Thursday, July 3, 2008

विद्वेष

आप
उसे महसूस कर सकते हैं
बातों की
धूप - छाँव में
चेहरे पर वह कुछ अलग तरह की रेखाएं
बनाता है

पहली निगाह में दिखाई भले न दे
पर धीरे - धीरे
समझ में आता है

अचानक ही जन्म नहीं लेता वह
ह्रदय में पलता है
सरीसृपों के अंडे -सा

फूटता है
वांछित गर्माहट और नमी पा कर

मादा मगरमच्छ की तरह
हमेशा तैयार मिलते हैं
उसे
संभालकर मुंह में दबाये
जीवन के प्रवाह तक
पहुंचाने वाले !

1 comment:

  1. कविता में सजीवता है!

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