Monday, July 21, 2008

पंकज चतुर्वेदी की " हिंदी "


2४ अगस्त १९७१ को इटावा में जन्मे पंकज नई पीढी के प्रतिष्ठित आलोचक और कवि हैं - और भरपूर हैं ! उन्होंने इन दो लेखकीय रूपों को एक ही व्यक्तित्व में सम्भव करने का चमत्कार कर दिखाया है। आइये मैं पढ़वाता हूँ उनकी एक विलक्षण कविता -

" हिंदी "

डिप्टी साहब आए
सबकी हाजिरी की जांच की
केवल रजनीकांत नहीं थे

कोई बता सकता है -
क्यों नहीं आए रजनीकांत ?

रजनी के जिगरी दोस्त हैं भूरा -
रजिस्टर के मुताबिक अनंतराम -
वही बता सकते हैं , साहब !

भूरा कुछ सहमते - से बोले :
रजनीकांत दिक़ हैं

डिप्टी साहब ने कहा :
क्या कहते हो ?
साहब , उई उछरौ - बूड़ौ हैं

इसका क्या मतलब है ?

भूरा ने स्पष्ट किया :
उनका जिव नागा है

डिप्टी साहब कुछ नहीं समझ पाये
भूरा ने फ़िर कोशिश की :
रजनी का चोला
कहे में नहीं है

इस पर साहब झुंझला गए :
यह कौन - सी भाषा है ?

एक बुजुर्ग मुलाजिम ने कहा :
हिंदी है हुज़ूर
इससे निहुरकर मिलना चाहिए !
***

6 comments:

  1. हिंदी है हुज़ूर
    इससे निहुरकर मिलना चाहिए !

    ... बढ़िया है. पंकज की कुछेक प्रेम कविताएं भी लगाई जानी चाहिए. क्या कहते हो लल्ला!

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  2. badhiya hai lekin himdi k pathak bahar bi hain bhayiye ham jaise lakhon log ...blog par ek tutoril bi rakhvayiye n !

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  3. आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, इसके लिए साधुवाद। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़कर हिन्दी के उन्नयन में अपना सक्रिय सहयोग करें।

    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
    शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥


    शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। हार्दिक शुभकामना!
    (हिन्दुस्तानी एकेडेमी)
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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  4. hhhhhaaaaa ...लाजवाब है...

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  5. सुंदर. पंकज जी की वह कविता जो उन्होंने उसने कहा था पर लिखी है, वह भी लगाते, मुझे बेहद पसंद है |

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  6. बहुत पहले इस कविता को पढ़ा था.एक बार फिर पढ़ना अच्छा लगा...

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