Friday, March 7, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

इसी रात में घर है सबका

अग्रज राजेश जोशी को विनम्रता और विश्वास के साथ

इसी रात में घर है सबका

जो चढ़ती चली आती है

छाती पर

और पार पाना मुमकिन नहीं जिससे

फिलहाल तो

इसी में हत्यारे घूमते हैं

बेनकाब

उनके चेहरे किसी निकटवर्ती नक्षत्र से भी ज्यादा

चमकते हैं

गाडियाँ गुज़रती हैं

हथियारों और लाशों से लदी

रास्ते गूंजते हैं

बूटों और चेतावनी देती सीटियों की आवाज़ों से

लाल और नीली बत्तियों की रोशनी में

बेखटके कुचली जाती है

मानवता

इसी रात में

जिसमें हम आँख मूँद कर सोने का अभिनय करते हैं

इसी रात में चलती रहती हैं

बगावत और खिलाफत की भी पोशीदा कार्यवाहियां

लोग कभी फुसफुसाते

तो कभी चीखते- चिल्लाते हैं

कितना भी हो अँधेरा

कुछ उठे हुए हाथ साफ नज़र आते हैं

कैसे रात किसी का घर नहीं -मेरे समय के बड़े और पुरस्कृत कवि राजेश जोशी बतलाते हैं

अपनी चमचमाते शब्दों वाली

एक कविता में

मैं अभागा समझ नहीं पाता उनकी बात

और जब भी पढ़ता हूँ उनकी यह कविता

भीतर-भीतर छटपटाता हूँ

इसी रात में घर है सबका

जी हाँ सबका !

जिसमें दारू पीकर स्त्रियों और नवोदितों पर विमर्श करते हुए

हमारे सारे बड़े कवि और चिन्तक भी शामिल हैं

कैसे कहूँ कि इसी रात में घर है उस प्रेम का भी

उनके जीवन में

दिनों-दिन क्षीण होती जाती है

जिसकी धार

ऐसे में जो बैठे रहते हैं मन मार

वही कहते हैं रात किसी का घर नहीं

उनके लिए खुला हुआ कहीं कोई दर नहीं

सिर्फ़ रोशनी है

छद्य भरी

दिन के उजाले की

अपना मुंह छुपाना बहुत सरल है वहाँ

मुझे याद आता है - अंधेरे के बारे में भी गाया जाएगा- कहने वाला

बीते हुए समय का एक चेहरा

गीदड़ों की अनवरत हुआं-हुआं के बीच भी

अमर हो गईं

जिसकी कवितायेँ

बहुत खुरदुरे बदन और

आत्मा वाली

मैं अभी बहुत छोटा हूँ यह कहने को

कि बहुत सरल है क्रांतिकारी हो जाना

बिना रात में रहे

बिना रात को जाने !

पर बड़े भाई इतना तो आप बताएं

अब से

क्या हम आपको सिर्फ़ उजाले का ही

कवि मानें ?

3 comments:

  1. शिरीष - बहुत बढ़िया - पढ़ाते रहें - संवेग बरकरार रखें - साभार - मनीष [ पुनश्च : अभी कहना ये ठैरा कि इस कविता के पीछे शर्तिया एक और कविता और एक कहानी हैगी - [कहानी नहीं समझनी / समझने में आयेगी नहीं ] - कोई ऐसा ठिकाना है जिसमें वो उजाले वाली कविता पढने को मिले - कबाड़खाने में लगा सकते हो क्या? ]

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  2. मनीष जी समकालीन हिंदी कविता में अब बस किस्सा कहानी ही हैगा ! वैसे आप राजेश जोशी जी की किताब चांद की वर्तनी में तीसरी कविता पढ़ सकते हैं !

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  3. bahut achchha swal utheye hainga g...achchha kiye g...hm bhe aapke pichhe-pichhe hain g...

    ReplyDelete

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