Sunday, July 13, 2008

वीरेन डंगवाल की लम्बी कविता - रामसिंह

४ दिन पहले मैं पौडी के सुदूर गाँव की यात्रा पर था और पता नहीं क्यों मुझे वीरेन दा की ये कविता याद आती रही। मेरे साथ आप भी पढिये इसे। कोई २८ साल पुरानी ये कविता आज भी उतनी ही ओजस्वी और असरदार है !


रामसिंह 


दो रात और तीन दिन का सफर तय करके
छुट्टी पर अपने घर जा रहा है रामसिंह
रामसिंह अपना वार्निश की महक मारता ट्रंक खोलो
अपनी गंदी जरसी उतारकर कलफदार वरदी पहन लो
रम की बोतलों को हिफाजत से रख लो रामसिंह
वक्त खराब है खुश होओ, तनो, बस में बैठो , घर चलो !
तुम्हारी याददाश्त बढ़िया है
रामसिंह पहाड़ होते थे अच्छे मौके के मुताबिक कत्थई-सफेद-हरे में बदले हुए
पानी की तरह साफ खुशी होती थी
तुम कंटोप पहनकर चाय पीते थे पीतल के चमकदार गिलास में
घड़े में गड़ी हुई दौलत की तरह गुड़ होता था
हवा में मशक्कत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे फौजियों की तरह
नींद में सुबकते घरों पर गिरा करती थी चट्टानें
तुम्हारा बाप मरा करता था लाम पर अंगरेज बहादुर की खिदमत करता
मां सारी रात रोती घूमती थी
भोर में जाती चार मील पानी भरने
घरों के भीतर तक घुस आया करता था बाघ
भूत होते थे सीले हुए कमरों में
बिल्ली की तरह कलपती हुई मां होती थी
पिता लाम पर कटा करते थे
सड़क होती थी अपरिचित जगहों के कौतुक तुम तक लाती हुई
मोटर में बैठकर घर से भागा करते थे रामसिंह
बीहड़ प्रदेश की तरफ
- - -
तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह?
तुम बंदूक के घोड़े पर रखी किसकी उंगली हो?
किसका उठा हुआ हाथ?
किसके हाथों में पहना हुआ काले चमड़े का नफीस दस्ताना?
जिन्दा चीज में उतरती हुई किसके चाकू की धार ?
कौन हैं वे, कौन ?
जो हर समय आदमी का नया इलाज ढूंढते रहते हैं?
जो बच्चों की नींद में डर की तरह दाखिल होते हैं?
जो रोज रक्तपात करते हैं और मृतकों के लिए शोकगीत गाते हैं?
जो कपड़ों से प्यार करते हैं और आदमी से डरते हैं?
वे माहिर लोग लोग हैं रामसिंह
वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं
पहले वे तुम्हे कायदे से बंदूक पकड़ना सिखाते हैं
फिर एक पुतले के सामने खड़ा करते हैं
यह पुतला है रामसिंह, बदमाश पुतला इसे गोली मार दो, इसे संगीन भोंक दो
उसके बाद वे तुम्हें आदमी के सामने खड़ा करते हैं
ये पुतले हैं रामसिंह, बदमाश पुतले इन्हें गोली मार दो, इन्हें संगीन भोंक दो, इन्हें ... इन्हें.... इन्हें
तुम पर खुश होते हैं - तुम्हें बख्शीश देते हैं
तुम्हारे सीने पर कपड़े के रंगीन फूल बांधते हैं
तुम्हें तीन जोड़ा वरदी, चमकदार जूते और उन्हें चमकाने की पालिश देते हैं
खेलने के लिए बंदूक और नंगी तस्वीरें
खाने के लिए भरपेट खाना, सस्ती शराब
वे तुम्हें गौरव देते हैं और इस सबके बदले
तुमसे तुम्हारे निर्दोष हाथ और घास काटती हुई लड़कियों से बचपन में सीखे गए
गीत ले लेते हैं
सचमुच वे बहुत माहिर हैं रामसिंह
और तुम्हारी याददाश्त वाकई बहुत बढ़िया है
- - -
बहुत घुमावदार है आगे का रास्ता
इस पर तुम्हें चक्कर आएंगे रामसिंह मगर तुम्हें चलना ही है
क्योंकि ऐन इस पहाड़ की पसली पर अटका है तुम्हारा गांव
इसलिए चलो, अब जरा अपने बूटों के तस्में तो कस लो
कंधे से लटका ट्रांजिस्टर बुझा दो तो खबरें आने से पहले
हां, अब चलो गाड़ी में बैठ जाओ, डरो नहीं,
गुस्सा नहीं करो, तनो
ठीक है अब जरा आंखें बंद करो रामसिंह
और अपनी पत्थर की छत से ओस के टपकने की आवाज़ को याद करो
सूर्य का पत्ते की तरह कांपना
हवा का आसमान फड़फड़ाना
गायों का नदियों की तरह रंभाते हुए भागना
बर्फ के खिलाफ लोगों और पेड़ों का इकट्ठा होना
अच्छी खबर की तरह वसन्त का आना
आदमी का हर पल हर पल मौसम और पहाड़ों से लड़ना
कभी न भरने वाले जख्म की तरह पेट
देवदार पर लगे खुश्बूदार शहद के छत्ते
पहला वर्णाक्षर लिख लेने का रामांच
और अपनी मां का कलपना याद करो

याद करो कि वह किसका खून होता है जो उतर आता है तुम्हारी आंखों में
गोली चलाने से पहले हर बार?
कहां की होती है वह मिट्टी जो हर रोज साफ करने के बावजूद
तुम्हारे भारी बूटों के तलवे में चिपक जाती है?
कौन होते हैं वे लोग जो जब मरते हैं
तो उस वक्त भी नफरत से आंख उठाकर तुम्हें देखते हैं
आंखें मूंदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो !
***

6 comments:

  1. हमेशा की तरह वीरेन दा के ख़ज़ाने से उम्दा कविताएं ला ला कर पढ़वाने का सत्कर्म करने वाले भइये को शुक्रिया.

    बने रहो!

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  2. प्यारे भाई,
    वीरेन डंगवाल की यह कविता 'रामसिंह' कई बार देख,सुन,पढ चुका हूं. इसे पढ़कर सहज बने रहना थोडी़ देर के लिए कठिन हो जाता है. यह हमारे समय के एक बड़े कवि की बड़ी कविता है.
    इस पोस्ट के बारे में मेरा एक सुझाव यह है कि दद्दा राजीव लोचन साह और 'नैनीताल समाचार' के साथियों ने इसके मंचन से एक नया आयाम दिया ही है ,ऐसे लोगों तक भी पहुंचाने का जरूरी काम किया है ,जां तक मेरी राय में इस कविता को या किसी भी अच्छी कविता को पहुंचना चाहिए. राजीव दा के पास इसके मंचन की तस्वीरें होंगी. उन्हें भी लगाओ तो क्या कहने!
    बाकी सब ठीक!

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  3. वे माहिर लोग लोग हैं रामसिंह
    वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं

    aapne bhi viren jee kee is kvita kee achchhi yad dilaee....shukriya

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  4. क्या कैवें हैं वो ......... थैंक्यू !
    जवाहिर चा, अशोक दद्दा और हरे !
    जवाहिर चा मैं नैनीताल समाचार से फोटू लाने की कोशिश करूंगा !

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  5. priy kavi ki achhi kavita ko phir se padha diya. shukriya

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  6. हत्यारों के बीच रामसिग को मरते हुए महसूस किया है

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