Monday, February 25, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

लैंडस्केप

अपने प्यारे पहाड़ी गाँव `नौगावखाल´ को याद करते

इसे

किसी कैनवास पर नहीं उतारा जा सका

यह वहीं रहा हमेशा

अपनी कुदरती भूल-भुलैया में

कभी धुंधला

तो कभी चमकदार होता हुआ

इसमें से कुछ चीज़ें निकल गयीं

बहुत खामोशी से

कुछ इसमें दाखिल हो गयीं

बहुत चुपचाप

एक बहुत महीन - लगभग अदृश्य-सी

कारीगरी चलती रही इसके साथ

इसके भीतर कितनी ही गर्मियां आयीं

कितनी बरसातें

कितनी ही सर्दियाँ

कभी पत्ते झरे - कभी पत्ते उगे

कभी रास्ते उजड़े - कभी रास्ते बने

यह कमोबेश वैसा ही रहा

इसमें ज़िन्दगी और मौत की लगभग सभी हलचलें थीं

यह उतना शांत उतना निश्चेष्ट कभी नहीं था

लेकिन कमोबेश वैसा ही रहा

यह थोड़ी-बहुत चीज़ों से शुरू हुआ था

और अब विराट था

इसमें से निकलतीं और इसमें भरतीं हवाएं¡

कभी-कभार

मुझमें भी हरारत जगाती थीं
हालांकि

यह कहीं और था

हर बार

मेरे होने की जगह से दूर

मैं इसे सुंदर भी कहता हूं¡

जबकि

किसी के भी लिए बहुत मुश्कि़ल हो सकती है

वहां ज़िन्दगी

मैं इसे याद भी करता हूं¡

और भूल भी जाता हूं¡

कभी-कभार

बिल्कुल अपने होने की ही तरह

लेकिन

इसमें मेरे हिस्से की थोड़ी-सी नगण्य जगह अभी तक खाली है

लोगों के बीच कोई छाया

पगडंडियों के बीच कुछ सिलसिले

झुरमुटों के बीच थोड़े-से रंग शायद मेरे हैं

इसके बनने के इतने बरस बाद भी

कम से कम मेरे लिए तो

यह अब भी अधूरा है

मेरे बिना!


3 comments:

  1. खूब - झुरमुटों के बीच के रंग और लोगों के बीच छाया - दिखते भी हैं और नहीं भी

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  2. Kya baat hai dajyu? Aapki kavitao ka toh main hamesha mureed raha hoo. Ummeed toh yeh hai ki aap pehchaan lenge magar doosari situation mein, main Lokendra hoo, Ashok dajyu ke ghar par aapse do teen dafa mulaaqaat huyi hai.

    Hamesha aapki rachnaaye padkar lagta hai ki yeh toh meri hain. Aapki samvedanaao ke canvas mein shaayad sabhi ke liye kuch na kuch hai.

    ReplyDelete
  3. यार लोकेन्द्र इतनी आत्मीय प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद छोटा शब्द होगा फिर भी......

    ReplyDelete

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