Friday, March 28, 2008

ग़ज़ल

सुकूते- राह में उसके कयाम की दुनिया
बहुत हसीन है अब मेरे नाम की दुनिया

मुझे है चाह फजा में बिखर के रहने की
ये मेरे बस की नहीं है एहतिमाम की दुनिया

कहीं तो कोई मेरा जिक्रे-सुखन छेड़ेगा
किसी को भाएगी मेरे कलाम की दुनिया

मैं आज भी हूँ ज़मीने - दहर का कारिंदा
मुझे अजीज बहुत है ये काम की दुनिया

शहर की राह पे मैं बेअदब मुसाफिर हूं
शहर के पास है झूटे सलाम की दुनिया

दोस्तो उर्दू के अक्षरों में लगने वाले कई नुक्ते यहां नहीं लग पा रहे हैं - ये शायद यूनीकोड की सीमा है - आप तक बात पहुंचेगी ये उम्मीद भी है !

5 comments:

  1. सुकूते-राह में उसके क़याम की दुनिया
    बहुत हसीन है अब मेरे नाम की दुनिया

    मुझे है चाह फ़ज़ा में बिखर के रहने की
    ये मेरे बस की नहीं है एहतिमाम की दुनिया

    कहीं तो कोई मेरा जिक्रे-सुखन छेड़ेगा
    किसी को भायेगी मेरे कलाम की दुनिया

    मैं आज भी हूँ ज़मीने-दहर का कारिंदा
    मुझे अज़ीज़ बहुत है ये काम की दुनिया

    शहर की राह पे मैं बेअदब मुसाफ़िर हूँ
    शहर के पास है झूठे सलाम की दुनिया

    शिरीष जी unicode की limitation का जहाँ तक सवाल है... यह समस्या तो अब ख़त्म हो चुकी है... जैसा की उदाहरण से स्पष्ट हो गया होगा आपको...
    http://likhohindi.googlepages.com/devshilp3.0.html

    ख़ैर बहुत सुन्दर ग़ज़ल है!

    किसी भी प्रश्न के लिए मुझे ई-मेल लिखें।

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  2. वाह - बड़ी ज़हीन है आपके कलाम की दुनिया; ज़िक्र-ऐ-सुखन की फ़िक्र क्या

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  3. अच्छी गजल कही है आपने....मैं कभी गजल तो नहीं लिख पाया...एक शेर कभी कहा था...पेश है...
    कुछ पता नहीं मुझको क्यों कर
    दिल कल से कुछ उदास बैठा है।

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  4. बेहद सुन्दर गजल लिखी है आपने। छन्दों का भी अच्छा इस्तेमाल किया है। और गजलों को भी ब्लॉग पर पढ़ने का इंतजार रहेगा

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  5. विनय भाई इस सहयोग के लिए बहुत-बहुत आभार ! मैं आगे भी आपकी सहायता लेता रहूंगा। आपके दिए लिंक को देखूंगा और सीखूंगा ! फिर से धन्यवाद !

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