Wednesday, February 27, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

एक पुरातन आखेट-कथा
नए वक्त की एक घटना को याद करते

तुम्हारे नीचे पूरी धरती बिछी थी
जिसे तुमने रौंदा
वह सिर्फ़ स्त्री नहीं थी
एक समूचा संसार था फूलों और तितलियों से भरा ]
रिश्तों और संभावनाओं से सजा

जो घुट गयी तुम्हारे हाथों तले
सिर्फ़ एक चीख़ नहीं थी
आर्तनाद था
समूची सृष्टि का

हर बार जो उघड़ा परत दर परत
सिर्फ शरीर नहीं था
इतिहास था
शरीर मात्र का

जिसे तुमने छोड़ा
जाते हुए वापस अपने अभियान से
ज़मीन पर
घास के खुले हुए गट्ठर -सा
उसकी जु़बान पर तुम्हारे थूक का नहीं
उससे उफनती घृणा का स्वाद था

वही स्वाद है
अब मेरी भी ज़ुबान पर !

(ये एक पुरानी कविता है - ९६ के ज़माने की !)

7 comments:

  1. अच्छी रचना है।बधाई।

    जिसे तुमने छोड़ा
    जाते हुए वापस अपने अभियान से
    ज़मीन पर
    घास के खुले हुए गट्ठर -सा
    उसकी जु़बान पर तुम्हारे थूक का नहीं
    उससे उफनती घृणा का स्वाद था

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  2. Apka blog fir shuru hone se kafi achha lag raha hai. apne jitni bhi nayi kavitayen lagayi hai sabhit bahut achhi hai

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  3. Apka blog fir shuru hone se kafi achha lag raha hai. apne jitni bhi nayi kavitayen lagayi hai sabhit bahut achhi hai

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  4. aapki yh kvita kaee dfa padh chuka hoon...aur yh meri dairy me bhi hai...

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  5. अरथ अमित अति आखर थोरे।
    मार्मिक बिम्ब।
    सहज शिल्प में आधुनिक आखेट युग का सच।

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  6. शिरीष - यहाँ वेदना बहुत है - पढ़ के कुछ डर सा लगा

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  7. टिप्पणी देने वाले सभी मित्रों को धन्यवाद! इस कविता को लिखना बेहद पीड़ा भरा था.... पढ़ना भी शायद ऐसा ही हो !

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