Sunday, March 30, 2008

अप्रकाशित कविता

एक कविता जो पहले ही से ख़राब थी
होती जा रही है अब और ख़राब

कोई इंसानी कोशिश सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती स्थायी दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बगल से
लंबा चक्कर काट कर गुज़रना पड़ता है

मैं क्या करूं उस शिथिल
सीसे सी भारी काया का
जिसके आगे प्रकाशित कवितायेँ महज़ तितलियाँ हैं
और समालोचना राख

मनुष्यों में वह सिर्फ़ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूँ तब तक हूँ !

असद जी की यह कविता उनकी नई कविता पुस्तक "सामान की तलाश" से साभार.........
परिकल्पना प्रकाशन
डी - 68 , निराला नगर,
Lucknow -6

5 comments:

  1. असद जी कविता पेश करने का आभार..अच्छा लगा पढ़कर.

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  2. बहुत अच्‍छी कविता है. आपके ब्‍लॉग में कई बेहतरीन कविताएं हैं बंधु. ग्रेट.

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  3. बहुत ही सुन्दर कविता है। पढ़कर बहुत अच्छा लगा

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  4. क्या बात है भाई. बहुत उम्दा. शुक्रिया इस रचना को हम तक पहुंचाने का.

    ReplyDelete
  5. Bhai,

    Please visit www.pratilipi.in, a bilingual, bimonthly edited by me and a friend.

    giriraj

    ReplyDelete

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