंदर तक चुभ गई यह कविता।
    राजीव लोचन साह

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