Thursday, February 21, 2008

जीवन-राग2003-04

अनोखी सहजता वाले उस हृदय के लिए जिसने ` संगतकार ´ लिखी।यह कविताओं की एक विनम्र श्रंखला है। इसमें मैं तेरह दिनों तक रोज एक कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा।

आज का राग बसन्त

भीमसेन जोशी को सुनकर

इस तरह भी उतरता है बसन्त

धरती पर बेमौसम

बेवक्त


मन के भीतर बदल जाता है सभी कुछ

बाहर भले ही पत्ते झर रहे हों

भीतर कोंपलें फूटती हैं

जाड़ों की लम्बी रातों में

घोसलों में दुबकी चििड़यें आपस में कुछ पूछती हैं

भूरे से हरा हो जाता है

टिड्डों का रंग

इस तरह भी उतरता है बसन्त

जो किसी साजिश में शामिल नहीं

खून में नहीं सने हैं

जिनके हाथ

वे सभी महसूस कर सकते हैं

एक आवाज़ का हाथ पकड़कर

यों बसन्त का आना।

1 comment:

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