Wednesday, May 28, 2008

कहन

दोस्तों ये वो पहली पंक्तियाँ हैं, जिन्हें मैंने १७ की उम्र में लिखा और जिनमें कविता जैसा कुछ लगा। ये पंक्तियाँ उस समय की मेरी सबसे पक्की दोस्त सीमा को संबोधित थीं और मेरी ये एक छोटी सी बात मानने के बाद वही अब मेरी पत्नी भी है ...... तो इस तरह कविता उतनी बड़ी या महत्वपूर्ण नहीं है , जितनी ये अंतर्कथा !

कहन



मैं
कुछ कहता हूँ

तुम बैठो नदी किनारे
जैसे बैठे हैं
पत्थर

मैं बहता हूँ ......
***

3 comments:

  1. बेहद पसंद आई साहब .....कहते रहिये ...

    ReplyDelete
  2. वाह!

    सफल रही कविता, बधाई.

    ReplyDelete
  3. अद्भुत कहन।

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पृष्ठ पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails