Sunday, May 4, 2008

रघुवीर सहाय

उम्र

जब तुम बच्ची थीं
तो
मैं तुम्हें रोते हुए नहीं देख सकता था

अब तुम रोती हो
तो
देखता हूँ मैं !
***



एक सार्थक कविता अपने पाठक के लिए कितना स्पेस छोड़ती है , इसकी एक बानगी उस्ताद कवि रघुवीर सहाय की इस कविता में देखी जा सकती है ! राजकमल से प्रकाशित ' लोग भूल गए हैं ' से साभार !

2 comments:

  1. रघुवीर सहाय की इस कविता को पेश करने के लिए आभार.

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