Tuesday, October 9, 2007

शिरीष कुमार मौर्य

ये मेरी नई अनछपी कविताओं में से एक है। हमारे गांवो में देवताओं के थान मुझे बचपन से ही आकृष्ट करते रहे हैं और ग्रामदेवताओं का ये मिथकीय संसार भी ......... इसी विषय पर किंचित भिन्न संदर्भ के साथ मेरी एक कविता `जागर´ पहल- 58 में छपी थी।

ग्रामदेवता

वे उस तरह अप्रमाणित, साम्प्रदायिक और हिंसक नहीं हैं
जिस तरह इस दुनिया के
हमारे ईश्वर

कभी वे थे सचमुच के ज़िन्दा इंसान
हमारी ही तरह
रक्त और मांस के बने
वायवीय नहीं थी उनकी उपस्थिति

सैकड़ों बरस पहले वे आए
किन्हीं अनाम दुश्मनों से बचते-बचाते
जीवन की खोज में
मुट्ठी भर लोगों के साथ
इन अगम-अलंघ्य पहाड़ों पर
उनकी वह दुर्धर्ष जिजीविषा खींच लाई
उन्हें यहां
उन्होंने पार की नदियां

अपनी बांहों के सहारे

खोजे
जीवनदायी गाड़-गधेरे-सोते

भेदा
किसी तरह मृत्यु का वह सूचीभेद्य अन्धकार
और आ बसे इन दुर्गम जंगली लेकिन निरापद जगहों में
अपने कुनबों के साथ

राज नहीं किया उन्होंने बस साथ दिया अपने लोगों का

और न्याय किया
संकट के कठोरतम क्षणों में भी
इस तरह वे नायक बने मरने के बाद
गुज़रे सैकड़ों साल
उनकी प्रामाणिक छवियां धुंधलाती गईं
जन्म लेते गए मिथक
बनती गईं लोकगाथाएं और किंवदन्तियां
जिनमें
आज भी वे रहते हैं
अपने पूरे सम्मान और गरिमा के साथ

गांव-गांव में बने हैं उनके थान
ढाढ़स बंधाते हारते हुए मनुष्यों को
दिलाते हुए याद उस ताक़त की जिसे हर हाल में
हम जीवन कहते हैं

वाकई
समय भी एक दिशा है
जहां आज भी दिख जाएंगे वे
लकड़ी चीरते
पीठ पर मिट्टी ढो मेहनत कर सीढ़ीदार खेत बनाते
बुवाई करते
काटते फसलें
मनाते अपने उत्सव-त्यौहार
और साथ ही
धार लगाते अपनी तलवारों को भी किन्हीं अमूर्त दुश्मनों के
खिलाफ

वे आज भी लौट आते हैं

दुख की मारी देहों में बार-बार
कभी होते हुए क्रुद्ध
तो कभी करते हुए विलाप

वे क्यों लौट आते हैं
बार-बार?

मैं आपसे पूछता हूं
उनके इस तरह लौट आने को क्या कहेंगे आप?

3 comments:

  1. अच्छी कविता है भाई...बधाई

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  2. सभी कविताएं बहुत अच्छी लगीं। शिरीष आपकी उत्साह बढाने वाली टिप्पणियों के लिए धन्यवाद। कई सालों से हिंदी में पढना लगभग छूट ही गया था। उम्मीद है आप लोगों के प्रोत्साहन से फिर से पढने लिखने का हिसाब बने।

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  3. मनुष्य से देवता बनने की प्रक्रिया शायद इसी तरह पूरी होती है। संघर्षशील व्यक्ति पहले नायक के रूप में स्वीकृत होते हैं और फ़िर कालांतर में किंवदंतियों में से गुजरते हुए महानायक बनते हुए देवता तक बन जाते हैं। फ़िर रह जाती हैं उनके साथ जुडी अविश्वसनीय कहानियाँ ...और भुला दिया जाता है उनका वास्ताविक संघर्ष। वाकई बहुत अच्छी कविता है।

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